विचार: मंदिर प्रबंधक तैयार करने का समय
राम मंदिर में दान की चोरी धर्म की विफलता नहीं, बल्कि व्यवस्थापन की असफलता है। इसलिए समाधान मंदिर को कारपोरेट तरीके से चलाना नहीं है
HighLights
रामजन्मभूमि में चढ़ावा चोरी ने मंदिरों के प्रबंधन पर गंभीर सवाल उठाए।
मंदिरों को कॉर्पोरेट नहीं, बल्कि पेशेवर और पारदर्शी प्रबंधन की आवश्यकता है।
आगम शास्त्र और आधुनिक प्रबंधन के समन्वय से मंदिर प्रशासन सुधरेगा।
विकास सारस्वत। रामजन्मभूमि मंदिर अपनी प्राण-प्रतिष्ठा के मात्र दो वर्षों के भीतर ही संस्थागत विफलता के एक अप्रत्याशित उदाहरण के रूप में सामने आया है। यहां चढ़ावा चोरी के मामले से करोड़ों लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। इसमें यह बात विशेष रूप से चिंताजनक है कि यह घटना एक ऐसे मंदिर में घटी, जो सैकड़ों वर्षों के कड़े संघर्ष, अनेक लोगों के बलिदान और करोड़ों व्यक्तियों के दान के फलस्वरूप बना है।
अयोध्या के अलावा बदरीनाथ धाम-उत्तराखंड और अंबाजी मंदिर-गुजरात के दान-पात्र से भी चोरी की घटनाएं सामने आई हैं। इतने प्रसिद्ध और संसाधन-संपन्न मंदिरों में गहन निगरानी के बावजूद प्रबंधन की विफलता अन्य मंदिरों में भी चढ़ावा चोरी और वित्तीय अनियमितताओं की आशंकाओं को जन्म देती है।
अयोध्या में हुए दुखद घटनाक्रम के बाद एक मुखर प्रतिक्रिया यह आई है कि मंदिरों को कारपोरेट सरीखे पेशेवर तरीके से चलाया जाए। राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष और सेवानिवृत्त आइएएस नृपेंद्र मिश्रा ने सीईओ नियुक्ति का सुझाव दिया। उन्होंने इस पदाधिकारी के सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त रहने की भी अपेक्षा की।
हालांकि दोनों ही मत इसकी अनदेखी करते हैं कि मंदिर न तो विशुद्ध रूप से व्यवसाय है और न ही सरकारी उपक्रम। यह अवश्य है कि जवाबदेही में सुधार के लिए दान की गणना में पारदर्शिता, नियमित कार्य आडिट, विस्तृत नियमावली और खातों की संपूर्ण जांच जैसी कार्यप्रणाली बने।
गणना कक्षों में छेड़छाड़-रोधी प्रणाली, सीसीटीवी, आरएफआइडी टैग युक्त दान-पेटियां और बड़े चढ़ावों के लिए ब्लाकचेन जैसी अपरिवर्तनीय लेखा-प्रणाली ऐसा अंकेक्षण मार्ग बना सकती है, जिसे कोई दुर्जन आसानी से धोखा नहीं दे सकता। एक अलग संग्रहालय में ऐसे बहुमूल्य चढ़ावे को सीमित अथवा दीर्घकाल के लिए प्रदर्शित भी किया जा सकता है।
तृतीय पक्ष लेखा परीक्षण और सरल भाषा में सारांश सहित विस्तृत लेखा रिपोर्टों को हर तिमाही वेबसाइट पर डालने जैसे बहुत से कदम उठाए जा सकते हैं, जो दानदाताओं एवं श्रद्धालुओं में विश्वास का भाव बनाएं। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम और गुरुवायुर जैसे कई मंदिरों में ऐसी व्यवस्था बनी भी हुई है। यह भी स्मरण रहे कि मंदिर न तो कोई ऐसी कंपनी है जो शेयरधारकों के लाभ को अधिकतम करने का प्रयास करे और न ही वह शासकीय दायित्व का भाग है, जो सरकार के जनकल्याण उद्देश्यों की पूर्ति करे।
मंदिर एक जीवंत धार्मिक संस्था है, जिसकी वैधता उतनी ही मात्रा में अनुष्ठानिक शुद्धता, परंपरा और पवित्रता पर टिकी है, जितनी आर्थिक शुचिता पर। अतः कारपोरेट प्रबंधन को ज्यों का त्यों मंदिरों पर थोपने के बजाय एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जो आडिट, प्रौद्योगिकी, आंतरिक नियंत्रण, पेशेवर वित्त प्रबंधन जैसे आधुनिक प्रशासकीय उपकरणों को आगम शास्त्र और धार्मिक व्यवस्था के अधीन रखे। मंदिर के अपने अनुष्ठानों पर अधिकार का स्रोत आगम शास्त्र यानी परंपराएं हैं।
