विचार: अराजकता का पर्याय न बने असहमति
वर्तमान में यही आशा की जा सकती है कि सभी को सद्बुद्धि मिले और वे लोकतांत्रिक सीमाओं के दायरे में रहकर ही अपना विरोध करें।
HighLights
सीजेपी ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की।
विपक्षी दलों ने सीजेपी के आंदोलन को खुलकर समर्थन दिया।
डॉ. आंबेडकर ने संवैधानिक तरीकों से विरोध का समर्थन किया।
ए. सूर्यप्रकाश। बीते दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन करने और 20 जुलाई को संसद का घेराव करने वाली काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने अपने आंदोलन पर फिलहाल भले ही विराम लगा दिया हो, लेकिन उसने ऐसी किसी मुहिम को फिर से शुरू करने की धमकी भी दी है। सीजेपी को विपक्ष के कई दल दबे या खुले रूप से समर्थन दे रहे हैं। सीजेपी का यह धरना-प्रदर्शन शिक्षा मंत्री रहे धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ शुरू हुआ था। बाद में उनकी मांगों की सूची लंबी होती गई और सरकार पर दबाव भी बढ़ा। स्वाभाविक है कि अपनी मुहिम में शुरुआती सफलता से उनके हौसले इतने बुलंद हुए कि वे इस माहौल को बनाए रखना चाहते हैं।
इस संगठन को उन राजनीतिक दलों की पूरी शह मिली, जो प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को परास्त करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। इसमें सबसे अग्रणी भूमिका उन वामपंथी दलों की रही, जो भले ही अपना अस्तित्व बचाने के संकट से जूझ रहे हैं, लेकिन धरना-प्रदर्शन को ऊर्जा देने का ईंधन अभी भी इनमें कुछ बचा हुआ है। चूंकि ये दल लोकतांत्रिक रूप से मोदी और भाजपा को हराने में नाकाम साबित हो रहे हैं, इसलिए अलोकतांत्रिक विकल्पों का सहारा लेने पर आमादा हैं। यह इनकी बेचैनी और कुंठा को ही जाहिर करता है। वामपंथी दलों को इसमें आम आदमी पार्टी यानी आप से लेकर सपा जैसे दलों का भी सहयोग मिला।
प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस भी इसमें कहां पीछे रहने वाली थी। लोकसभा में नेता-प्रतिपक्ष इसी आंदोलन के दौरान प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने पर बैठ गए। उनका यह रवैया बहुत हैरान करने वाला था। अपनी दादी और पिता के समय स्वयं प्रधानमंत्री आवास में निवास का अनुभव रखने वाले राहुल इससे जुड़ी सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को भलीभांति समझते होंगे। इसके बावजूद राहुल ने अराजकता की राह अख्तियार करने से परहेज नहीं किया। यह उनकी और कांग्रेस पार्टी की कमजोर मनोदशा को ही जाहिर करता है। यह कांग्रेसी नेताओं की मानसिकता में घर कर चुकी अराजकता ही रही, जिसने सीजेपी को संसद पर धावा बोलने के लिए उकसाने का काम किया।
पूरे विरोध-प्रदर्शन के दौरान डा. भीमराव आंबेडकर के प्रतीकों की तो खूब चर्चा हुई, लेकिन प्रतीत होता है कि आंदोलनकारी उनके आदर्शों को ही नहीं समझते। डा. आंबेडकर की दृष्टि में लोकतांत्रिक समाज में अराजक तौर-तरीकों की कोई जगह नहीं थी और इस संदर्भ में कम्युनिस्टों की मानसिकता को उन्होंने बहुत पहले ही भांप लिया था। करीब 77 साल पहले ही उन्होंने कहा था, 'कम्युनिस्ट पार्टी और सोशलिस्ट पार्टी जैसे धड़ों की ओर से ही संविधान की आलोचना और विरोध हुआ है। वे संविधान की निंदा क्यों कर रहे हैं? क्या इसलिए कि यह वाकई एक बुरा संविधान है? मेरा स्पष्ट मानना है-'नहीं'।
