डॉ. सुरजीत सिंह। पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य संघर्ष और रूस-यूक्रेन जैसे युद्धों ने न सिर्फ वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को बाधित किया है, बल्कि भू-राजनीतिक तनावों ने विश्व के समक्ष आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है। ऊर्जा की कीमतों में तीव्र बढ़ोतरी ने न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था को अस्थिर कर दिया है, बल्कि मुद्रा विनिमय दरों पर दबाव बढ़ने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं भी प्रभावित हो रही हैं। आज हर देश, चाहे वह विकसित हो या विकासशील महंगाई, बेरोजगारी और धीमी आर्थिक वृद्धि जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है।

विश्व की बदलती भू-राजनीति केवल राजनीतिक संतुलन को ही प्रभावित नहीं कर रही, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका को भी गहराई से प्रभावित कर रही है। इन परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र से यह अपेक्षा थी कि वह विभिन्न देशों के बीच संवाद स्थापित कर, संघर्षोंन को रोककर और कूटनीतिक समाधान निकालकर वैश्विक स्थिरता बनाए रखेगा।

किंतु वास्तविकता यह है कि संयुक्त राष्ट्र इन अपेक्षाओं पर पूर्णतः खरा नहीं उतर पाया है। बड़े देशों के बीच बढ़ते अविश्वास, हितों के टकराव और शक्ति राजनीति के कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी संस्था भी निर्णायक हस्तक्षेप करने में असमर्थ रही है। परिणामस्वरूप न केवल युद्ध लंबे समय तक चल रहे हैं, बल्कि उनका प्रभाव विश्व अर्थव्यवस्था पर और अधिक गहरा होता जा रहा है।

पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के बीच बढ़ते तनाव के दौरान संयुक्त राष्ट्र की चेतावनियां केवल प्रतीक मात्र बनकर रह गई हैं। एक ओर संयुक्त राष्ट्र के मंच से शांति और संवाद की बात की जाती है, दूसरी ओर जमीनी स्तर पर मिसाइल हमले, सैन्य कार्रवाई और नागरिक हताहतों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह अंतर केवल कूटनीतिक कमजोरी का नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की वास्तविकता का भी प्रतीक है, जहां शक्तिशाली देश अपने रणनीतिक हितों के अनुसार कार्य करते हैं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की अपीलों को नजरअंदाज कर देते हैं।

स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र की कूटनीतिक प्रक्रिया वर्तमान समय की तेज और जटिल युद्ध परिस्थितियों के अनुरूप नहीं है। जहां एक ओर युद्ध तेजी से बदले हैं, वहीं दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत धीमी और औपचारिक होती है जिससे इसकी विश्वसनीयता एवं प्रासंगिकता भी लगभग खत्म हो चुकी है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक स्तर पर देशों के बीच सहयोग, संवाद, शांति और भविष्य के युद्धों को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी। प्रारंभिक दशकों में इस संस्था ने कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं, परंतु बदलती वैश्विक परिस्थितियों में इसकी संरचना और कार्यप्रणाली अब समय के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पा रही है। उस समय शक्ति संतुलन कुछ चुनिंदा देशों के हाथ में केंद्रित था, जबकि आज वैश्विक शक्ति बहुध्रुवीय हो चुकी है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों का प्रभाव बढ़ा है।

भारत, चीन, ब्राजील और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। ऐसे समय में यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि संयुक्त राष्ट्र को वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप पुनर्गठित और सशक्त बनाया जाए, ताकि पुनः अपनी प्रभावशीलता प्राप्त कर विश्व को एक अधिक सुरक्षित, संतुलित और सही दिशा प्रदान कर सके। इसमें भारत जैसे जिम्मेदार और लोकतांत्रिक राष्ट्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। भारत को न केवल इस सुधार प्रक्रिया में सक्रिय पहल करनी चाहिए, बल्कि एक संतुलित, समावेशी और न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था के निर्माण के लिए नेतृत्व भी प्रदान करना होगा।

संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी चुनौती उसकी निष्क्रियता नहीं, बल्कि संरचनात्मक बाधाएं हैं, जहां वीटो पावर की राजनीति वैश्विक शांति के प्रयासों को बार-बार अवरुद्ध कर देती है। सबसे पहले सुरक्षा परिषद का विस्तार किया जाना चाहिए, ताकि भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील जैसे देशों को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके और यह संस्था वर्तमान वैश्विक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित कर सके।

वीटो पावर की व्यवस्था में भी सुधार आवश्यक है, ताकि कोई एक देश वैश्विक शांति के प्रयासों को बाधित न कर सके। निर्णय प्रक्रिया को अधिक तेज, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाया जाना चाहिए, जिससे संकट के समय प्रभावी और समयबद्ध कार्रवाई संभव हो सके। यह संस्था मानवीय सहायता, शांति स्थापना और अंतरराष्ट्रीय कानून के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है।

विश्व खाद्य कार्यक्रम और यूनीसेफ जैसी एजेंसियां विश्व के लाखों लोगों के जीवन को सुरक्षित करने में योगदान दे रही हैं। बदलती वैश्विक परिस्थितियों की मांग है कि संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी और सक्षम बनाया जाए। विशेष रूप से निर्णय प्रक्रिया को तेज करना, भू-राजनीति के प्रभाव को संतुलित करना और वैश्विक आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए नीतिगत निर्णय लेना समय की मांग है। संयुक्त राष्ट्र केवल एक संस्था नहीं, बल्कि मानवता की उस आशा का प्रतीक है, जो युद्ध और संघर्ष से परे एक शांतिपूर्ण विश्व की कल्पना करती है। इस आशा को जीवित रखने के लिए आवश्यक है कि इसे मजबूत किया जाए, न कि समाप्त।

(लेखक अर्थशास्त्री हैं)