राजीव सचान। इसी 13 जुलाई को लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का उद्घाटन हुआ था। यह एक नया छह लेन का एलिवेटेड मार्ग है। इसकी लागत 4,200 करोड़ रुपये थी। उद्घाटन के बाद से यह मार्ग अलग-अलग जगहों पर कम से कम पांच बार धंस चुका है। स्थिति यह है कि निर्माण एजेंसी एक जगह सड़क सही करती है तो दूसरी जगह कोई खामी आ जाती है। कहना कठिन है कि यह सिलसिला कब तक कायम रहेगा, लेकिन जिस तरह यह सड़क बार-बार धंस रही है, उससे बिना किसी किंतु-परंतु यह कहा जा सकता है कि इसका निर्माण दोयम दर्जे का है।

यदि कोई नई बनी सड़क लोकार्पण के 20 दिन के भीतर पांच बार जगह-जगह धंस जाए तो ऐसे किसी नतीजे पर पहुंचने के अलावा भला और क्या उपाय रह जाता है कि उसके निर्माण में जमकर लूट-खसोट की गई है? यह कोई आम सड़क नहीं है। यह एक्सप्रेसवे है। 63 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे पर कारों के लिए एक तरफ का टोल 275 रुपये तय किया गया है। इस तरह प्रति किमी टोल करीब 4.37 रुपये है। इसके चलते इसे देश के सबसे महंगे टोल वाला एक्सप्रेसवे कहा जा रहा है। चूंकि इस एक्सप्रेसवे के बार-बार धंसने से भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की फजीहत हो रही थी, इसलिए जांच के आदेश दिए गए और जांच पूरी होने तक तीन अभियंताओं को कार्य से हटा दिया गया।

निलंबन की कार्रवाई से कुछ नहीं होता। होता इससे भी कुछ नहीं है कि दोयम दर्जे के निर्माण की दोषी कंपनियों को कई बार काली सूची में डाल दिया जाता है, क्योंकि वे कई बार नाम बदलकर नए सिरे से काम करने लगती हैं। यह पहला ऐसा मामला नहीं, जो घटिया निर्माण की कहानी चीख-चीख कर कह रहा हो। इस तरह के मामले सामने आते ही रहते हैं। बारिश में कुछ ज्यादा ही आते हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि इन दिनों देश भर से सड़कों के धंसने-टूटने की खबरें आ रही हैं।

इनमें से कुछ सड़कों के क्षतिग्रस्त होने का कारण अत्यधिक बरसात है, लेकिन ज्यादातर सड़कें तो मामूली वर्षा के कारण ही धंस जा रही हैं। ऐसा इसलिए है, जहां निर्माण, वहां भ्रष्टाचार एक अलिखित नियम बन गया है। इस भ्रष्टाचार के चलते सड़कों, पुलों, सरकारी भवनों आदि का निर्माण दोयम दर्जे का हो रहा है। ऐसे ही निर्माण के कारण ऐसी खबरें आती हैं कि पहली बरसात में ही सड़क धंस गई, पुल क्षतिग्रस्त हो गया या फिर किसी सरकारी भवन की छत से पानी टपकने लगा अथवा वह जलमग्न हो गया।

देश को विकसित बनाने का लक्ष्य अब 21 वर्ष दूर है। यह समय बताएगा कि 2047 तक भारत विकसित देशों जैसा बन पाएगा या नहीं, लेकिन फिलहाल यह देखा जा सकता है कि किसी देश को विकसित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बुनियादी ढांचे का निर्माण किस तरह हो रहा है? निःसंदेह देश में बहुत कुछ बन रहा है, जैसे सड़कें, पुल, हवाई अड्डे, बस स्टेशन, मेट्रो नेटवर्क, रेलवे स्टेशन आदि, लेकिन क्या इन सबका निर्माण द्रुत गति से हो रहा है?

यह तो कहा जा सकता है कि पहले की तुलना में निर्माण कार्यों की गति अपेक्षाकृत अधिक है, लेकिन यह कहना बहुत कठिन है कि वह वास्तव में तेज गति से हो रहा है। इससे अधिक कठिन यह कहना है कि क्या निर्माण कार्यों की गुणवत्ता विश्वस्तरीय और भरोसेमंद है? यदि इस प्रश्न का उत्तर हां में होता तो नई बनी सड़कों के धंसने, पुलों के क्षतिग्रस्त होने और यहां तक कि गिरने का सिलसिला नजर नहीं आता। इस सिलसिले से यही लगता है कि हर तरफ दोयम दर्जे का निर्माण हो रहा है। हमारे देश मे अंग्रेजों के समय में बना बुनियादी ढांचा तो आज भी अक्षुण्ण है, लेकिन हमारे अपने लोगों द्वारा बनाया गया ढांचा गया-बीता सिद्ध हो रहा है।

स्थिति यह है कि पुल उद्घाटन के पहले ही गिर जा रहे हैं। दोयम दर्जे के निर्माण के मूल में कमीशनबाजी यानी भ्रष्टाचार है। चूंकि कमीशनखोरी की दरें बढ़ती जा रही हैं, इसलिए निर्माण कार्यों के दोयम दर्जे के होने के मामले भी बढ़ रहे हैं। जहां कहीं भी निर्माण हो रहा है, वह बिना किसी भ्रष्टाचार के पूरा नहीं हो पा रहा है। जहां कहीं निर्माण होता है, वहां भ्रष्टाचार अपना ठिकाना बना ही लेता है। वास्तव में यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि हर सरकारी निर्माण की नींव भ्रष्टाचार के ईंट-गारे से रखी जा रही है।

भ्रष्टाचार एक ऐसा रोग है, जो समय के साथ बढ़ता ही जा रहा है। भ्रष्टाचार केवल निर्माण कार्यों तक ही सीमित नहीं है। यह सरकारी खरीद में भी व्याप्त हो गया है। सरकारी तंत्र में फलते-फूलते भ्रष्टाचार की गवाही वे अधिकारी देते हैं, जिनके यहां सीबीआइ, ईडी आदि के छापों में करोड़ों की नकदी मिलती रहती है। ऐसे अधिकारियों की गिनती करना कठिन है, जिनके पास ज्ञात स्रोतों से अधिक संपदा मिलती रही है। इनमें से कोई भी मुश्किल से ही कठोर दंड का भागीदार बनता है।

ऐसे उदाहरण अवश्य हैं, जो यह बताते हैं कि भ्रष्ट तौर-तरीकों में लिप्त अधिकारी निलंबित हुए और फिर कुछ समय बाद बहाल कर दिए गए। इसका कारण यह है कि सरकारें भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के प्रति ईमानदार नहीं। इस मामले में केंद्र सरकार भी नाकाम है और राज्य सरकारें भी। तथ्य यह भी है कि आज केवल सरकारी तंत्र में ही भ्रष्टाचार व्याप्त नहीं है। समय के साथ यह निजी क्षेत्र में भी घुस गया है।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)