जागरण संपादकीय: गतिरोध से त्रस्त संसद
संसद में जारी गतिरोध को तोड़ने के लिए संसदीय कार्यमंत्री किरेण रिजीजू और राहुल गांधी के बीच बातचीत विफल रही, जिससे मानसून सत्र के हंगामे के बीच समाप्त होने की आशंका बढ़ गई है।
HighLights
किरेण रिजीजू और राहुल गांधी की बातचीत विफल रही।
विपक्ष की शर्तों से संसद में गतिरोध बरकरार है।
बिना चर्चा के विधेयक पारित होने से गरिमा कम हुई।
संसद में जारी गतिरोध को तोड़ने और विदेशी चंदे एवं परिसीमन से जुड़े विधेयकों पर सहमति कायम करने के लिए संसदीय कार्यमंत्री किरेण रिजीजू और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बीच हुई बातचीत जिस तरह किसी ठोस नतीजे पर पहुंचती नहीं दिखी, उससे मानसून सत्र के हंगामे के बीच ही खत्म होने के आसार बढ़ गए हैं। राहुल गांधी की शर्त है कि जब तक काकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च में हिंसा पर गृह मंत्री अमित शाह बयान नहीं देते और राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले में सदन में चर्चा नहीं होती, तब तक संसद की कार्यवाही नहीं चल सकती।
पता नहीं इन दोनों विषयों पर ऐसा हो पाता है या नहीं, लेकिन हैरानी नहीं कि इसकी नौबत आने पर विपक्ष सरकार को कठघरे में खड़ा कर सदन से चलता बने और सरकार का पक्ष भी न सुने। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पेपर लीक विरोधी कानून में संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष और विशेष रूप से राहुल गांधी ने बहुत कुछ कहा था, लेकिन इस बिल पर एक शब्द भी नहीं कहा था।
कुछ ऐसा ही रवैया अन्य विपक्षी नेताओं का रहा था। यह पहली बार नहीं, जब विपक्ष उन मुद्दों को तूल देने पर अड़ गया हो, जो संसद सत्र के पहले किसी न किसी कारण सतह पर आए। एक लंबे अर्से से यह देखने को मिल रहा है कि संसद सत्र शुरू होने के पहले कुछ ऐसे मुद्दे सामने आ जाते हैं या फिर सुनियोजित रूप से लाए जाते हैं कि विपक्ष को संसद में हंगामा करने का अवसर मिल सके।
यह स्थिति यही बताती है कि विपक्ष अपनी ओर से न तो कोई तैयारी करता है और न ही उसके पास प्रस्तावित विधेयकों अथवा राष्ट्रीय महत्व के अन्य मुद्दों पर कोई ठोस सुझाव होते हैं। यह एक तथ्य है संसद के इस सत्र में पेपर लीक विरोधी कानून में संशोधन वाले विधेयक को छोड़कर किसी अन्य विधेयक पर कोई चर्चा नहीं हुई। कई विधेयक विपक्ष की नारेबाजी के बीच बिना किसी विचार-विमर्श के पारित हो गए। समस्या यह है कि जिन विधेयकों पर कभी कोई चर्चा होती भी है, तो वह अत्यंत सतही और निरर्थक होती है।
यह किसी से छिपा नहीं कि विपक्ष की ओर से सरकार के हर विधेयक और हर फैसले का आंख मूदकर विरोध ही किया जाता है। वास्तव में अब विरोध और अंधविरोध का अंतर मिटता जा रहा है। विपक्ष की ओर से रचनात्मक अथवा सकारात्मक सहयोग अब बीते जमाने की बात बन गया है। इसकी जगह नकारात्मकता और विरोध के नाम पर विरोध की राजनीति ने ले लिया है।
इससे संसद की महत्ता और गरिमा ही कम हो रही है। यदि संसदीय कामकाज की यही दशा रही तो वह दिन दूर नहीं, जब आम जनता में संसद के प्रति आस्था डिगती दिखे। अच्छा हो कि पक्ष और विपक्ष, दोनों यह देखें कि संसद की महत्ता फिर से कैसे स्थापित हो।


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