जागरण संपादकीय: निरंकुश साइबर ठग
सरकार को इस पर गंभीरता से ध्यान देना होगा कि साइबर अपराधों की छानबीन करने वाली पुलिस और अन्य एजेंसियां तकनीकी कौशल में कहीं अधिक समर्थ बनें। अभी वे डाल-डाल हैं तो साइबर ठग पात-पात।
HighLights
मुंबई में दो साइबर ठग गिरफ्तार, सैकड़ों करोड़ का घोटाला।
20 राज्यों में फैला था यह संगठित साइबर अपराध नेटवर्क।
पुलिस को तकनीकी कौशल में सशक्त बनाने की आवश्यकता है।
साइबर धोखाधड़ी में लिप्त दो लोगों की मुंबई से गिरफ्तारी के बाद जिस तरह यह उजागर हुआ कि उनकी ओर से ठगी गई रकम सैकड़ों करोड़ों रुपये हो सकती है, वह इसका सूचक है कि डिजिटल अरेस्ट, निवेश के लालच और अन्य तरीकों से साइबर धोखाधड़ी करने वाले कितने अधिक बेलगाम हो गए हैं।
ईडी की ओर से गिरफ्तार किए गए इन लोगों पर मनी लांड्रिंग के तहत भी मुकदमा चलाया जाएगा, क्योंकि वे धोखाधड़ी से हासिल धनराशि को विदेशी मुद्रा में बदलकर विदेश भेज देते थे। इस नेटवर्क की व्यापकता का पता इससे चलता है कि यह 20 राज्यों में फैला था और इसे चार सौ खातों के जरिये संचालित किया जा रहा था। इस गिरोह के शिकार लोगों की संख्या सैकड़ों में है।
इसका मतलब है कि साइबर धोखाधड़ी का काम एक तरह से एक उद्यम की तरह चलाया जा रहा था। यह संगठित अपराधियों की ओर से की जाने वाली आनलाइन डकैती ही है। हैरानी नहीं कि देश में साइबर धोखाधड़ी करने वाले इस तरह के और भी बड़े गिरोह हों। वैसे भी छोटे-मोटे गिरोहों की तो कोई गिनती ही नहीं है। उनकी सक्रियता का पता इससे चलता है कि लगभग हर दिन देश के किसी न किसी हिस्से से साइबर ठगी का कोई मामला सामने आता है।
विडंबना यह है कि बहुत कम मामलों में पुलिस ठगों तक पहुंच पाती है। इससे भी बड़ी समस्या है कि कुछ ही मामलों में धोखाधड़ी करके हड़पी गई राशि पीड़ित व्यक्तियों को मिल पाती है। साइबर ठगों तक पुलिस की मुश्किल से पहुंच का एक कारण यह है कि वे दूरदराज से और कई बार तो विदेश में बैठकर ठगी करते हैं।
साइबर ठगी के बढ़ते मामलों का संज्ञान सुप्रीम कोर्ट भी ले चुका है और वह कुछ मामलों की जांच सीबीआइ को भी सौंप चुका है, लेकिन यह कहना कठिन है कि साइबर अपराधियों पर कोई प्रभावी लगाम लग पा रही है। वे नए-नए तरीकों से ठगी करने में सफल हैं। इसका प्रमाण यह भी है कि साइबर ठगी के जरिये लोगों से हड़पी गई राशि बढ़ती ही जा रही है। वैसे तो बैंकों में जमा धन की हेराफेरी पहले भी होती थी, लेकिन इसके मामले बहुत कम होते थे और अधिकतर मामलों में धोखाधड़ी करने वाले पकड़े जाते थे, लेकिन साइबर अपराधी बिल्कुल निरंकुश दिख रहे हैं।
यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि साइबर ठग पुलिस से दो कदम आगे हैं। एक ऐसे समय जब आनलाइन बैंकिंग और डिजिटल लेनदेन का चलन बढ़ता जा रहा है, तब साइबर ठगी पर प्रभावी अंकुश न लग पाना गंभीर चिंता की बात है। सरकार को इस पर गंभीरता से ध्यान देना होगा कि साइबर अपराधों की छानबीन करने वाली पुलिस और अन्य एजेंसियां तकनीकी कौशल में कहीं अधिक समर्थ बनें। अभी वे डाल-डाल हैं तो साइबर ठग पात-पात। वे इतने शातिर हैं कि अच्छे-खासे पढ़े-लिखे लोग भी उनकी चपेट में आ जा रहे हैं।












