राज कुमार सिंह। राज्यसभा के सभापति रहे जगदीप धनखड़, फिर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव के बाद अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध महाभियोग का नोटिस सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच अविश्वास के खतरनाक विस्तार का ही संकेत है। चुनाव केंद्रित संसदीय राजनीति में दलगत विरोध अप्रत्याशित नहीं हैं। अतीत में भी कई बार किसी मुद्दे पर सत्तापक्ष और विपक्ष में टकराव के चलते कई-कई दिन संसद नहीं चल पाई।

पूरा सत्र ही गतिरोध की भेंट चढ़ जाने के उदाहरण भी हैं, लेकिन 2014 के बाद राजनीतिक टकराव परंपराएं और लक्ष्मण रेखाएं लांघता दिख रहा है। 2024 के अंत में राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव प्रक्रियागत और तकनीकी त्रुटियों के चलते नोटिस से आगे नहीं बढ़ पाया था। उपसभापति हरिवंश ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस नियमानुसार 14 दिन पहले न देने के आधार पर खारिज करते हुए बताया था कि जगदीप धनखड़ के नाम की स्पेलिंग भी गलत लिखी गई थी।

अतीत में भी तीन बार लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव आया और हर बार गिरा भी, क्योंकि उनका चयन ही बहुमत से होता है। अल्पमत विपक्ष उन्हें हटा ही नहीं सकता, जब तक कि सत्तापक्ष में विभाजन की नौबत न आए। लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाने का सीधा अर्थ है कि बहुमत खो चुकी सरकार को भी जाना पड़ेगा। अल्पमत विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का उद्देश्य स्पीकर के प्रति असंतोष की अभिव्यक्ति ही होता है। तथ्यात्मक गलतियां ओम बिरला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव में भी थीं, पर उन्होंने स्वयं उन्हें ठीक कराते हुए पेश होने दिया।

ओम बिरला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव गंभीर आरोप-प्रत्यारोप और टकराव की हद तक चला गया तो उसके मूल में पिछली लोकसभा की कटुता भी रही, जब बिरला ही स्पीकर थे। तब रिकार्ड संख्या में विपक्षी सांसद निलंबित किए गए। उस वक्त राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष नहीं थे, पर बोलने न देने और माइक बंद कर देने के आरोप तब भी लगे थे। किसी भी सदन का संचालन अध्यक्ष की जिम्मेदारी है, पर सत्तापक्ष और विपक्ष की परस्पर समझदारी और सम्मान भाव से ही सदन सुचारु रूप से चल सकता है, लेकिन वे तो एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते। सत्तापक्ष के विरुद्ध विपक्ष की आक्रामकता का नजला स्पीकर पर गिरा। अविश्वास प्रस्ताव की परिणति जानते हुए ही विपक्ष ने मत विभाजन नहीं मांगा, लेकिन इससे यह सच नहीं बदलता कि स्पीकर पर विपक्ष का विश्वास नहीं है। अतीत में स्पीकर की भूमिका के अनुभव मिश्रित रहे हैं।

जिस ब्रिटेन से हमारी संसदीय प्रणाली प्रेरित है, वहां स्पीकर किसी दल के सदस्य नहीं होते। अपने देश में भी कभी लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने पर नीलम संजीव रेड्डी ने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफा दिए बिना भी दोनों पक्षों का सम्मान हासिल करते हुए सुचारु सदन संचालन के सोमनाथ चटर्जी और पीए संगमा सरीखे उदाहरण हैं, लेकिन अब बढ़ते तनाव से इस संस्था की साख प्रभावित होने लगी है। यह राजनीतिक दलों की सामूहिक चिंता का विषय होना चाहिए। व्यक्ति आते-जाते रहेंगे, लेकिन संस्थाओं की साख पर आंच नहीं आने देनी चाहिए।

मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध महाभियोग का नोटिस राजनीतिक टकराव का विस्तार है। कभी मत्रपत्रों की लूट तो अब ईवीएम पर संदेह के जरिये चुनाव प्रक्रिया की शुचिता और विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते रहे हैं, लेकिन इस तरह कठघरे में खड़ा कभी नहीं किया गया। मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्तियां हमेशा केंद्र सरकार करती है। पसंदीदा नौकरशाहों की नियुक्ति के आरोप भी लगते रहे हैं। नवीन चावला की कांग्रेस से नजदीकियों के तब तमाम उदाहरण दिए गए थे। मनोहर सिंह गिल को तो कांग्रेस ने राज्यसभा सदस्य और केंद्र में मंत्री भी बनाया। फिर अब क्यों बात मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध महाभियोग के नोटिस तक पहुंच गई?

चंडीगढ़ नगर निगम मेयर चुनाव में निर्वाचन अधिकारी की धांधली और फिर सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती का घटनाक्रम ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल से पहले का है। हां, कुछ नियम-कानूनों में संशोधन अवश्य हुए हैं, जिन्हें विपक्ष पारदर्शिता से विचलन बताता है, पर उन्हें न्यायपालिका में चुनौती दी जा सकती है। चुनाव आयोग से विपक्ष के ताजा टकराव के मूल में एसआइआर मुख्य मुद्दा है। अतीत में भी मतदाता सूचियों का शुद्धिकरण होता रहा है, लेकिन इस बार जैसी अफरातफरी कभी नहीं मची।

इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम भी कभी नहीं कटे। शायद इसलिए कि इस बार आइआर की जगह एसआइआर कराया जा रहा है। ऐसे विशेष सघन पुनरीक्षण से पहले सभी दलों और राज्य सरकारों से चर्चा न करने से उठे सवालों का जवाब तो चुनाव आयोग ने नहीं दिया है, लेकिन मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण से लेकर चुनाव प्रक्रिया को बेहतर बनाने संबंधी कदमों को सर्वोच्च न्यायालय आयोग का अधिकार बता चुका है।

बिहार से शुरू एसआइआर विवाद के बंगाल पहुंचने तक सर्वोच्च न्यायालय कई बार सुनवाई कर चुका है। कुछ मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश भी दिए। बंगाल में राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच मोर्चा खुल जाने की स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय ने एसआइआर की निगरानी के लिए न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति के निर्देश दिए। प्रक्रियागत जटिलताओं के बावजूद एसआइआर असंवैधानिक नहीं है। फिर भी टकराव का मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध देश में पहली बार महाभियोग के नोटिस तक पहुंच जाना गंभीर सवाल खड़े करता है।

महाभियोग की जटिल प्रक्रिया के चलते विपक्ष की इस मुहिम की सफलता संदिग्ध ही है। निष्पक्ष एवं स्वतंत्र चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार चुनाव आयोग के मुखिया तथा लोकसभा के अध्यक्ष पर विपक्ष का अविश्वास लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। यह चिंता प्रधानमंत्री मोदी और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के एजेंडा में भी सर्वोपरि होनी चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)