रामिश सिद्दीकी। हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि ईरान पर हमले की पूरी तैयारी है। उसी संदेश में उन्होंने हमला टालने की भी बात कही। इसका कारण यह बताया गया कि ईरान और कई खाड़ी देशों ने इसके लिए आग्रह किया है, क्योंकि समझौते की रूपरेखा बन चुकी है, लेकिन कुछ ही घंटे बाद ईरानी सैन्य सूत्रों के हवाले से खबर आई कि होर्मुज जलमार्ग को खोलने पर कोई सहमति बनी ही नहीं है। इससे कुछ दिन पहले व्हाइट हाउस ने हमास के निरस्त्रीकरण का भी पंद्रह सूत्रीय ढांचा घोषित किया था, जबकि उसी दिन अमेरिकी सेंट्रल कमान ने ईरान पर भारी बमबारी कर दी।

कुछ ही दिनों के अंतराल में अमेरिकी सरकार की ये चार घोषणाएं एक गंभीर नीतिगत संकट का संकेत देती हैं। व्यापार हो, गठबंधन हो, महाशक्तियों से संवाद हो या युद्ध-लगभग हर मोर्चे पर अमेरिकी सरकार द्वारा पहले घोषणा की गई और उसे लागू करने वाली व्यवस्था बाद में सामने आई। कई मामलों में तो ऐसी व्यवस्था बन ही नहीं सकी। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही दुनिया को यह संदेश दिया था कि वे रूस-यूक्रेन युद्ध को शीघ्र समाप्त करवा देंगे, लेकिन उस घोषणा को भी कई महीने बीत चुके हैं और आज वह युद्ध पहले से अधिक तीव्र हो गया है। जिस युद्ध को समाप्त करने का वादा किया गया था, वह नहीं रुका और जिसकी चर्चा भी नहीं थी, वह ईरान युद्ध शुरू हो गया।

ट्रंप के मनमाने फैसलों की कीमत वे देश चुका रहे हैं, जिनसे उन्होंने पूछा तक नहीं। दरअसल वाशिंगटन तक पहुंचने में असमर्थ ईरान अब उन्हीं देशों को निशाना बना रहा है, जो उसकी पहुंच में हैं। खाड़ी के छह देश ईरान से आने वाली मिसाइलों और ड्रोन हमलों का सामना कर रहे हैं। ऊर्जा प्रतिष्ठान और खारे जल के शोधन संयंत्र तक निशाने पर आ चुके हैं। होर्मुज जलमार्ग बंद हो चुका है। इसके कारण ईरान का युद्ध अब केवल क्षेत्रीय नहीं रह गया है। पहले होर्मुज जलमार्ग से प्रतिदिन लगभग 88 जहाज गुजरते थे, जबकि जुलाई में यह संख्या घटकर मात्र 10 रह गई। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड अब जहाजों की आवाजाही पर शुल्क वसूलने पर आमादा है-प्रति जहाज 20 लाख डालर तक, वह भी युआन, बिटकाइन या अन्य मुद्राओं में।

इससे कुछ दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ने उन्हीं जहाजों को सुरक्षा देने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन माल के मूल्य का 20 प्रतिशत शुल्क लेकर। इस प्रकार एक ही जलमार्ग पर दो 'चुंगी नाके' बन गए हैं और दोनों उन्हीं सरकारों के हैं, जिन्होंने उसे बंद कराया है। दुनिया का लगभग एक-चौथाई समुद्री तेल इसी मार्ग से होकर गुजरता है। इसलिए इसका बोझ केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा है। इसका प्रभाव यूरोप, एशिया, अफ्रीका और अमेरिका-हर महाद्वीप में बीमा, माल-भाड़े और ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के रूप में दिखाई दिया है। सबसे अधिक बोझ उन्हीं खाड़ी देशों पर पड़ा है, जो इस जलमार्ग के दोनों किनारों पर बसे हैं। यह स्थिति किसी देश की जनता ने नहीं चुनी, लेकिन इसकी कीमत हर देश की जनता चुका रही है। होर्मुज जलमार्ग को दोबारा खोलने के सभी प्रयास अब तक विफल होते दिखाई दे रहे हैं।

अब फलस्तीन शांति बोर्ड को इसी पृष्ठभूमि में देखिए। वह सफल होगा या नहीं, यह कहना कठिन है, क्योंकि पांच महीनों में उससे केवल एक बैठक, कुछ वादे और ऐसा ढांचा सामने आया है, जिसकी लगभग प्रत्येक शर्त अधूरी प्रतीत होती है। फरवरी में जिस स्थिरीकरण बल (स्टेबिलाइजेशन फोर्स) की तैनाती का वचन दिया गया था, वह आज तक तैनात नहीं हो सका। गाजा का प्रशासन संभालने के लिए गठित फलस्तीनी समिति भी अब तक वहां प्रवेश नहीं कर सकी है।

दरअसल शांति बोर्ड का ढांचा उसी सबसे बड़ी गुत्थी को अनछुआ छोड़ देता है। इजरायल का कहना है कि वास्तविक निरस्त्रीकरण से पहले उसकी वापसी संभव नहीं है, जबकि हमास का तर्क है कि इजरायली वापसी से पहले निरस्त्रीकरण नहीं हो सकता। इस गतिरोध को सुलझाने के लिए 14 दिन का समय निर्धारित किया गया है। विडंबना यह भी है कि इस शांति बोर्ड का अध्यक्ष स्वयं अमेरिका है, जो इस समय ईरान के साथ युद्धरत है।

राष्ट्रपति ट्रंप के अनुसार खाड़ी क्षेत्र के देशों के आग्रह पर उन्होंने ईरान पर सैन्य कार्रवाई रोकी है। पिछले पांच महीनों में यह दूसरी बार है, जब खाड़ी के प्रमुख देशों ने ईरान-अमेरिका संघर्ष को बड़े युद्ध का रूप लेने से रोका है। इसके बावजूद किसी स्थायी समझौते की संभावना अभी दूर दिखाई देती है। ट्रंप का कहना है कि प्रस्तावित सहमति होर्मुज जलमार्ग को स्थायी रूप से खुला रखेगी, जबकि ईरान का कहना है कि किसी भी व्यवस्था में इस जलमार्ग पर उसकी संप्रभुता बनी रहेगी। ये किसी एक समझौते की दो अलग-अलग व्याख्याएं नहीं, बल्कि दो भिन्न समझौते प्रतीत होते हैं।

जून में शांति को लेकर दोनों देशों के बीच बनी सहमति भी इसी व्याख्यात्मक मतभेद के कारण टूट गई थी। ट्रंप सरकार की अब तक की घोषणाओं ने दुनिया को होर्मुज जलमार्ग पर गतिरोध, यूरोप में जारी युद्ध और गाजा में अधूरी शांति दी है। सवाल यह नहीं है कि वाशिंगटन एक और घोषणा कर सकता है या नहीं, बल्कि वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या वह अपनी किसी भी घोषणा को उसके तार्किक और व्यावहारिक परिणाम तक पहुंचा पाएगा या नहीं।

(लेखक पश्चिम एशिया मामलों के जानकार हैं)