जागरण संपादकीय: सबक सिखाने वाली आपदा
भारत को इस दिशा में सक्रिय होना चाहिए कि कैसे चीन, नेपाल, भूटान के सहयोग से एक ऐसे साझा तंत्र का निर्माण हो, जो हिमालय की चोटियों में होने वाले बदलाव की निगरानी में सहायक साबित हो सके।
HighLights
नेपाल में तिब्बत से आई बाढ़ ने मचाई तबाही।
ग्लोबल वार्मिंग से ग्लेशियर पिघलना मुख्य कारण।
भारत, चीन, नेपाल, भूटान को मिलकर करनी होगी निगरानी।
नेपाल में तिब्बत से आई बाढ़ से मची तबाही कितनी व्यापक है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि लापता होने एवं मरने वालों की संख्या के साथ आधारभूत ढांचे की क्षति का अनुमान लगाना कठिन हो रहा है। इस आपदा में भारत और नेपाल के साथ उन देशों के नागरिकों ने भी जान गंवाई है, जो पर्यटन और तीर्थाटन के लिए नेपाल गए थे और वहां से कैलास मानसरोवर की यात्रा के लिए चीन जाने वाले थे।
नेपाल से सटे तिब्बत में हिमालय की ऊंचाई पर ग्लेशियर टूटने से जो बाढ़ आई, उसके कारणों का अध्ययन जारी है, लेकिन यह साफ है कि इसके पीछे कहीं न कहीं धरती का बढ़ता तापमान भी जिम्मेदार है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते ग्लेशियर कहीं अधिक तेजी से पिघल रहे हैं और वे हिमालयी क्षेत्र में बार-बार तबाही ला रहे हैं।
ऐसी प्रत्येक आपदा यह बताती है कि प्रकृति का संरक्षण आवश्यक है। वैसे तो जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए लगातार विश्वस्तरीय सम्मेलन हो रहे हैं और उनमें ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के उपायों पर सहमति भी बन रही है, लेकिन उन पर अमल नहीं हो रहा है। इसका एक बड़ा कारण विकसित देशों का रवैया है। वे अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार नहीं हैं।
हालांकि विकसित देश भी जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रहे हैं और इसका प्रमाण है पिछले दिनों यूरोप में पड़ी भीषण गर्मी, लेकिन इसके बाद भी ग्लोबल वार्मिंग का सामना करने में गंभीरता का परिचय नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि क्षेत्र विशेष के देश आपस में मिलकर इस समस्या का सामना करने के लिए एकजुट हों।
चूंकि हिमालय क्षेत्र ग्लोबल वार्मिंग से कहीं अधिक प्रभावित हो रहा है और यह भूकंप की दृष्टि से भी अत्यंत संवेदनशील है, इसलिए भारत, चीन, नेपाल और भूटान को एक साथ आकर ऐसे प्रबंध करने चाहिए, जिससे ग्लेशियरों की निगरानी की जा सके और उनके पिघलने-टूटने की स्थिति को लेकर संबंधित देशों को समय पर सूचना दी जा सके।
आज ग्लेशियरों की उपग्रह के जरिये निगरानी आसानी से की जा सकती है। हिमालयी क्षेत्र के देशों को यह काम मिलकर करना चाहिए। दुर्भाग्य से इस मामले में सबसे बड़ी बाधा चीन का रवैया है। वह कई बार पड़ोसी देशों को हिमस्खलन अथवा हिमालयी नदियों में बाढ़ के बारे में समय रहते आवश्यक सूचनाएं भी नहीं देता।
इसके अलावा वह इस नाजुक क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करने वाले निर्माण कार्य भी कर रहा है। यह निर्माण जोखिम को बढ़ाने वाला है। भारत को इस दिशा में सक्रिय होना चाहिए कि कैसे चीन, नेपाल, भूटान के सहयोग से एक ऐसे साझा तंत्र का निर्माण हो, जो हिमालय की चोटियों में होने वाले बदलाव की निगरानी में सहायक साबित हो सके।
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