सुनील बंसल। इस समय जेन-जी बहुत चर्चा में है। पिछले दिनों एक बैठक में इस नई पीढ़ी पर चर्चा चल निकली। किसी ने इनकी कार्यशैली के लिए मोबाइल को दोषी ठहराया तो किसी ने बदल रहे संस्कारों पर चिंता व्यक्त की। एक सज्जन ने बेहद सहजता से कहा, "अरे, ये जेन-जी लोग…" उनके ये शब्द मेरे मन में गहराई तक ठहर गए। "ये जेन-जी लोग…" का 'ये' शब्द मुझे बेचैन करता रहा। ऐसा क्यों हुआ कि हमारे और हमारे बच्चों के बीच दूरी दर्शाने वाला ‘ये’ शब्द खड़ा हो गया?

जब देश के प्रधानमंत्री युवाओं को मेरे युवा मित्र कहकर संबोधित करते हैं, तो उसके पीछे गहरी दृष्टि छिपी होती है। वह दृष्टि युवा को खुद से सामने कुर्सी पर बैठाने की नहीं, बल्कि अपने पास बैठाने की होती है। वह युवा को संवाद का बराबर का साथी मानने का भाव है। जेन-जी को लेकर हमारी सबसे बड़ी उलझन वह पुराना और संकुचित चश्मा है जिसके जरिये हम उन्हें देखने की कोशिश कर रहे हैं। हर नई पीढ़ी अपने समय से कड़े सवाल करती रही है। वह हर बात पर पूछती है कि ऐसा क्यों है?

जब महान स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह ने देश की स्वतंत्रता को सर्वोच्च और एकमात्र ध्येय मान लिया था, तब वे भी युवा ही थे, लेकिन उनके भीतर वही ज्वाला धधक रही थी, जो आज के युवाओं में है- व्यवस्थाओं को जस का तस स्वीकार न करने की जिद। युवा जानना चाहते हैं कि जो नियम तय किए गए हैं, वे वैसे ही क्यों हैं? यही प्रश्न पुरानी पीढ़ी को चुभने वाले लगते हैं। कल जब हम युवा थे, तब हमारे द्वारा पूछे गए प्रश्न हमारे बुजुर्गों को बेचैन कर देते थे। इस अंतर को हम साधारण शब्दों में जेनरेशन गैप यानी पीढ़ियों का अंतर कहते हैं।

नई पीढ़ी पर आरोप है कि यह मोबाइल स्क्रीन में डूबी रहती है, लेकिन आरोप का एक सिरा हमारी ओर मुड़ता नजर आता है। क्या हमारे बच्चे हमें हाथ में कोई पुस्तक लिए देखते हैं? क्या खाने की टेबल पर स्मार्टफोन हमसे दूर रहता है? क्या हमने कभी उन्हें गांव की कच्ची पगडंडियों पर घुमाया है? क्या उन्हें दादी-नानी की स्मृतियों में छिपी पारिवारिक कथाएं सुनाई हैं? हमें एक कड़ा प्रश्न स्वयं से भी पूछना होगा- हमने मोबाइल फोन के बाहर की दुनिया को उनके लिए कितना सुंदर और आकर्षक बनाकर दिखाया है? इसलिए बच्चों से केवल शिकायत करना बहुत सरल है, लेकिन उनके सामने एक सही और प्रेरणादायक उदाहरण बनकर खड़ा होना बेहद कठिन कार्य है।

बेशक उनका तरीका हमसे अलग है, उनकी बात कहने की भाषा अलग है और उनकी जिज्ञासा का दायरा भी भिन्न है। वे इसके पीछे का तर्क मांगेंगे और पूछेंगे कि ‘क्यों’। और हमें उस ‘क्यों’ शब्द से डरना नहीं चाहिए। हमें उन्हें परंपराओं के पीछे छिपा हुआ गहरा दर्शन समझाना होगा, धर्म के मूल मर्म से परिचित कराना होगा, और अपनी संस्कृति को केवल किताबी न रखकर कर्म में उतारकर दिखाना होगा।

जेन-जी को केवल रील्स बनाने-देखने तक सीमित कर देना अन्याय होगा। यही युवा पीढ़ी आज सीमाओं पर मुस्तैदी से खड़ी है। यही युवा आज शतरंज की बिसात पर पूरी दुनिया को बौद्धिक क्षमता से चकित कर रहे हैं। डी. गुकेश जैसे कम उम्र के युवा भारत की नई प्रतिभा का एक ऐसा गौरवशाली परिचय पूरी दुनिया के सामने लिख रहे हैं, जिस पर पूरे देश को गर्व है। तकनीक, विज्ञान, और उद्यमिता के क्षेत्र में ये युवा लगातार नए रास्ते खोल रहे हैं।

नई पीढ़ी केवल अपने बारे में नहीं सोचती, बल्कि अपने साथ-साथ दूसरे इंसानों के दर्द और तकलीफों को भी बखूबी पहचानना चाहती है। चाहे पर्यावरण संरक्षण की गंभीर चिंता हो, बेजुबान पशु-पक्षियों के अधिकारों की बात हो, युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे हों, समाज में समान अवसरों की मांग हो, या फिर किसी कमजोर और लाचार व्यक्ति के पक्ष में खड़े होने का सवाल हो- आज का युवा इन तमाम संवेदनशील विषयों पर बहुत अधिक सहजता और मुखरता के साथ अपनी बात रखता है।

हमें हर बार उन्हें यह पुरानी कहानी सुनाने की आवश्यकता नहीं है कि हमारे जमाने में तो हालात ऐसे हुआ करते थे…। हमारा रिश्ता किसी उपदेश देने वाले और सुनने वाले का नहीं, बल्कि आपसी संवाद का होना चाहिए। इसलिए अगली बार जब किसी औपचारिक बैठक में कोई व्यक्ति मुस्कुराते हुए यह कहे कि "अरे, ये जेन-जी लोग…", तो शायद हमें भी कहना चाहिए- हां, वे जेन-जी हैं, लेकिन वे ‘ये लोग’ नहीं हैं। हमारे अपने ही जिगर के टुकड़े, हमारे बच्चे हैं। स्वाभाविक है कि उनकी हर बात हमेशा सही नहीं होगी, ठीक वैसे ही जैसे हमारी भी हर बात अपने समय में सही नहीं हुआ करती थी। वे अपने जीवन में तमाम गलतियां करेंगे, बिल्कुल वैसे जैसे गलतियां हमने भी की थीं।

हमें समझना होगा कि अब इस देश की अगली यात्रा इन्हीं मजबूत कंधों पर बढ़ेगी। उन्हें किसी कठघरे में खड़ा करने के बजाय उनके साथ पूरी ताकत से खड़े होइए। बच्चों से संवाद अधिक से अधिक बढ़ाइए। उन्हें ध्यान से सुनिए, उनकी भावनाओं को समझिए, और उन पर पूरा भरोसा रखिए। क्योंकि भविष्य को कभी भी अतीत के पुराने सांचे में ढाला नहीं जा सकता। हमेशा यह बात याद रखिए कि भारत की अगली कहानी किसी और को नहीं, बल्कि इन्हीं हाथों को मिलकर लिखनी है।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं)