विचार: कैसे सुधरे शहरों की सूरत
बेहतर आर्थिक उत्पादकता और स्वास्थ्य देखभाल के बोझ में कमी के रूप में मिलने वाला दीर्घकालिक लाभ शुरुआती पूंजीगत लागत से कहीं अधिक होगा।
HighLights
शहरों की सीवेज व्यवस्था की ढांचागत कमियां गंभीर समस्या।
सार्वभौमिक सीवेज नेटवर्क के लिए चरणबद्ध निवेश आवश्यक।
राजनीतिक इच्छाशक्ति और नागरिक भागीदारी से ही संभव सुधार।
तरुण गुप्त। भारत में बारिश चिरपरिचित अंतर्विरोधों को ही उजागर करती है। यह दुविधा बढ़ जाती है कि बरसात में खुशी मनाई जाए या फिर उसके बाद के हालात पर अफसोस। हमें शर्म के साथ इस सच को स्वीकारना होगा कि हमारे शहरों की गिनती दुनिया के सबसे गंदों शहरों में होती है। शहरों की इस दशा का एक प्रमुख कारण उनकी सीवेज व्यवस्था की ढांचागत कमियां हैं। अधिकांश शहरों एवं कस्बों के आधे से भी कम हिस्से सीवेज नेटवर्क से जुड़े हैं। कई क्षेत्रों में सीवेज लाइनें और पाइप कनेक्शन गायब हैं। शोधन की क्षमता बहुत कम है।
बारिश के पानी की निकासी के लिए बनाए गए बरसाती नालों में अशोधित सीवेज और औद्योगिक कचरे का बहना जारी है। यही खुले नाले अंततः नदियों में मिल जाते हैं। फिर नदियों और नालों में अंतर करना मुश्किल हो जाता है। इस संदर्भ में 'नमामि गंगे' जैसी योजना के माध्यम से बड़ी सरकारी पहल हुई है, जिसका उद्देश्य है नदी में गिरने से पहले सीवेज को शोधित करना। इससे नदियों के मुहाने पर प्रदूषण घटाने में तो मदद मिल सकती है, पर पूरे शहर में बहते खुले सीवेज से जुड़े खतरों के जोखिम तो बने ही रहेंगे। इसके कारण वायु, जल एवं मृदा के दूषित होने के साथ ही बैक्टीरिया, फंगस और मच्छर जनित बीमारियों का एक अंतहीन सा सिलसिला जुड़ जाता है। ऐसे में खुले में शौच से मुक्ति की उपलब्धि वास्तविकता से कोसों दूर लगती है।
समस्या स्पष्ट है, समाधान भी सीधा है, परंतु हमारी सामूहिक उदासीनता बहुत सालती है। क्या हम रहने योग्य और स्वच्छ शहर पाने के हकदार नहीं हैं? बिना सीवेज शोधन के यह संभव नहीं है। समय आ गया है कि देश सार्वभौमिक सीवेज नेटवर्क की दिशा में सक्रिय रूप से प्रयास करे। यह काम रातोंरात नहीं हो सकता, पर कदम तो बढ़ाने ही होंगे। हमें एक चरणबद्ध दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसकी शुरुआत विकास के इंजन माने जाने वाले शीर्ष 100 शहरों से हो। फिर योजनाबद्ध तरीके से इसका विस्तार सभी शहरी और ग्रामीण बस्तियों में किया जाए।
इस राह में अक्सर वित्तीय संसाधनों के अभाव को एक बाधा माना जाता है, पर सार्वजनिक विमर्श में कभी-कभार किसी चर्चा को लेकर हंगामे के बजाय उसमें स्पष्टता के भाव की महत्ता कहीं अधिक होती है। इस संदर्भ में टियर-2 या टियर-3 शहर के परिप्रेक्ष्य में नीतिगत उदाहरण पर विचार करें, जहां सीवेज नेटवर्क आधे से भी कम हिस्से को कवर करता है। अनुमानों के अनुसार इसे शत-प्रतिशत मानकों के अनुरूप अपग्रेड करने के लिए औसतन 5,000 करोड़ रुपये के शुरुआती निवेश की आवश्यकता होगी।
इससे एक ऐसी एकीकृत जल निकासी प्रणाली विकसित होगी, जहां समर्पित पाइपलाइनें पूरे शहर को कवर करें और पूरे सीवेज को चिह्नित शोधन इकाइयों तक पहुंचाएं, जहां इसे रीसाइकिल या सुरक्षित रूप से विसर्जित किया जा सके। स्वच्छता से जुड़ी तमाम पहलों के तहत इन खर्चों को उठाने का साझा दायित्व केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों का है। भारतीय शासन व्यवस्था के इन तीनों स्तरों का सम्मिलित वार्षिक खर्च लगभग 100 लाख करोड़ रुपये है। इतने बड़े पैमाने पर भूमिगत नेटवर्क बिछाने में कम से कम पांच साल का समय लगेगा।
