हरबंश दीक्षित। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा ने अपने खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया शुरू होने के बीच त्यागपत्र दे दिया। उनके घर करोड़ों के अधजले नोट मिले थे और सुप्रीम कोर्ट की एक समिति ने उन्हें दोषी पाया था। उनके त्यागपत्र देने से अब उनके ऊपर महाभियोग की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ेगी। हो सकता है कि अब उनके ऊपर कोई मुकदमा भी नहीं चले। त्यागपत्र के इस घटनाक्रम ने संविधान के भरोसे, उसकी बेचारगी और आम नागरिक के विश्वास से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

हमारे पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं कि जिस अपराध के लिए आम आदमी से मुख्यमंत्री तक को जेल जाना पड़ता है, आखिर उसी तरह के अपराध के लिए उस संस्था का जिम्मेदार अधिकारी, जिसकी सत्यनिष्ठा की हम कसमें खाते हैं, वह केवल त्यागपत्र देकर दोषमुक्त कैसे हो सकता है? यह घटनाक्रम केवल एक व्यक्ति या पद तक सीमित नहीं है। यह उस संस्थागत विश्वास से जुड़ा प्रश्न है, जिसके आधार पर आम जन न्यायपालिका को न्याय का अंतिम, निष्पक्ष और नैतिक मंच मानता है। जब इस मंच की निष्पक्षता और उत्तरदायित्व पर प्रश्नचिह्न लगता है तो उसका प्रभाव पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर पड़ता है।

महाभियोग ही न्यायाधीशों के विरुद्ध कार्रवाई का एकमात्र संवैधानिक माध्यम है। यह प्रक्रिया जानबूझकर कठिन बनाई गई, ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अनावश्यक राजनीतिक हस्तक्षेप न हो, किंतु व्यवहार में यही जटिलता कई बार जवाबदेही के मार्ग में बाधा बन जाती है। संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता, राजनीतिक सहमति का अभाव और लंबी प्रक्रियात्मक जटिलता के कारण महाभियोग लगभग अप्राप्य प्रक्रिया बनकर रह गया है। अभी तक महाभियोग के जरिए उच्चतर न्यायपालिका के किसी भी न्यायाधीश को हटाया नहीं जा सका है, जबकि कई न्यायाधीश कदाचार के गंभीर आरोपों से घिरे रहे।

अधिकांश मामलों में यही देखने को मिला है कि जैसे ही महाभियोग की संभावना प्रबल होती है, आऱोपों से घिरा संबंधित न्यायाधीश त्यागपत्र देकर प्रक्रिया को निष्प्रभावी कर देते हैं और यहीं से उत्तरदायित्व का संकट उत्पन्न होता है। भारतीय न्यायिक इतिहास में इसके कई उदाहरण मिलते हैं, जो इस समस्या की संरचनात्मक प्रकृति को उजागर करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी के विरुद्ध 1990 के दशक में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, किंतु लोकसभा में आवश्यक समर्थन न मिलने के कारण वह पारित नहीं हो सका। इसका कारण यह रहा कि कई राजनीतिक दलों ने क्षेत्रीयता का सवाल उठाकर उन्हें महाभियोग की प्रक्रिया से हटाने के प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया।

इसके पश्चात कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस सौमित्र सेन के विरुद्ध राज्यसभा ने महाभियोग प्रस्ताव पारित कर दिया था, जो भारतीय संसदीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी, किंतु लोकसभा में अंतिम निर्णय से पूर्व ही उनके त्यागपत्र देने से पूरी प्रक्रिया अधूरी रह गई। इसी प्रकार कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस पी. दिनकरन ने भी गंभीर आरोपों के बीच पद त्याग कर दिया, जिससे उनके विरुद्ध चल रही महाभियोग की कार्यवाही स्वतः समाप्त हो गई। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि त्यागपत्र कई बार एक प्रकार का 'संवैधानिक निकास मार्ग' बन जाता है, जिससे अंतिम उत्तरदायित्व सुनिश्चित नहीं हो पाता। यह स्थिति कई प्रश्न खड़े करती है कि क्या त्यागपत्र देना ही पर्याप्त जवाबदेही है? क्या यह न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा करता है या केवल संस्थागत असहजता से बचने का एक औपचारिक उपाय है? क्या इससे आम नागरिक के मन में यह धारणा नहीं बनती कि उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए अलग मानदंड हैं?

न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति उसकी नैतिक विश्वसनीयता है। यदि वही प्रश्नों के घेरे में आ जाए तो संवैधानिक व्यवस्था की स्थिरता भी प्रभावित हो सकती है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी जवाबदेही, दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। यदि स्वतंत्रता के नाम पर जवाबदेही को कमजोर किया जाता है तो यह लोकतंत्र के लिए उतना ही खतरनाक है, जितना कि अत्यधिक हस्तक्षेप। अतः आवश्यकता इस संतुलन को पुनर्स्थापित करने की है। इसके समाधान के लिए कुछ सुझावों पर विचार किया जा सकता है। प्रथम, महाभियोग प्रक्रिया को अधिक व्यावहारिक और समयबद्ध बनाया जाए, ताकि यह केवल एक सैद्धांतिक प्रविधान न रह जाए।

दूसरा, यह कि एक स्वतंत्र और पारदर्शी न्यायिक आचार आयोग की स्थापना की जाए, जो न्यायाधीशों के विरुद्ध शिकायतों की प्रारंभिक जांच कर सके और आवश्यक अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा कर सके। तृतीय, यह सुनिश्चित किया जाए कि त्यागपत्र देने के बाद भी यदि आरोप आपराधिक प्रकृति के हों तो संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध सामान्य विधिक प्रक्रिया के तहत जांच और अभियोजन जारी रह सके। न्यायपालिका से जुड़ा होना दंड से मुक्ति का आधार नहीं बन सकता। इसके अतिरिक्त पारदर्शिता और जन-विश्वास को सुदृढ़ करने के लिए न्यायपालिका को अपने आंतरिक तंत्रों को अधिक उत्तरदायी बनाना होगा।

न्यायाधीश यशवंत वर्मा का मामला केवल एक न्यायाधीश या एक प्रकरण का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस विश्वास का है, जो करोड़ों भारतीयों ने न्यायपालिका में रखा है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसकी संस्थाओं में नहीं, बल्कि उन संस्थाओं में जनता के विश्वास में निहित होती है। यदि यह विश्वास कमजोर होता है तो संविधान का आत्मा भी आहत होता है। आज आवश्यकता केवल आलोचना की नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संस्थागत सुधार की है। न्यायपालिका की गरिमा को अक्षुण्ण रखते हुए, उसे और अधिक उत्तरदायी बनाना समय की मांग है। तभी यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि न्याय के मानक सभी के लिए समान रूप से लागू हों, बिना किसी अपवाद और विशेषाधिकार के। यही वह कसौटी है जिस पर किसी भी लोकतंत्र की परिपक्वता और विश्वसनीयता का वास्तविक आकलन किया जाता है।

(लेखक तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद के विधि संकाय में डीन हैं)