अमेरिका की ओर से इजरायल के खिलाफ छेड़ा गया युद्ध जिस तरह चौथे सप्ताह में प्रवेश कर गया, उससे यही लगता है कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान की सैन्य क्षमता का आकलन सही तरह नहीं किया। इसका प्रमाण केवल यह नहीं है कि ईरान जवाबी कार्रवाई करने में सक्षम बना हुआ है, बल्कि यह भी है कि वह इजरायल और अमेरिका के ऐसे ठिकानों को निशाना बनाने में लगा हुआ है, जिनकी कल्पना नहीं की जाती थी।

लगता है अमेरिका और इजरायल यह मानकर चल रहे थे कि जैसे पिछले वर्ष जून में उनके हमलों के सामने ईरान दो सप्ताह के अंदर ही एक तरह से पस्त पड़ गया था, वैसे ही इस बार भी पड़ जाएगा। यह साफ है कि ईरान ने इस आकलन को विफल कर दिया। इसका कारण यही हो सकता है कि उसने पिछले वर्ष अमेरिका एवं इजरायल के हमलों का सामना करने के बाद अपनी सैन्य तैयारियों पर खासा जोर दिया और कहीं अधिक व्यापक मारक क्षमता विकसित की।

यह भी स्पष्ट ही है कि अमेरिका और इजरायल यह नहीं भांप सके कि ईरान लड़ाई को विस्तार देने के लिए खाड़ी के देशों में नागरिक ठिकानों के साथ वहां के ऊर्जा स्रोतों को भी निशाना बनाकर तेल एवं गैस संकट पैदा कर सकता है।

ईरान जिस तरह युद्ध को लंबा खींचने और उसे विस्तार देने में सक्षम है, उससे यही पता चलता है कि अमेरिका और इजरायल उसे लेकर मुगालते में रहे। ऐसा तभी होता है जब कोई अपनी रणनीति और सैन्य क्षमता को लेकर अति आत्मविश्वास अथवा अहंकार से ग्रस्त हो। इसमें संदेह नहीं कि ट्रंप अहंकार से भरे शासनाध्यक्ष हैं। शायद वेनेजुएला में आनन-फानन तख्तापलट करने में सक्षम रहने के बाद उनका अहंकार और बढ़ गया और इसीलिए उन्होंने इजरायल संग ईरान पर हमला बोल दिया। अब वे इसकी कीमत चुकाते दिख रहे हैं।

वे भले ही खुद को सबसे शक्तिशाली शासनाध्यक्ष दर्शा रहे हों, लेकिन ईरान पर हमले के बाद ऊर्जा संकट गहराने के पश्चात उन्हें जिस तरह रूस से तेल खरीदने की अनुमति देनी पड़ी, वह उनकी कमजोरी का ही परिचायक रहा। नाटो देशों का उनकी मदद के लिए आगे न आना और अब उनकी ओर से यह कहना भी उनकी कमजोरी को ही बयान करता है कि अमेरिका इस युद्ध में अपने तय किए गए लक्ष्यों के काफी करीब पहुंच चुका है और वे ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियानों को कम करने पर विचार कर रहे हैं।

पता नहीं वे सच में ऐसा सोच रहे हैं या नहीं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि ईरान में सत्ता परिवर्तन के कोई आसार नहीं। यदि वे ईरान में सत्ता परिवर्तन का लक्ष्य हासिल किए बिना किसी बहाने अपने कदम पीछे खींच लेते हैं तो देश-दुनिया में उनका प्रभाव तो कम होगा ही, ईरान अमेरिका के साथ-साथ इजरायल के लिए और बड़ी चुनौती भी बन जाएगा।