मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश की परीक्षा नीट के पेपर लीक होने के बाद इसे आयोजित कराने वाली संस्था नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के कामकाज में सुधार किया जाना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य हो गया है।

यह ठीक है कि बीते दिनों एनटीए के लिए अस्थायी रूप से काम करने वाले कई अधिकारियों एवं कर्मचारियों को हटाया गया और उसके प्रशासनिक ढांचे को मजूबत बनाने के लिए महाप्रबंधक तथा उसके समकक्ष स्तर के पदों की भर्ती के कदम उठाए जा रहे हैं, लेकिन उचित यह होगा कि इन कदमों के संदर्भ में नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता में परीक्षा सुधार के लिए गठित टास्क फोर्स से भी विचार-विमर्श किया जाए। और भी उचित यह होगा कि इस टास्क फोर्स को अपना काम शीघ्र शुरू करने को कहा जाए। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं कि यह टास्क फोर्स अपनी सिफारिशें कब तक देगा।

इसके लिए कोई समयसीमा तय की जानी चाहिए। आवश्यक यह भी है कि उसकी ओर से जो सुझाव दिए जाएं, उन पर यथाशीघ्र अमल सुनिश्चित किया जाए। यह एक तथ्य है कि एनटीए के कामकाज में सुधार के लिए राधाकृष्णन समिति ने जो सुझाव दिए थे, उन सभी पर अमल नहीं किया गया।

इसी तरह शिक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति की सिफारिशों पर भी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। शायद इस सबका ही परिणाम यह रहा कि एनटीए नीट के साथ अन्य केंद्रीय परीक्षाओं में गड़बड़ी को रोकने में नाकाम रही। इसी नाकामी का नतीजा छात्रों के उस आंदोलन के रूप में सामने आया, जिसके चलते शिक्षा मंत्री को त्यागपत्र देना पड़ा। इस त्यागपत्र के बाद पेपर लीक रोधी कानून में संशोधन कर उसे और कठोर भी बनाया गया।

निःसंदेह परीक्षाओं में सेंध लगाने वाले तत्वों को हतोत्साहित करने के लिए संबंधित कानून को कठोर करना ही चाहिए, क्योंकि देश में एक पेपर लीक माफिया पैदा हो गया है, लेकिन इसी के साथ इसके उपाय भी करने चाहिए, जिससे पेपर लीक ही न हो सके। ऐसा तब होगा, जब एनटीए और इस जैसी अन्य संस्थाओं की कार्यप्रणाली में अपेक्षित बदलाव होंगे।

यह साधारण बात नहीं कि पिछले कुछ समय से प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ स्कूली परीक्षाओं में भी सेंध लग रही है। इसे देखते हुए परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं को न केवल उन्नत तकनीक को अपनाना चाहिए, बल्कि प्रश्नपत्रों के कई सेट तैयार करने जैसे कदम भी उठाने चाहिए।

नीट जैसी जिन प्रतियोगी परीक्षाओं में लाखों छात्र बैठते हैं, उन्हें वर्ष में कम से कम दो बार आयोजित करने पर विचार किया जाना चाहिए। आवश्यक केवल यह नहीं है कि एनटीए की कार्यप्रणाली सुधरे, बल्कि यह भी है कि किसी भी स्तर की परीक्षाएं आयोजित कराने वाली संस्थाओं का कामकाज ऐसा हो कि परीक्षार्थियों के मन में परीक्षाओं की शुचिता को लेकर कोई संदेह न रहे।