प्रो. मनोज सिन्हा। भारत का सार्वजनिक जीवन इस समय एक गहरे अंतर्विरोध से गुजर रहा है। एक तरफ देश सुशासन, नीतिगत सुधारों और विकास की नई प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ राजनीतिक संवाद के आक्रामक और असंसदीय होने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। लोकतंत्र में विरोध करना संवैधानिक अधिकार है, लेकिन जब विरोध की भाषा से शिष्टता गायब हो जाती है, तो नीतिगत बहस का स्थान केवल व्यक्तिगत कटुता ले लेती है।

यह कसौटी सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों पर समान रूप से लागू होती है। राजनीतिक भाषा केवल विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है। वह समाज की सत्ता-संस्कृति और नागरिक चेतना का निर्माण करती है। राजनीतिक संवाद यह तय करता है कि समाज में असहमति का स्वरूप कैसा होगा। यदि अपमान और असत्यापित आरोप ही विमर्श का मुख्य जरिया बन जाएं, तो तथ्यपरक और गंभीर भाषा किनारे हो जाती है। जब शीर्ष नेतृत्व की भाषा संयमित होती है, तो समाज में विमर्श का स्तर परिपक्व बनता है। इसके विपरीत जब भाषा का स्तर गिरता है, तो उसका सीधा असर सामाजिक सद्भाव पर पड़ता है।

आज सार्वजनिक जीवन का संकट यह है कि राजनीति में नीतिगत विरोध और व्यक्तिगत हमले के बीच का अंतर मिटता जा रहा है। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन जनादेश को नकारना लोकतांत्रिक विवेक को कमजोर करता है। विरोधी दल सत्ता के वैकल्पिक दावेदार हैं, व्यवस्था के शत्रु नहीं। राजनीतिक कटुता का सबसे गंभीर परिणाम तब होता है, जब राजनीतिक विरोधी को विरोधी मानने के बजाय शत्रु मान लिया जाता है। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष, दोनों को एक-दूसरे की राजनीतिक वैधता स्वीकार करनी होती है। जब यह स्वीकार्यता कमजोर पड़ती है, तब हर असहमति देशहित और देशविरोध के द्वंद्व में बदलने लगती है। फिर संवाद का उद्देश्य दूसरे को समझना नहीं, उसे नैतिक रूप से खारिज करना बन जाता है। ऐसी राजनीति में समझौता कमजोरी दिखाई देता है और मतभेद को स्थान देना राजनीतिक अपराध जैसा बना दिया जाता है।

जब राष्ट्रीय स्तर का कोई नेता सार्वजनिक मंचों से अमर्यादित शब्दों का प्रयोग करता है, तो पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक उसी भाषा को अपना मानक मान लेते हैं। इस प्रकार मंचों से शुरू हुआ भाषाई प्रदूषण धीरे-धीरे समूचे सामाजिक परिवेश को प्रभावित करता है। नेताओं को यह याद रखना होगा कि वे समाज के सार्वजनिक आचरण का पैमाना भी तय करते हैं। सरकार की नीतियों पर कठोर प्रश्न लोकतंत्र की आवश्यकता है, लेकिन प्रश्न को बिना साक्ष्य आरोप बना देना उचित नहीं।

चुनावी प्रक्रिया, संवैधानिक संस्थाओं या सरकार की नीयत पर गंभीर आरोप केवल राजनीतिक मंच से दोहराने भर से प्रमाणित नहीं हो जाते। जितना गंभीर आरोप होगा, उतना ही ठोस उसका प्रमाण अपेक्षित होगा। जब हर सरकारी निर्णय को विफलता, हर विवाद को संकट और हर राजनीतिक असहमति को षड्यंत्र बताया जाने लगे, तो जनता धीरे-धीरे इन शब्दों के प्रति उदासीन हो जाती है। तब वास्तविक समस्या भी उसी शोर में दब जाती है। ऐसा विरोध अधिक प्रभावी होता है, जो अपनी गंभीरता बचाए रखे। लोकतंत्र में प्रभावशाली विपक्ष वह नहीं जो सबसे ऊंची आवाज में बोले, बल्कि वह है जिसकी बात सुनकर सत्ता को जवाब देना पड़े और जनता को विचार करना पड़े। अतिरेक राजनीतिक भाषा को आक्रामक बना सकता है, प्रभावी नहीं।

