आदित्य सिन्हा। ईरान पर इजरायल-अमेरिका के हमले के तीन सप्ताह गुजरने के बाद उसकी तपिश पूरी दुनिया को झेलनी पड़ रही है। युद्ध में रक्तपात और सैन्य खर्च तो बढ़ते ही हैं, लेकिन उसके साथ ही दुश्वारियों का एक अंतहीन सिलसिला भी शुरू हो जाता है। दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर बढ़ते दबाव से लेकर उत्पादन के स्तर पर आ रही सुस्ती इसका एक उदाहरण है। तेल-गैस की किल्लत मुश्किलों को और बढ़ाने ही वाली है।

अगर सीधे वित्तीय बोझ की बात करें तो केवल पहले सप्ताह में ही अमेरिका को 11.3 अरब डालर खर्च करने पड़े। युद्ध से जुड़े मोर्चे को मजबूत बनाए रखने के लिए अमेरिकी रक्षा मुख्यालय पेंटागन ने सालाना 838 अरब डालर के रक्षा बजट से इतर और 200 अरब डालर की मांग सामने रखी है। यह 200 अरब डालर की राशि उससे भी अधिक है , जितनी अमेरिका ने गत वर्ष अपने अपेक्षाकृत गरीब लोगों को खाद्य सामग्री उपलब्ध करने पर खर्च की।

युद्ध की कीमत केवल रक्षा खर्च में बढ़ोतरी के मोर्चे पर ही नहीं चुकानी पड़ती, बल्कि इसका असर कहीं व्यापक होता है। होर्मुज जल मार्ग में गतिरोध इसका एक बड़ा उदाहरण है। अमेरिका-इजरायल के हमलों के जवाब में ईरान ने इस तंग जलमार्ग में आवाजाही को अपने हिसाब से नियंत्रित किया है, जिसकी वजह से दुनिया भर में तेल एवं गैस आपूर्ति के समीकरण बिगड़ गए हैं। समझ लीजिए कि होर्मुज वह पाइपलाइन है, जिससे दुनिया के 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होती है। ईरान ने इस पाइपलाइन को ही बंद कर दिया है। उसके बाद से ही खाड़ी देशों में तेल उत्पादन औसतन एक करोड़ बैरल प्रतिदिन तक घटा है।

होर्मुज से तेल की ढुलाई युद्ध से पहले की तुलना में 10 प्रतिशत से भी कम रह गई है। तेल की कीमतें 72 डालर प्रति बैरल से बढ़कर 113 डालर बैरल तक पहुंचती दिख रही हैं। कई जानकार इसे अभी तक का सबसे बड़ा तेल संकट करार दे रहे हैं। आम लोगों के लिए इसका यही अर्थ है कि पेट्रोल-डीजल महंगी हो जाएंगे। रसोई गैस की कीमतें चढ़ेंगी। फैक्ट्रियों में उत्पादन से लेकर ट्रकों के जरिये ढुलाई के दाम बढ़ेंगे। उर्वरकों के जरिये खेती भी महंगी होगी। तेल की कीमतों में दस प्रतिशत की बढ़ोतरी महंगाई की दर में सामान्य तौर पर 0.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी करती है। युद्ध छिड़ने के बाद से तेल के दाम 50 प्रतिशत से अधिक तक बढ़ गए हैं।

गैस आपूर्ति का मुद्दा भी चिंता बढ़ा रहा है। विश्व में गैस की 20 प्रतिशत आपूर्ति कतर से होती है। यूरोप से लेकर एशिया तक फैक्ट्रियों को चलाने, घरों को गर्म रखने, खाना पकाने और उर्वरक बनाने के लिए इसी गैस पर बड़ी हद तक निर्भर हैं। मार्च के महीने में ही कतर का मुख्य गैस संयंत्र दो बार हमलों का शिकार बन चुका है। उसे इतना नुकसान पहुंचा है कि उसकी भरपाई में लंबा समय लगेगा और आपूर्ति को सामान्य होने में उससे भी अधिक वक्त। दुनिया के किसी भी हिस्से में गैस के बड़े रणनीतिक भंडार की कोई व्यवस्था नहीं। समझिए कि अगर पाइप बंद हुआ तो बैकअप में कोई टैंक नहीं है। इसका असर किसानों को खेतों से लेकर लोगों को रसोई तक दिखने भी लगा है। छह दिनों के दायरे में यूरिया की कीमतें 32 प्रतिशत बढ़ गई हैं। भारत में जल्द ही खरीफ की बोआई भी शुरू होने वाली है। इसमें गतिरोध पैदा होता है तो उसका असर और घातक होने वाला है।

