विचार: जजों की संख्या बढ़ाना कितना कारगर
न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि सुप्रीम कोर्ट तक ही सीमित न रहे। उच्च न्यायालयों में भी जजों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए
HighLights
संसद ने सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की संख्या विधेयक पारित किया।
लंबित 92,000 मामलों के शीघ्र निपटारे में मिलेगी मदद।
न्याय प्रक्रिया तेज होगी, नागरिकों को त्वरित न्याय मिलेगा।
जगदीप सिंह। बीते दिनों संसद ने सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों की संख्या (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित कर दिया। इसके तहत मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव है। इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की कुल संख्या 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी।
यह बदलाव केवल पदों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को अधिक तेज, सुलभ और प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस वृद्धि का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव लंबित मामलों के निस्तारण पर पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट में आज लगभग 92,000 मामले लंबित हैं।
वर्तमान में सीमित संख्या में जज होने के कारण प्रतिदिन सीमित मामलों की ही सुनवाई हो पाती है। अनेक महत्वपूर्ण अपीलें और याचिकाएं महीनों तक सूचीबद्ध होने की प्रतीक्षा करती रहती हैं। अतिरिक्त चार न्यायाधीशों की नियुक्ति से एक साथ अधिक खंडपीठों का गठन संभव होगा। संविधान पीठों पर भी न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने का गहरा प्रभाव पड़ेगा। अनेक संवैधानिक और सार्वजनिक महत्व के मामले पांच, सात या नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के गठन की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
न्यायाधीशों की सीमित संख्या के कारण ऐसी पीठें अपेक्षाकृत कम ही गठित हो पाती हैं। अतिरिक्त जज उपलब्ध होने से मुख्य न्यायाधीश नियमित रूप से संविधान पीठों का गठन कर सकेंगे। इससे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर शीघ्र निर्णय आएंगे। परिणामस्वरूप कानूनी स्पष्टता बढ़ेगी और अन्य अदालतों को स्पष्ट दिशा-निर्देश प्राप्त होंगे। उनसे आने वाले मामलों पर भी इसका प्रभाव होगा।
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल, राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा अन्य राज्यों के उच्च न्यायालयों में लाखों मामले लंबित हैं। इन न्यायालयों से बड़ी संख्या में अपीलें और विशेष अनुमति याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचती हैं। जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई में देरी होती है तो राज्य स्तर पर भी अनिश्चितता बनी रहती है।
अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति से इन अपीलों का निस्तारण अधिक तेजी से हो सकेगा। उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध दायर मामलों में शीघ्र अंतिम फैसला आने से राज्यों में न्यायिक प्रक्रिया भी गति पकड़ेगी। इससे नागरिकों को राज्य स्तर से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक न्याय प्राप्त करने में लगने वाला कुल समय कम होगा।
आम नागरिकों के जीवन पर इसका प्रभाव सबसे अधिक सार्थक होगा। संपत्ति विवाद, पारिवारिक मामले, सेवा संबंधी अपीलें, आपराधिक अपीलें तथा मौलिक अधिकारों से जुड़े मुकदमे अब लंबे इंतजार के बजाय अधिक समयबद्ध तरीके से निपट सकेंगे। गरीब और मध्यम वर्ग के लिए यह बदलाव उनका जीवन बदलने वाला साबित हो सकता है।
जो लोग वर्षों से मुकदमेबाजी का खर्च उठाते-उठाते थक चुके हैं, उन्हें राहत मिलेगी। बार-बार अदालत में तारीख पर उपस्थित होने की मजबूरी कम होगी। न्याय अधिक सुलभ, त्वरित और व्यावहारिक प्रतीत होगा। आर्थिक क्षेत्र पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
व्यापारिक विवाद, अनुबंध संबंधी मामले और निवेश से जुड़े मुकदमे लंबे समय तक लंबित रहने से अनिश्चितता बनी रहती है। इसके कारण कंपनियां और उद्यमी महत्वपूर्ण निर्णय लेने में हिचकिचाते हैं। सुप्रीम कोर्ट में मामलों का शीघ्र निस्तारण होने से व्यापारिक वातावरण में सुधार होगा और निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।
जब लोग देखेंगे कि सुप्रीम कोर्ट अधिक गति और दक्षता के साथ कार्य कर रहा है तो न्यायिक व्यवस्था पर उनका विश्वास और मजबूत होगा। साथ ही न्यायाधीशों पर अत्यधिक कार्यभार कम होने से निर्णयों की गुणवत्ता में भी सुधार आएगा। हालांकि न्यायाधीशों की संख्या में यह वृद्धि केवल सुप्रीम कोर्ट तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
उच्च न्यायालयों और जिला स्तर की अदालतों में भी जजों की संख्या बढ़ाने तथा रिक्त पदों को शीघ्र भरने की आवश्यकता है। यदि उच्च न्यायालय मजबूत होंगे तो सुप्रीम कोर्ट तक अनावश्यक अपीलें कम पहुंचेंगी। इससे सुप्रीम कोर्ट अपना अधिक समय संवैधानिक और सार्वजनिक महत्व के मामलों पर केंद्रित कर सकेगा। दोनों स्तरों पर एक साथ सुधार होने से ही न्याय व्यवस्था समग्र रूप से अधिक प्रभावी बन सकेगी।
यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति के साथ डिजिटल सुविधाओं का बेहतर उपयोग भी संभव होगा। ई-फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई और केस मैनेजमेंट सिस्टम अधिक प्रभावी ढंग से कार्य करेंगे। इससे दूरदराज के राज्यों से आने वाले पक्षकारों और अधिवक्ताओं को भी सुविधा मिलेगी। वैसे केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ा देने से ही उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
योग्य, अनुभवी और समर्पित न्यायाधीशों की समय पर नियुक्ति भी उतनी ही आवश्यक है। इसके साथ ही न्यायालयों के बुनियादी ढांचे और सहायक कर्मचारियों की व्यवस्था को भी सुदृढ़ करना होगा तभी इस वृद्धि का पूरा लाभ प्राप्त हो सकेगा।
इसके अतिरिक्त तारीख पर तारीख के सिलसिले को भी रोकना होगा। यह समझा जाए कि जितना आवश्यक सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिलना है, उतना ही अन्य न्यायलयों से भी, क्योंकि न तो हर मामला सर्वोच्च अदालत पहुंचता है और न ही हर कोई वहां तक जा सकता है।
(लेखक राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर हैं)
-1786040204043_v.webp)

-1786040396168_v.webp)