हमारे सार्वजनिक जीवन में मतभेद के बावजूद संवाद की एक लंबी परंपरा रही है। संसद केवल संख्याबल का मंच नहीं है। वह उस राजनीतिक संस्कार की भी परीक्षा है, जिसमें विरोधी मत को सुनने की क्षमता हो। संसद में भाषा की मर्यादा का महत्व इसलिए भी अधिक है कि वहां बोले गए शब्द संसदीय अभिलेख का हिस्सा बनते हैं। बहस का उद्देश्य प्रतिद्वंद्वी को अपमानित करना नहीं, अपने तर्क को मजबूत करना है।

आज राजनीतिक भाषण का एक बड़ा हिस्सा डिजिटल मीडिया की त्वरित प्रतिक्रिया और दृश्यता को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। उत्तेजक वाक्य और अमर्यादित बयान अक्सर तेजी से फैलते हैं, जबकि तथ्य और संदर्भ पीछे छूट जाते हैं। 'वायरल होना' और 'विश्वसनीय होना' दो बिल्कुल अलग बातें हैं। उत्तेजना फैलाकर कुछ समय के लिए ध्यान तो खींचा जा सकता है, लेकिन उससे राजनीतिक साख और जनाधार नहीं बनता। सरकार की नीतियों की तीखी आलोचना लोकतंत्र को जीवंत बनाती है, लेकिन नीतिगत आलोचना और संस्थाओं पर सायास सवाल खड़े करने में बड़ा अंतर है।

यदि हर निर्णय के बाद न्यायपालिका या संवैधानिक निकायों की कार्यप्रणाली पर बिना किसी ठोस साक्ष्य के सवाल उठाए जाएंगे, तो इससे आम नागरिक का संवैधानिक व्यवस्था पर से भरोसा डगमगाने लगेगा। संस्थाओं की साख को चोट पहुंचाना लोकतंत्र की नींव को कमजोर करता है। जब राजनीतिक ऊर्जा लगातार आरोप-प्रत्यारोप में खर्च होने लगे, तो नीति पर गंभीर बहस पीछे छूट जाती है। संसद में सरकार से जवाब मांगना जरूरी है, किंतु हर प्रश्न का उद्देश्य नीति को बेहतर बनाना होना चाहिए। सरकार का भी दायित्व केवल आलोचना का उत्तर देना नहीं, अपने निर्णयों को तथ्य एवं परिणामों के आधार पर सामने रखना है। यदि राजनीति का केंद्र शासन और नीति के बजाय लगातार आरोप बन जाए, तो नुकसान पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का होता है।

लोकतांत्रिक मर्यादा की रक्षा केवल नेताओं के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती। नागरिक किस प्रकार की राजनीतिक भाषा को महत्व देते हैं, इससे भी सार्वजनिक जीवन की दिशा तय होती है। जनता का विवेक ही असभ्य भाषा पर सबसे बड़ा लोकतांत्रिक अंकुश है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि चुनाव आते-जाते हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन राजनीतिक संस्कार लंबे समय तक रहते हैं। भारत को मर्यादा-युक्त विरोध चाहिए। आक्रामकता लोकतांत्रिक राजनीति की ऊर्जा हो सकती है, लेकिन अभद्रता उसकी शक्ति नहीं बन सकती। सत्ता बदल सकती है, दल बदल सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक भाषा के संस्कार समाज में लंबे समय तक रहते हैं। इसलिए राजनीति को जीतने से पहले अपने शब्दों को जीतना होगा।

(लेखक आर्यभट्ट कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रिंसिपल हैं)