विचार: ट्रंप की मनमानी, अहंकार के चलते विश्व को संकट की ओर धकेला
अमेरिका की ओर से इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमले के तीन सप्ताह बीत गए, लेकिन किसी को समझ नहीं आ रहा कि आखिर अमेरिका का मंतव्य क्या है और यह युद्ध कैसे और कब रुकेगा? ईरान ने अमेरिका और इजरायल के हमले के प्रतिकार के लिए हरसंभव तरीके अपनाने की रणनीति अपना ली है।
HighLights
ईरान पर अमेरिकी हमला वैश्विक संकट का मुख्य कारण।
ट्रंप की मनमानी से ऊर्जा संकट, महंगाई में वृद्धि।
अमेरिकी राष्ट्रपति की अत्यधिक शक्तियां विश्व शांति को खतरा।
संजय गुप्त। अमेरिका की ओर से इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमले के तीन सप्ताह बीत गए, लेकिन किसी को समझ नहीं आ रहा कि आखिर अमेरिका का मंतव्य क्या है और यह युद्ध कैसे और कब रुकेगा? ईरान ने अमेरिका और इजरायल के हमले के प्रतिकार के लिए हरसंभव तरीके अपनाने की रणनीति अपना ली है।
वह इजरायल को निशाना बनाने के साथ खाड़ी देशों में नागरिक ठिकानों और ऊर्जा स्रोतों पर भी इस बहाने हमले कर रहा है कि यहां अमेरिकी सैनिक अड्डे हैं। उसने खाड़ी देशों के ऊर्जा ठिकानों पर हमले करके युद्ध को एक नया विस्तार दे दिया है। उसने तेल और गैस की सप्लाई वाले समुद्री मार्ग होर्मुज को बाधित कर विश्व के समक्ष ऊर्जा संकट भी गहरा दिया है।
अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के साथ उनके कई सहयोगी और सैन्य अधिकारी मारे जा चुके हैं, पर इसके बाद भी वहां सत्ता परिवर्तन के कोई संकेत नहीं। प्रारंभ में अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि ईरान पर हमलों का उद्देश्य वहां सत्ता परिवर्तन करना और उसकी परमाणु हथियार बनाने की क्षमता खत्म करना है। चूंकि युद्ध लंबा खिंच रहा है और तेल एवं गैस की आपूर्ति बाधित होने के साथ उनके मूल्य भी लगातार बढ़ रहे हैं, इसलिए भारत समेत कई देशों में महंगाई के साथ बेरोजगारी बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
महंगी ऊर्जा का असर यूरोप और अमेरिका में भी दिखने लगा है। ट्रंप की चुनौती इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि उनके इस अनुरोध को अमेरिका के मित्र राष्ट्र और यहां तक कि नाटो देश भी स्वीकार करने को तैयार नहीं कि वे होर्मुज जल मार्ग की सुरक्षा के लिए अपनी नौसेनाएं भेजें। इससे ट्रंप अलग-थलग पड़ते दिख रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तो उन्हें ऐसे शासनाध्यक्ष के रूप में देखा जा रहा है, जिसने विश्व को संकट की ओर धकेल दिया। इसके साथ ही घर में भी उनका विरोध बढ़ रहा है।
ईरान जवाबी हमले करने के साथ जिस तरह खाड़ी के देशों में ऊर्जा ठिकानों को निशाना बना रहा है, उससे साफ है कि उसका इरादा ऊर्जा संकट बढ़ाना है। अमेरिका इस संकट को कम करने में सक्षम नहीं दिख रहा। इसके बाद भी राष्ट्रपति ट्रंप का अहंकारपूर्ण रवैया जारी है। वे ऐसे सवालों से घिर रहे हैं कि अमेरिकी संसद की मंजूरी लिए बिना उन्होंने ईरान पर किस अधिकार से हमला कर दिया? उनके एक शीर्ष अधिकारी ने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि ईरान से अमेरिका को कोई खतरा नहीं था और वह परमाणु बम बनाने के करीब भी नहीं था। यह पहली बार नहीं, जब अमेरिका ने किसी देश पर मनमाने तरीके से हमला किया हो अथवा वहां जबरन सत्ता परिवर्तन कराने की कोशिश की हो।
