विचार: पड़ोसी देशों का भरोसा तोड़ता ईरान
पड़ोसियों के बीच यह भरोसा लौटने में अधिक समय लगता है कि साथ रहा जा सकता है। कल ईरान के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही खड़ा होने वाला है कि टूटे भरोसे को फिर से कैसे हासिल किया जाए?
HighLights
ईरान के हमले दीर्घकालिक हितों के विरुद्ध, विश्वास तोड़ते हैं।
खाड़ी देशों में ईरानी समुदायों पर गहरा सामाजिक असर।
हॉर्मुज जलमार्ग धमकी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है।
रामिश सिद्दीकी। युद्ध के समय देशों के लक्ष्य बदल जाते हैं। उस समय केवल तात्कालिक बातें जैसे-जवाबी हमला, दबाव, सुरक्षा, शक्ति प्रदर्शन और अस्तित्व बचाना दिखाई देती हैं। दीर्घकालिक सोच अल्पकालिक में बदल जाता है। ऐसे में लोग अक्सर भूल जाते हैं कि युद्ध कभी शाश्वत नहीं होते। प्रथम विश्वयुद्ध भी समाप्त हुआ और द्वितीय विश्वयुद्ध भी।
हर युद्ध अंततः एक ऐसे मोड़ पर पहुंचता है, जहां असली चुनौती लड़ाई नहीं, बल्कि टूटी हुई चीजों को फिर से जोड़ना और बचे हुए लोगों के साथ दोबारा सामान्य जीवन बिताना होता है। इसी दृष्टि से आज पड़ोसी इस्लामी देशों पर ईरान के लगातार हमले दीर्घकालिक रणनीति के रूप में उसके अपने ही हितों के विरुद्ध हैं। किसी भी सैन्य कार्रवाई के पीछे तात्कालिक कारण हो सकते हैं, लेकिन उसके राजनीतिक और सामाजिक मूल्य कहीं अधिक दूर तक जाते हैं।
क्षतिग्रस्त इमारतें फिर बन सकती हैं, बाधित हवाईअड्डे फिर खुल सकते हैं और अर्थव्यवस्था भी समय के साथ संभल सकती है, पर पड़ोसियों के बीच एक बार टूटा विश्वास आसानी से वापस नहीं आता। यह विश्वास हर मिसाइल, ड्रोन हमलों के साथ और कमजोर होता जा रहा है, जो खाड़ी के देशों में नागरिक क्षेत्रों में भय पैदा करता है। यह केवल सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि ईरान और उसके पड़ोसी देशों के भविष्य का भी प्रश्न है। ईरान कोई ऐसा देश नहीं है, जो दुनिया के किसी अलग कोने में बसा हो। करीब सात देशों के साथ उसकी सीमा लगती है। संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और बहरीन जैसे देशों में लाखों की संख्या में ईरानी लोग पीढ़ियों से बसे हुए हैं।
दुबई जैसे शहरों में ईरानी लोगों की व्यापारिक उपस्थिति लंबे समय से आर्थिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। ऐसे में यदि वही देश आज ईरान के हमलों से भय और असुरक्षा महसूस करने लगें, तो यह स्थिति केवल सामरिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक संकट भी खड़े करती है। सोचने की बात यह है कि दुबई, मनामा या कुवैत में रहने वाला कोई ईरानी परिवार आज क्या महसूस कर रहा होगा?
जिस देश ने उसे काम, सुरक्षा और जीवन का आधार दिया, उसी देश पर उसके मूल देश का नाम हमलों के साथ जुड़ रहा है। रोजमर्रा का जो भरोसा लोगों को साथ रहने देता है, जब उसी में भय घर कर जाए, तो उसका असर बहुत गहरा होता है। किसी भी क्षेत्र को केवल सैन्य ताकत नहीं बांधती। उसे वह भरोसा बांधता है कि पड़ोसी एक-दूसरे के नागरिकों को डर और विनाश का माध्यम नहीं बनाएंगे।
जब किसी देश पर हमला होता है, तो उसे आत्मरक्षा का अधिकार होता है। दुनिया इसे समझती है और अंतरराष्ट्रीय कानून भी इस अधिकार को मान्यता देता है, लेकिन आत्मरक्षा का अधिकार असीमित नहीं होता। उसकी वैधता इससे तय होती है कि उसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है?
ईरान यह कहकर अपने पड़ोसी देशों के नागरिक ठिकानों और ऊर्जा स्रोतों पर हमले नहीं कर सकता कि इन देशों में अमेरिका के सैन्य ठिकाने हैं। यह अंतर समझना जरूरी है कि अपनी रक्षा करना एक बात है और युद्ध को इस तरह फैलाना कि उसका डर पड़ोस के आम लोग उठाएं, बिल्कुल दूसरी बात है।
जब से अमेरिका-इजरायल एवं ईरान का युद्ध शुरू हुआ है, तब से एक दिन ऐसा नहीं बीता, जब खाड़ी देशों में रहने वाले नागरिकों को भय के साए में न रहना पड़ा हो। न तो इन देशों में रहने वाले लोग ईरान के प्रति कोई द्वेष रखते हैं, न इनमें से कोई देश ईरान पर हुए हमले के लिए जिम्मेदार है। फिर भी ईरान प्रतिदिन इन देशों को यह कहकर निशाना बना रहा है कि वह इन देशों को नहीं, बल्कि वहां जो अमेरिकी ठिकाने हैं, उन्हें निशाना बना रहा है, लेकिन वह तो नागरिक क्षेत्रों पर हमले कर रहा है। यह न तो दीर्घकालिक नीति हो सकती है और न ही नैतिक रूप से एक टिकाऊ तर्क।
पड़ोसी देशों पर हमलों के साथ ईरान ने होर्मुज जलमार्ग बंद करने का जो निर्णय लिया, वह भी उसके अल्पकालिक सोच की तरफ इशारा करता है। यह केवल समुद्री नक्शे पर एक सामरिक बिंदु नहीं है, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण जीवनरेखा है। वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। यदि यहां गंभीर व्यवधान पैदा होता है, तो उसका असर केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया भर के आम लोगों का जीवन प्रभावित होता है।
ईरान के लिए विवेकपूर्ण रास्ता यही होगा कि वह न सिर्फ पड़ोसी खाड़ी देशों के नागरिक ठिकानों और ढांचे के प्रति संयम दिखाए, बल्कि होर्मुज जलमार्ग बंद होने के कारण बढ़ रही समस्याओं और तनाव को भी खत्म करे। आज ईरान को दीर्घकालिक सोच की जरूरत है।
युद्ध कभी स्थायी नहीं होता, लेकिन ईरान की भौगोलिक वास्तविकता जरूर स्थायी है। वर्तमान में प्रत्येक देश को व्यापार, सुरक्षा आदि के लिए अपने पड़ोसी देशों की आवश्यकता पड़ती है। यदि वही विश्वास आज क्षीण हो गया, तो कल किसी भी पुनर्निर्माण प्रक्रिया की नींव कमजोर ही रहेगी। युद्ध के बाद केवल टूटी इमारतें नहीं गिनी जातीं। यह भी देखा जाता है कि समाजों के बीच कितना भरोसा बचा है।
(लेखक इस्लामी मामलों और पश्चिम एशिया के जानकार हैं)