असल में, कम्युनिस्टों को ऐसा संविधान चाहिए जो सर्वहारा की तानाशाही के सिद्धांत पर चले और चूंकि यह संविधान संसदीय लोकतंत्र पर टिका है, इसलिए वे इसकी आलोचना कर रहे हैं। दूसरी ओर, सोशलिस्टों की दो मांगें है। पहली, सत्ता में आने पर उन्हें सभी निजी संपत्तियों के राष्ट्रीयकरण का अधिकार मिले और इसके एवज में कोई क्षतिपूर्ति या मुआवजा भी उन्हें न देना पड़े। दूसरा, संविधान में दर्ज मौलिक अधिकार पूरी तरह निरपेक्ष हों, ताकि सत्ता से बाहर रहने पर उन्हें केवल सरकार की आलोचना का ही नहीं, बल्कि राज्य को उखाड़ फेंकने का भी अनियंत्रित अधिकार प्राप्त हो।' आंबेडकर का यही आकलन था कि इन दोनों दलों से जुड़े लोग संसदीय लोकतंत्र के विरोधी थे और राज्य-व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए हर वक्त तत्पर रहते थे।
संविधान सभा के अपने समापन भाषण में डा. आंबेडकर ने कहा, 'यदि हम लोकतंत्र को न केवल औपचारिक रूप में, बल्कि वास्तविक स्वरूप में बनाए रखना चाहते हैं तो हमें क्या करना चाहिए? मेरी समझ से सबसे पहली बात जो हमें करनी चाहिए वह यह है कि अपने सामाजिक एवं आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक प्रक्रियाओं से ही जुड़े रहें। इसका अर्थ है कि हमें क्रांति के हिंसक रास्तों का त्याग करना होगा। इसका अर्थ है कि हमें सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह को छोड़ना होगा। जब सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक विकल्प उपलब्ध नहीं थे, तब असंवैधानिक तरीकों का औचित्य काफी हद तक उचित था, लेकिन जहां संवैधानिक विकल्प उपलब्ध हों, वहां इन असंवैधानिक तौर-तरीकों का कोई औचित्य नहीं हो सकता। ये तरीके कुछ और नहीं बल्कि अराजकता का ही तानाबाना हैं और हम जितनी जल्दी इन्हें छोड़ दें, तो हमारे लिए उतना ही बेहतर होगा।'
संसद का घेराव करने के प्रयास में सीजेपी की शारीरिक एवं भाषाई अराजकता को देखते हुए डा. आंबेडकर का यह संबोधन बहुत सटीक, दूरदर्शी एवं भविष्यसूचक साबित हुआ। इस धरना-प्रदर्शन में तमाम युवतियों ने भी हिस्सा लिया, जिनमें से कुछ ने प्रधानमंत्री मोदी के प्रति इतने भद्दे एवं अशिष्ट शब्दों का प्रयोग किया, जिनका सार्वजनिक रूप से उल्लेख भी नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने न केवल उन सभी को क्षमा कर दिया, बल्कि पुलिस को भी कहा कि उनके खिलाफ कोई मामला दर्ज न करें। सीजेपी के कई सदस्यों और समर्थकों ने नेपाल और बांग्लादेश की तर्ज पर हिंसक और अराजक तरीके से तख्तापलट करने की अपनी मंशा खुलकर जताई।
यदि वे इस राह पर बढ़ते हैं और लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को बेदखल करने की कोशिश करते हैं तो देश में लोकतंत्र के पटरी से उतरने का जोखिम बढ़ता जाएगा। वे जिस संविधान की दुहाई देते रहते हैं, इससे उसी पर आघात होगा। उसके बाद अनिश्चितता का ऐसा दौर शुरू होगा, जिसकी कल्पना न तो खुद सीजेपी ने की होगी और न ही मोदी के अन्य विरोधियों ने। वर्तमान में यही आशा की जा सकती है कि सभी को सद्बुद्धि मिले और वे लोकतांत्रिक सीमाओं के दायरे में रहकर ही अपना विरोध करें। अन्यथा इसके परिणाम बहुत भयानक होंगे।
(लेखक लोकतांत्रिक मामलों के विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)


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