क्या यह घटनाक्रम दुनिया में मंदी की दस्तक का संकेत है? मंदी का अर्थ है फैक्ट्रियों में उत्पादन का घटना, भर्तियों का कम होना, आमदनी का सिकुड़ना और अंतत: अर्थव्यवस्था का सुस्त पड़ना। भले ही दुनिया भर में अर्थशास्त्री मंदी की बात स्वीकारने में हिचक दिखा रहे हैं, लेकिन इसकी भरी-पूरी आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता। यहां तक कि युद्ध शुरू होने से पहले भी हालात कोई बहुत अच्छे नहीं थे। कई प्रमुख आर्थिक संकेतक अगले एक साल के दौरान मंदी के 49 प्रतिशत तक आसार का इशारा कर रहे थे। युद्ध शुरू होने के बाद अब मंदी की आशंका करीब-करीब 50 प्रतिशत तक बढ़ गई है। कई बैंक इसकी 25 प्रतिशत तक आशंका व्यक्त कर रहे हैं। कुछ 35 प्रतिशत तो कुछ अन्य के अपने पैमाने हैं, लेकिन मंदी की बात सिरे से नकारी नहीं जा रही है।

महामारी जैसी आपदाओं को छोड़ें तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आने वाली लगभग हर बड़ी आर्थिक आपदा की जड़ें तेल की कीमतों में एकाएक बढ़ोतरी से जुड़ी रही हैं। विश्व के प्रमुख केंद्रीय बैंक अब बहुत असहज स्थिति से जूझ रहे हैं। ब्याज दरों में बढ़ोतरी से जहां महंगाई पर एक हद तक अंकुश लगाया जा सकता है, लेकिन इससे वृद्धि की संभावनाओं पर भी आघात होता है। वहीं, ब्याज दरों में कटौती से वृद्धि को बढ़ावा मिलता है, लेकिन महंगाई बढ़ने का जोखिम भी रहता है। फिलहाल तो अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने गत सप्ताह यथास्थिति ही बनाए रखी है, लेकिन यह कोई भरोसे का संकेत नहीं, बल्कि अनिश्चितता का संकेत अधिक है।

पश्चिम एशिया में भड़की युद्ध की यह आग आर्थिकी के कई क्षेत्रों को झुलसाने भी लगी है। रियल एस्टेट डेवलपर परियोजनाओं को लटका रहे हैं, क्योंकि उनके लिए टाइल्स जैसी वस्तुओं की किल्लत होने लगी है। टायर निर्माताओं को पेट्रोलियम आधारित सामग्री मिलना मुश्किल हो गया है। टेक्सटाइल क्लस्टर्स में ईंधन की किल्लत से काम नहीं हो पा रहा है। तमाम उद्योग पहले से मौजूद ऊर्जा भंडार से ही काम चला रहे हैं, लेकिन यह भंडार हमेशा तो नहीं ही चल पाएगा। एक प्रमुख अर्थशास्त्री ने चेताया है कि हर गुजरते हुए दिन के साथ आपूर्ति शृंखला के समक्ष संकट बढ़ता जा रहा है।

ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाले खेमे का कहना है कि वह परमाणु खतरे को समाप्त करने के लिए ऐसा कर रहे हैं। हालांकि उनके इस उपक्रम में ऊर्जा आपूर्ति शृंखला में गतिरोध पैदा हो गया है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था का ईंधन है। अगर यह युद्ध और खिंचता रहा तो दुनिया में मंदी का डर और गहराता जाएगा। वैश्विक जीडीपी को चार से पांच प्रतिशत की क्षति पहुंचना कोई बड़ी बात नहीं होगी। अर्थशास्त्री भले ही तमाम बातों को हिचक के साथ कहते हों, लेकिन आंकड़े एवं प्रमुख संकेतक वास्तविकता को प्रकट करने से नहीं हिचकते।

(लेखक लोक-नीति विश्लेषक हैं)