जागरण संपादकीय: बहस के बजाय हंगामा
विपक्षी दल इतने नादान नहीं हो सकते कि यह न जानते हों कि धार्मिक स्थलों में दान की चोरी होती रहती है और इस समस्या का समाधान किसी मंत्री के इस्तीफे की मांग करने से नहीं होने वाला।
HighLights
संसद में बहस के बजाय हंगामा बढ़ रहा है।
विधेयक बिना चर्चा के आसानी से पारित हो रहे हैं।
विपक्ष सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने में विफल।
लोकसभा और राज्यसभा में शोर-शराबे के बीच जिस तरह विधेयक प्रस्तुत एवं पारित हो रहे हैं, उससे संसदीय चर्चा के गिरते स्तर का ही पता चलता है। संसद में हंगामा करके विपक्ष अपना ही नहीं, देश का भी नुकसान कर रहा है, क्योंकि जनता को पता ही नहीं चल पा रहा है कि जो विधेयक बिना किसी बहस के पारित हो रहे हैं, उनके गुण-दोष क्या हैं और उनसे उसे क्या हासिल होने वाला है?
यह सामान्य बात नहीं कि पेपर लीक विरोधी कानून में संशोधन वाले विधेयक पर तो संसद में चर्चा हुई, लेकिन अन्य अनेक विधेयकों के मामले में विपक्ष ने इसकी नौबत ही नहीं आने दी। विपक्ष हंगामा करने में व्यस्त है और सरकार लोकसभा और राज्यसभा से विधेयक पारित कराने में। संसद में विचार-विमर्श के स्थान पर हंगामा करके विपक्ष एक तरह से सत्तापक्ष का काम ही आसान कर रहा है।
वह सरकार को जवाबदेह बनाने के अवसर अपने हाथों गंवा रहा है। आखिर किसी भी सरकार के लिए इससे सुविधाजनक और क्या होगा कि उससे जनहित के मुद्दों और महत्वपूर्ण विधेयकों के प्रविधानों पर कुछ पूछा ही न जाए? जब विपक्ष के लिए यह चिंता का विषय बनना चाहिए कि सरकार अपना विधायी काम आसानी से पूरा कर ले रही है, तब वह हंगामा करके खुश है।
यह नकारात्मक राजनीति की पराकाष्ठा ही नहीं, अपने संसदीय दायित्वों से मुंह मोड़ने वाला आचरण है। ऐसा लगता है कि विपक्षी दल इस नतीजे पर पहुंच गए हैं कि अब किसी मुद्दे पर कोई सार्थक बहस करने से बेहतर है हंगामा करना। यह एक तरह से संसद का निरादर है।
विपक्ष इस निष्कर्ष पर भी पहुंच गया लगता है कि बात-बात पर मंत्री के इस्तीफे की मांग करके वह अपनी गंभीरता प्रदर्शित करने में सफल हो जा रहा है। सच यह है कि यह गैर-जिम्मेदाराना रवैया है, क्योंकि संसद का दायित्व राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर चर्चा करना और देश को दिशा देना है।
संसद है ही इसीलिए कि वह जनहित के विषयों पर चर्चा करे और यदि सरकार किसी मुद्दे पर बहस से बचती दिखे, तो उसे इसके लिए विवश करे। बीते कुछ दिनों से विपक्ष राम मंदिर में चढ़ावा चोरी को लेकर गृह मंत्री के त्यागपत्र की मांग यह जानते हुए भी करने में लगा हुआ है कि इस मामले से उनका कोई लेना-देना नहीं।
विपक्षी दल इतने नादान नहीं हो सकते कि यह न जानते हों कि धार्मिक स्थलों में दान की चोरी होती रहती है और इस समस्या का समाधान किसी मंत्री के इस्तीफे की मांग करने से नहीं होने वाला। इसके बाद भी वे राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले में गृह मंत्री का त्यागपत्र चाह रहे हैं। कल को यदि किसी मठ, मंदिर, चर्च, मस्जिद आदि में दान की चोरी का मामला सामने आता है तो क्या वे फिर से गृह मंत्री का त्यागपत्र मांगेंगे?


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