विचार: भगत सिंह का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सावरकर की करते थे तारीफ
पाठ्य-पुस्तकों, लेखों और सार्वजनिक विमर्श में विशेष रूप से भगत सिंह को एक मार्क्सवादी क्रांतिकारी के रूप में स्थापित करने का प्रयास हुआ, जबकि विनायक दामोदर सावरकर जैसे क्रांतिकारी को प्रायः सांप्रदायिक खांचे में रखकर प्रस्तुत किया गया।
HighLights
भगत सिंह सावरकर को क्रांतिकारी आदर्श मानते थे।
उन्होंने सावरकर की पुस्तकें क्रांतिकारियों में प्रचारित कीं।
सावरकर ने भगत सिंह की फांसी पर काला झंडा फहराया।
अरुण आनंद। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी। देश इस दिन को ‘बलिदान दिवस’ के रूप में स्मरण करता है। उनके बलिदान ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया। किंतु समय के साथ इस बलिदान की व्याख्या, अक्सर एक विशेष वैचारिक दृष्टिकोण के माध्यम से की जाती रही।
पाठ्य-पुस्तकों, लेखों और सार्वजनिक विमर्श में विशेष रूप से भगत सिंह को एक मार्क्सवादी क्रांतिकारी के रूप में स्थापित करने का प्रयास हुआ, जबकि विनायक दामोदर सावरकर जैसे क्रांतिकारी को प्रायः सांप्रदायिक खांचे में रखकर प्रस्तुत किया गया। परंतु जब इतिहास के पन्नों को ध्यान से देखा जाता है तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है।
वास्तव में भगत सिंह और सावरकर, दोनों ही भारत को एक सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में देखते थे और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा से प्रेरित थे। एक-दूसरे के विचारों और कार्यों का उन पर गहरा प्रभाव था। वीर सावरकर और भगत सिंह के संबंधों से जुड़े कई ऐतिहासिक तथ्य इस बात की पुष्टि करते हैं।
पुख्ता है प्रमाण
प्रसिद्ध मराठी इतिहासकार य. दि. फड़के के अनुसार, भगत सिंह सावरकर को बतौर क्रांतिकारी एक आदर्श के रूप में देखते थे। उन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर सावरकर की प्रसिद्ध पुस्तक ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित कराया और उसे क्रांतिकारियों के बीच प्रचारित भी किया। (संदर्भ- शोध सावरकरांचा, य. दि. फडके, श्रीविद्या प्रकाशन, पुणे)
सावरकर की एक अन्य पुस्तक ‘हिंदूपदपादशाही’ का भी भगत सिंह पर प्रभाव दिखाई देता है। अपनी जेल डायरी में उन्होंने इस पुस्तक से कई उद्धरण दर्ज किए हैं। उदाहरण के लिए-
‘बलिदान की सराहना केवल तभी की जाती है जब बलिदान वास्तविक हो या सफलता के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हो।
लेकिन जो बलिदान अंततः सफलता की ओर नहीं ले जाता है, वह आत्मघाती है और इसलिए मराठा युद्धनीति में उसका कोई स्थान नहीं था।’ (हिंदूपदपादशाही, पृष्ठ 257) और साथ ही ‘वीरता के कार्य किए बिना, वीरता का प्रदर्शन किए बिना और साहस के साथ इतिहास रचे बिना इतिहास लिखना हमारे समय का एक बुरा स्वप्न है। वीरता को वास्तविकता में बदलने का अवसर न मिलना हमारे लिए खेद का विषय है।’ (हिंदूपदपादशाही, पृष्ठ 265-266)
स्पष्ट था सम्मान
भगत सिंह के लेखन में भी सावरकर के प्रति सम्मान स्पष्ट दिखाई देता है। कोलकाता से निकलने वाले साप्ताहिक ‘मतवाला’ के 15 और 22 नवंबर 1924 के अंक में उनका एक लेख ‘विश्व प्रेम’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। इसमें वे लिखते हैं- ‘विश्वप्रेमी वह वीर है जिसे भीषण विप्लववादी, कट्टर अराजकतावादी कहने में हम लोग तनिक भी लज्जा नहीं समझते - वही वीर सावरकर। विश्वप्रेम की तरंग में आकर वे घास पर चलते-चलते रुक जाते कि कहीं कोमल घास पैरों तले न मसली जाए।’
यह लेख बलवंत सिंह के छद्म नाम से लिखा गया था। (संदर्भ- भगतसिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज, पृष्ठ संख्या 93, पुनर्मुद्रण मई 2019, राहुल फाउंडेशन, लखनऊ)। ध्यान देने योग्य बात यह है कि जिस समय भगत सिंह ने यह लेख लिखा, उस समय सावरकर रत्नागिरी में नजरबंद थे और उन पर राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा हुआ था।
इसी प्रकार भगत सिंह ने ‘किरती’ नामक प्रकाशन में मार्च 1928 से अक्टूबर 1928 तक ‘आजादी की भेंट शहादतें’ शीर्षक से एक लेखमाला लिखी। इसमें कर्जन वायली की हत्या करने वाले क्रांतिकारी मदनलाल ढींगरा और सावरकर का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं- ‘स्वदेशी आंदोलन का असर इंग्लैंड तक भी पहुंचा और वहां पहुंचते ही श्री सावरकर ने ‘इंडिया हाउस’ नामक सभा की स्थापना की। मदनलाल भी उसके सदस्य बने… एक दिन रात को श्री सावरकर और मदनलाल ढींगरा बहुत देर तक मशवरा करते रहे।
अपनी जान तक दे देने के साहस की परीक्षा लेने के लिए सावरकर ने मदनलाल से जमीन पर हाथ रखने को कहा और उनके हाथ पर सुआ गाड़ दिया, लेकिन उस पंजाबी वीर ने आह तक नहीं भरी। सुआ निकाल लिया गया। दोनों की आंखों में आंसू भर आए और वे एक-दूसरे के गले लग गए। आहा, वह समय कितना सुंदर था… हम दुनियादार लोग क्या जानें कि देश और कौम के लिए प्राण न्योछावर करने वाले वे लोग कितने ऊंचे, कितने पवित्र और कितने पूजनीय होते हैं!’ (संदर्भ- भगतसिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज, पृष्ठ संख्या 166-168)
शोक में काला ध्वज
23 मार्च 1931 को जब भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई, तब सावरकर ने उनकी स्मृति में एक कविता लिखी-
‘हा, भगत सिंह, हाय हा!
चढ़ गया फांसी पर तू वीर हमारे लिए, हाय हा!
राजगुरु तू, हाय हा!
वीर कुमार, राष्ट्रसमर में हुआ शहीद,
हाय हा! जय जय हा! ……’
रत्नागिरी में सावरकर के घर हमेशा भगवा झंडा फहराया जाता था किंतु भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के बलिदान के अगले दिन काला झंडा फहराया गया। यह उनके प्रति सावरकर की श्रद्धांजलि का प्रतीक था। भगत सिंह के साथियों-जैसे भगवतीचरण वोरा ने भी अपने लेखन में सावरकर और उनके साहित्य के प्रभाव का उल्लेख किया है। इन संदर्भों का विस्तृत विवरण ‘भगतसिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज’ में है।
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)