यदि हम आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण शीर्ष 100 शहरों को ही देखें तो उन्हें पूरी तरह सीवेज-युक्त बनाने के लिए लगभग पांच लाख करोड़ रुपये की पूंजी चाहिए होगी, जिसे पांच साल की अवधि में खर्च किया जाएगा। यह राशि एक वर्ष के कुल सार्वजनिक व्यय का लगभग 5 प्रतिशत और पांच वर्षों के कुल सरकारी खर्च का महज एक प्रतिशत ही है। यदि पूरे भारत का प्रशासनिक तंत्र इन शहरों में सीवेज बुनियादी ढांचे के लिए अपने वार्षिक खर्च का केवल एक प्रतिशत हिस्सा नियत कर दे, तो पांच वर्षों में व्यापक लक्ष्य प्राप्ति संभव है। हालांकि भूमि अधिग्रहण और नगरीय एजेंसियों के बीच नौकरशाही का टकराव बड़ी व्यावहारिक चुनौतियां हैं, पर बुनियादी वित्तीय गणित पूरी तरह से व्यावहारिक और संभव है।
संप्रति, भारत के तीन-चौथाई हिस्से में केंद्र और राज्यों में एक ही दल-गठबंधन का शासन है, जिसे डबल-इंजन सरकार तो कई नगरीय निकायों में उसकी सत्ता के साथ उसे ट्रिपल इंजन सरकार कहा जाता है। ऐसे में शहरों का कायापलट भला क्यों नहीं किया जा सकता? बाधा संसाधनों की कमी है या राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव?
सार्वजनिक नीति को अक्सर उन बिंदुओं को चिह्नित करने का प्रयास करना चाहिए, जिनका प्रभाव सबसे अधिक हो। इसे 'पारेतो सिद्धांत' से समझा जा सकता है। इतालवी अर्थशास्त्री वैलफ्रोडो पारेतो के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत परिणाम केवल 20 प्रतिशत मुख्य कारकों से आते हैं। इसका अर्थ है कि यदि आप सही 20 प्रतिशत कारकों को लक्षित करते हैं, तो 80 प्रतिशत परिणामों को सुधार सकते हैं। स्वच्छता निःसंदेह उच्च-प्रभाव वाले मूलभूत कारकों में से एक है। इसका मानव जीवन की दैनिक गुणवत्ता और मानव विकास सूचकांकों पर सीधा सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बेहतर आर्थिक उत्पादकता और स्वास्थ्य देखभाल के बोझ में कमी के रूप में मिलने वाला दीर्घकालिक लाभ शुरुआती पूंजीगत लागत से कहीं अधिक होगा।
सुदृढ़ शासन के पांच प्रमुख स्तंभ होने चाहिए: शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा, कानून-व्यवस्था और व्यापक स्वच्छता। एक विकासशील से विकसित राष्ट्र एवं समाज बनने के स्वप्न की पूर्ति तब तक असंभव होगी, जब तक हम इन क्षेत्रों में विश्वस्तरीय मानक हासिल नहीं कर लेते। विदेशी पूंजी, निजी निवेश और घरेलू उत्पादकता का इन सभी पहलुओं से एक गहरा और प्रणालीगत संबंध है।
बेहद प्रतिस्पर्धी चुनावी लोकतंत्र में अक्सर दीर्घकाल में आकार लेने वाली बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं की तुलना में उन अल्पकालिक लोकलुभावन उपायों को प्राथमिकता दी जाती है, जो त्वरित राजनीतिक लाभ देते हैं। ऐसे में यह नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे इस विमर्श को दिशा दें और सार्वजनिक प्राथमिकताओं को सही परिप्रेक्ष्य में लाएं। सदियों पुरानी इस गंदगी को पूर्ण संस्थागत जवाबदेही और गहरे सामुदायिक जुड़ाव के बिना साफ नहीं किया जा सकता।
(लेखक दैनिक जागरण के प्रबंध संपादक हैं)


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