क्षमा शर्मा। फिलहाल अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध जारी है। अमेरिका और ईरान, दोनों ने इसका श्रेय पाकिस्तान को दिया। बाद में यह स्पष्ट हुआ कि पाकिस्तान की भूमिका मुख्यतः संदेशवाहक की थी। इस पर भारत की भूमिका को लेकर भी चर्चा हुई और कुछ हलकों में यह आलोचना सामने आई कि उसकी भूमिका को पर्याप्त मान्यता नहीं मिली।

हालांकि पाकिस्तान सुन्नी बहुल है, जबकि ईरान शिया बहुल। इसके बावजूद इस दौरान कुछ देशों ने कहा कि वे स्वयं को शिया या सुन्नी के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक रूप से मुसलमान के रूप में देखते हैं और वैश्विक स्तर पर उनके हित परस्पर जुड़े हुए हैं। इसी संदर्भ में कश्मीर में ईरान के समर्थन में धन एकत्र करने की गतिविधियां सामने आईं, जबकि भारत का इस संघर्ष से कोई संबंध नहीं।

हाल में सैमुअल पी. हंटिंगटन की पुस्तक ‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन्स’ फिर से पढ़ी। वे लिखते हैं, 'सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व एकध्रुवीय हो गया है। आने वाले समय में संघर्ष राष्ट्रों के बीच नहीं, बल्कि सभ्यताओं के बीच होगा। महाशक्तियों के बीच की प्रतिस्पर्धा सभ्यताओं के टकराव के रूप में प्रकट होगी। सभ्यताओं का यह संघर्ष विश्व शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है। यह संघर्ष किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि व्यापक स्तर पर फैल सकता है।

आज लोग आधुनिक पहचान के साथ-साथ अपनी पारंपरिक पहचान को भी पुनः खोज रहे हैं। इसी कारण वे नई परिस्थितियों के साथ-साथ पुराने द्वंद्वों को भी बनाए हुए हैं और उन्हें भूलने के लिए तैयार नहीं हैं। भविष्य में संघर्ष केवल आर्थिक असमानताओं जैसे-अमीर और गरीब के बीच तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विभिन्न सभ्यताओं के बीच अधिक तीव्र रूप में सामने आएगा। यह इतिहास का एक अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण दौर हो सकता है।' सभ्यताओं के रूप में वे पश्चिमी, दक्षिण अमेरिकी, अफ्रीकी, इस्लामिक, सिनिक, हिंदू, आर्थोडाक्स, बौद्ध और जापानी सभ्यताओं का उल्लेख करते हैं।

अमेरिकी राजनीतिज्ञ हेनरी किसिंजर ने एक बार कहा था कि 21वीं सदी में छह बड़ी शक्तियां होंगी-अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान, रूस और संभवतः भारत। वहीं सैमुअल हंटिंगटन ने चीन, वियतनाम और जापान को अलग-अलग सभ्यताओं के रूप में देखा। इन क्षेत्रों में बौद्ध परंपरा का व्यापक प्रभाव है। इसी प्रकार अफ्रीका में मुसलमानों और ईसाइयों की बड़ी आबादी है, जबकि दक्षिण अमेरिका, उत्तरी अमेरिका, यूरोप और रूस मुख्यतः ईसाई बहुल क्षेत्र हैं। हंटिंगटन का मत है कि सिनिक (चीनी) और जापानी सभ्यताओं ने स्वयं को आर्थिक आधार पर आधुनिक बनाया है, जबकि इस्लामिक विश्व अपनी पहचान को आर्थिक आधार पर कम, बल्कि सांस्कृतिक और पंथक आधार पर अधिक सुदृढ़ करता है।

साथ ही पश्चिमी मूल्यों के प्रति उनकी आलोचनात्मक दृष्टि भी अक्सर सामने आती है। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि विश्वभर में पश्चिम द्वारा विकसित अनेक तकनीकों और उत्पादों का व्यापक उपयोग होता है। आधुनिक तकनीक अपनाने के बावजूद समाज अपनी पारंपरिक पहचान और सांस्कृतिक तौर-तरीकों को भी बनाए रखना चाहता है। पश्चिमी देशों में भी अब पंथ के प्रति पहले जैसा विरोध दिखाई नहीं देता। कई स्थानों पर रविवार को बड़ी संख्या में लोग चर्च जाते हैं। ऐसे में पंथ को राजनीति से पूर्णतः अलग करने की अवधारणा अब पहले जैसी प्रभावी नहीं रह गई है।

फ्रांसीसी क्रांति के बाद विकसित हुए महत्वपूर्ण मूल्य जैसे-स्वतंत्रता, बंधुत्व और समानता आज चुनौती के दौर से गुजर रहे हैं। अब प्रत्येक समाज और राष्ट्र स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ में लगा दिखाई देता है। अपनी संस्कृति, खान-पान और जीवनशैली को श्रेष्ठ बताने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जबकि अन्य को कमतर आंका जा रहा है। इसके साथ ही मजहब के आधार पर नए-नए गठबंधनों और समझौतों की प्रवृत्ति भी उभर रही है। नाटो में तुर्किये को छोड़ अधिकांश देश ईसाई बहुल हैं। इस्लामिक देशों के बीच भी समान प्रकृति के गठबंधन की चर्चाएं उठती रहती हैं। हाल में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है, जहां एक पर हमला दूसरे पर हमला माना जाएगा।

यदि दुनिया के सभी ईसाई, इस्लामिक या अन्य पंथक आधार वाले देश इसी प्रकार एकजुट होकर सैन्य या राजनीतिक मोर्चे बना लें तो वैश्विक परिदृश्य अत्यंत जटिल और अस्थिर हो सकता है। ऐसे में विश्व निरंतर संघर्षों में उलझा रह सकता है-कभी मजहब, कभी सीमाओं के लिए तो कभी भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता के कारण। एक देश पर हमला होने पर समान पंथ या सभ्यता के आधार पर अन्य देश भी संघर्ष में शामिल हो सकते हैं, जिससे वैश्विक तनाव और बढ़ेगा। यह एक चिंताजनक और भयावह परिदृश्य की ओर संकेत करता है।

हम पंथ या सभ्यता की श्रेष्ठता का कितना ही दावा करें, जीवन के मूलभूत आधार जैसे-भोजन, आजीविका और आर्थिक स्थिरता ही सबसे महत्वपूर्ण हैं। इसलिए आवश्यक है कि विश्व पंथक या सांस्कृतिक पहचानों के आधार पर विभाजित होने के बजाय आर्थिक विकास और सहयोग को प्राथमिकता दे। समृद्ध देशों को अपने लाभ से आगे बढ़कर गरीब और संसाधन-विहीन देशों की सहायता करनी चाहिए। अन्यथा वैश्विक असमानताएं और संघर्ष मानवता के भविष्य को अनिश्चित बना सकते हैं।

(लेखिका साहित्यकार हैं)