निरंजन कुमार। हर राष्ट्र के कुछ राष्ट्रीय प्रतीक होते हैं, जो उसकी मूलभूत संस्कृति और अस्मिता के साथ बहुत गहराई से जुड़े होते हैं। राष्ट्र ध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत, राजचिह्न, विभिन्न ध्येय वाक्य ऐसे ही प्रतीक हैं। ये हमारी सैकड़ों-हजारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना की उपज हैं, जैसे राष्ट्रीय ध्वज में स्थित अशोक चक्र, बौद्ध पंथ के धर्मचक्र का प्रतीक है, सर्वोच्च न्यायालय का ध्येय वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ महाभारत के श्लोक 'यतः कृष्णो ततो धर्मो, यतो धर्मः ततो जयः' का हिस्सा है। राष्ट्र गीत वंदे मातरम् भी हजारों वर्षों की सनातन संस्कृति के तत्वों को समाहित किए है। दुर्भाग्य से वंदे मातरम् फिर से विवादों में घिर गया है। इस विवाद ने संवैधानिक, वैधानिक, नैतिक और भारत के भविष्य से जुड़े प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

नवीनतम विवाद 26 जुलाई को संसद द्वारा राष्ट्र गीत वंदे मातरम् को कानूनी संरक्षण देने से आरंभ हुआ, जिसका कांग्रेस, सपा आदि ने विरोध किया। फिर 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम् के गायन को कथित तौर पर रोकने जैसी स्थिति पैदा हुई। 19 अगस्त को कांग्रेस कार्यसमिति ने अपने कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के केवल प्रथम दो ही पद गाने का निर्णय लिया। बंकिमचंद्र रचित गीत वंदे मातरम् को 1896 में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगौर ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में गाया, जिसके अध्यक्ष एक मुस्लिम थे। 1905 में बंग-भंग आंदोलन के दौरान हिंदू-मुस्लिम दोनों ने एकजुट होकर वंदे मातरम् गाया। कांग्रेस के सभी अधिवेशनों में इसे गाया जाता रहा, जबकि 1913, 1918, 1921 में कांग्रेस के अध्यक्ष मुसलमान रहे।

वर्ष 1907 में पारसी मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी में जो तिरंगा फहराया, उस पर वंदे मातरम् लिखा था। बलिदानी भगत सिंह अपने पत्रों में वंदे मातरम् से अभिवादन करते थे। क्रांतिकारी अशफाक उल्ला इसे गाते हुए फांसी पर झूल गए। कट्टर होने के पहले जिन्ना इसके सम्मान में खड़े न होने वालों को फटकारते थे। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने वंदे मातरम् से प्रेरित होकर तमिल में वंदे मातरम् शीर्षक से ही देशभक्तिपूर्ण कविता लिखी। 1907 में सेंट स्टीफंस कालेज के पहले भारतीय प्रिंसिपल ईसाई एसके रुद्र और 1916 में 'होमरूल लीग' के सह-संस्थापक जोसेफ बैप्टिस्टा वंदे मातरम् गाते थे।

सभी पंथों के दिग्गज लोगों में स्वीकार्य होने के बावजूद मजहबी कट्टरता के कारण मुस्लिम लीग ने इसका विरोध किया। जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग के दबाव में नेहरू की अध्यक्षता वाली एक समिति ने 1937 में वंदे मातरम् को विभाजित करने का निर्णय लिया। वंदे मातरम् पर मुख्य आपत्ति इसमें लक्ष्मी, सरस्वती एवं दुर्गा के नाम पर है, लेकिन भारत माता यहां त्रिमूर्त रूपों में चित्रित हैं। समृद्धि के प्रतीक रूप में वह लक्ष्मी, ज्ञान के प्रतीक रूप में सरस्वती और शक्ति की प्रतीक के रूप में वह दुर्गा हैं।

मनुष्य जीवन के तीन महत्वपूर्ण आयामों-धन, विद्या और शक्ति को भारतीय चिंतन परंपरा में एक दार्शनिक रूप दिया गया है। वंदे मातरम् कोई धार्मिक गीत नहीं, बल्कि मातृभूमि की वंदना है। पहले स्वयं नेहरू को मूल वंदे मातरम् से आपत्ति नहीं थी। 1937 में अली सरदार जाफरी और सुभाषचंद्र बोस को अलग-अलग पत्रों में उन्होंने लिखा था कि इसमें आए शब्दों का देवी से संबंध जोड़ना हास्यास्पद है और इसके खिलाफ हल्ला-गुल्ला सांप्रदायिक लोगों द्वारा निर्मित है।

आज महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए ‘लाड़ली लक्ष्मी’, ‘भाग्य लक्ष्मी’, ‘लाडो लक्ष्मी’ आदि योजनाएं अथवा बालिका शिक्षा के लिए सरस्वती के नाम पर केंद्र-राज्यों में छात्रवृत्तियां और आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। वंदे मातरम् में लक्ष्मी, सरस्वती का नाम आने से इसका विरोध करने वाले क्या यह कहेंगे कि मुस्लिम महिलाएं-बालिकाएं लक्ष्मी, सरस्वती नामक योजनाओं को भी ठुकरा दें? वंदे मातरम् का विरोध भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों की आधी-अधूरी समझ से ज्यादा एक अनैतिक कृत्य है, जिसमें सनातन भारतीय संस्कृति का तिरस्कार और विरोध का भाव छिपा है।

अब वंदे मातरम् का विरोध राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 2026 के अनुसार एक कानूनी अपराध है। यह विरोध संविधान के अनुच्छेद 51ए (बी) का भी उल्लंघन है, जिसमें निर्देश है, 'स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखें और उनका पालन करें।' आज यदि सनातन भारतीय प्रतीकों की वजह से वंदे मातरम् का विरोध हो रहा है, तो क्या कल राष्ट्रीय ध्वज पर बौद्ध मत से जुड़े धर्मचक्र का और संवैधानिक एवं सैन्य संस्थाओं से जुड़े ध्येय वाक्यों का भी विरोध होगा कि ये हिंदू धर्म से जुड़े हैं?

वैश्विक उदाहरणों को देखें तो 87 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान होने के बावजूद इंडोनेशिया ने अपने उन प्राचीन प्रतीकों को पूर्ण सम्मान दिया है, जो हिंदू धर्म से जुड़े हैं। इंडोनेशिया का राष्ट्रीय प्रतीक भगवान विष्णु का वाहन 'गरुड़' है, तो नोट पर गणेश भगवान का चित्र है। वहां के संसद भवन समेत अन्य सार्वजनिक स्थलों पर श्रीकृष्ण, अर्जुन, घटोत्कच और गरुड़ आदि की प्रतिमाएं हैं। क्या इंडोनेशिया से हमारे कथित सेक्युलर दलों को सीख नहीं लेनी चाहिए?

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में डीन योजना और सीनियर प्रोफेसर हैं)