अमेरिकी राष्ट्रपतियों के ऐसे कृत्यों का एक लंबा इतिहास है। वियतनाम से लेकर इराक, अफगानिस्तान, लीबिया आदि में अमेरिका के हमले उसकी मनमानी का ही परिचायक रहे। दूसरे देशों में अमेरिका के कुछ हमलों को तो इसलिए वैधता मिली, क्योंकि या तो संयुक्त राष्ट्र ने उस देश की गतिविधियों की आलोचना करते हुए उसे विश्व शांति के लिए खतरा बताया या फिर नाटो देशों अथवा यूरोपीय संघ ने संबंधित देश में दखल देने की जरूरत जताई। ऐसे अनेक हमलों के पीछे अमेरिका ने आत्मरक्षा के अधिकार की आड़ ली या फिर संबंधित देश में जनसंहार होने अथवा वह जनसंहारक हथियार होने का खतरा दिखाया।
अमेरिका ने कुछ ऐसे कानून बना रखे हैं, जो उसे किसी अन्य देश में आत्मरक्षा के नाम पर सैन्य हस्तक्षेप करने का अधिकार देते हैं। एक ऐसा ही कानून 9/11 के बाद बना था। इसे सैन्य बल उपयोग प्राधिकरण नाम से जाना जाता है। ट्रंप ने इसी कानून का सहारा लेकर ईरान पर हमला किया। उन्होंने इस हमले को सही ठहराने के लिए राष्ट्रपति की युद्ध शक्तियों का हवाला दिया। इसे कई कानूनी विशेषज्ञ अवैध बता रहे हैं, पर ट्रंप बेपरवाह हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति सेना के सर्वोच्च कमांडर होते हैं, लेकिन युद्ध की औपचारिक घोषणा करने का अधिकार संसद के पास है। राष्ट्रपति आपातकालीन स्थिति में बिना उसकी स्वीकृति के कहीं पर सैन्य कार्रवाई कर सकते हैं, पर उन्हें 48 घंटे के भीतर संसद को सूचित करना होता है और यदि वहां से मंजूरी न मिले तो 60-90 दिनों के भीतर सैन्य कार्रवाई रोकनी पड़ती है। समस्या यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के पास संसद के फैसले को वीटो करने का भी अधिकार है। संसद इस वीटो को पलट तो सकती है, पर दो तिहाई बहुमत के साथ।
अमेरिका विश्व के सबसे पुराने लोकतंत्र में से एक है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति अपने जरूरत से ज्यादा अधिकारों का दुरुपयोग कहीं आसानी से करने में समर्थ हो जाते हैं और जब वहां ट्रंप जैसा अहंकारी राष्ट्रपति आ जाता है तो वह विश्व व्यवस्था के लिए खतरा बन जाता है। इस पर खुद अमेरिका को विचार करना चाहिए कि आखिर इतना शक्तिसंपन्न राष्ट्रपति उसके अपने कितने हित में है? अमेरिकी राष्ट्रपति जब-तब किसी भी देश पर आर्थिक प्रतिबंध लगा देते हैं।
इसी तरह वे किसी भी देश के आयात पर प्रशासनिक आदेशों के सहारे मनमाने टैरिफ लगा देते हैं। यह तो गनीमत रही कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप टैरिफ को अवैध करार दिया, पर वे अन्य तरीकों से फिर से विभिन्न देशों पर टैरिफ लगाने के बहाने खोज रहे हैं। ऐसा करके वे अपनी तानाशाही मानसिकता का ही परिचय दे रहे हैं।
चूंकि अमेरिका सैन्य और आर्थिक रूप से सबसे शक्तिशाली देश है, इसलिए वह मनमानी करने में समर्थ रहता है। दूसरे देशों पर सैन्य दखल या फिर जबरन सत्ता परिवर्तन के मामले में उसका रवैया तानाशाही वाला है। ट्रंप ने अभी हाल में जिस तरह वेनेजुएला पर हमला कर वहां के राष्ट्रपति का अपहरण किया, वह तानाशाही कृत्य के अलावा और कुछ नहीं।
इसी तरह उन्होंने जब ग्रीनलैंड कब्जाने की धमकी दी, तो वह भी उनके मनमानेपन का ही परिचायक थी। पिछले दिनों क्यूबा पर कब्जा करने की उनकी धमकी भी मनमानी ही है। अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसी मनमानी दिखाने में इसीलिए समर्थ हो जाते हैं, क्योंकि संविधान से उसे आवश्यकता से अधिक अधिकार मिले हुए हैं। यह स्थिति न तो अमेरिकी लोकतंत्र के लिए शुभ है और न ही विश्व व्यवस्था के लिए।
[लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं]