वे ऐसे संहिताबद्ध शास्त्रीय ग्रंथ हैं, जो विभिन्न संप्रदायों के मंदिरों के लिए भिन्न प्रकार के प्रविधान निश्चित करते हैं। जैसे वैष्णव मंदिरों के लिए पाञ्चरात्र और वैखानस आगम, शैव मंदिरों के लिए कामिक, करण और भैरव आगम और शाक्त संप्रदायों के लिए शक्ति आगम। ये कोई आंतरिक 'मानक प्रचालन प्रक्रियाएं' यानी एसओपी नहीं हैं, जो प्रबंधन की दक्षता को निरूपित करें, बल्कि ये मंदिर का अपना संवैधानिक कानून हैं।
यदि किसी सीईओ को धर्मशास्त्रीय प्रशिक्षण के बिना मंदिर संचालन का अधिकार दिया जाए, तो वह भली मंशा के बावजूद प्रतिष्ठित इष्ट के साथ न्याय नहीं कर पाएगा। वह ऐसे परिवर्तन कर सकता है, जो स्वयं देवता की प्राण-प्रतिष्ठा की पवित्रता को निरस्त कर दे। कुछ इसी प्रकार का दोष सरकारी बोर्डों के मत्थे लगता है, जो परंपराओं की विशिष्टताओं के विपरीत विभिन्न मंदिरों पर एक समान मंदिर-प्रबंधन नियम थोप इस विविधता को रौंद देते हैं।
आगमिक मंदिरों में ऐतिहासिक रूप से सत्ता का एक अंतर्निहित पृथक्करण रहा है। केवल अर्चक या पुजारी ही पूजा-अनुष्ठान कर सकता है। मंदिर वास्तु-संरक्षक, मंदिर की संरचना एवं उसकी शिल्प शास्त्रीय अनुरूपता सुनिश्चित करता है। इसी प्रकार लौकिक ट्रस्टी जो कभी राजा होते थे, मंदिर के भौतिक रखरखाव, भूमि, कोष, सुरक्षा एवं विवाद निस्तारण के लिए उत्तरदायी होते हैं।
यह विखंडन आध्यात्मिक और भौतिक सत्ताओं को एक ही शक्ति में केंद्रित होने से रोकता था, पर एक सर्वशक्तिमान सीईओ पुनः ऐसे त्रुटिपूर्ण केंद्रीकरण को जन्म दे सकता है। अल्पकालिक अवधि में ऐसे ट्रस्टियों का चयन जो आधुनिक प्रबंधन के साथ आगम शास्त्रों के भी ज्ञाता हों, थोड़ा चुनौतीपूर्ण होगा।
वर्तमान परिस्थितियों का उपयोग एक ऐसे अवसर के रूप में किया जा सकता है, जो बिजनेस मैनेजमेंट या होटल मैनेजमेंट की शैली पर टैंपल मैनेजमेंट यानी मंदिर-प्रबंधन के लिए कार्यकारी तैयार करे। तिरुपति या अयोध्या जैसे बड़े मंदिर ऐसे संस्थान खड़े करने का बीड़ा उठा सकते हैं। इन संस्थाओं का उद्देश्य ऐसे मंदिर प्रबंधकों का विकास होना चाहिए, जिनमें आध्यात्मिक संवेदनशीलता के साथ आधुनिक प्रबंधन की कुशलताएं हों।
अर्चकों के लिए चर्या पाद, परिचारकों और स्थानिकों के क्रिया पाद, अध्येताओं एवं कलाकारों के लिए ज्ञान पाद व सभी के लिए योग पाद की अनिवार्यता वैसी आचरण संहिता हैं, जो प्रबंधन और मानव संसाधन को व्यावहारिक, नैतिक और आध्यात्मिक रूप से विकसित कर सकती हैं।
अयोध्या में हुई चोरी धर्म की विफलता नहीं, बल्कि व्यवस्थापन की विफलता है। इसलिए समाधान यह नहीं होना चाहिए कि मंदिर का कारपोरेट अधिग्रहण हो। न ही यह कि परंपरा के नाम पर मंदिरों की विशाल भौतिक संपत्ति को अनियंत्रित छोड़ दिया जाए।
समाधान वह है, जिसका आदर्श स्वयं आगमों ने सदियों पहले प्रस्तुत किया है। आध्यात्मिक सत्ता को भौतिक प्रशासन से पृथक रखा जाए और प्रशासन को इस प्रकार उत्तरदायी बनाया जाए, ताकि मंदिर की गरिमा पर आंच न आए।
(लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)
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