विचार: वार्ता के लिए रवैया सुधारे पाकिस्तान
भारत-पाकिस्तान संबंधों पर चर्चा के बीच, यह लेख राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर औपचारिक वार्ता की संभावना का विश्लेषण करता है। लेखक का तर्क है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद पर निर्णायक कार्रवाई नहीं करता, तब तक उच्चस्तरीय वार्ता सार्थक नहीं होगी, हालांकि सीमित संवाद माध्यम जारी रहने चाहिए।
HighLights
आतंकवाद पर निर्णायक कार्रवाई के बिना वार्ता निरर्थक।
भारत ने सिंधु जल संधि को भी स्थगित किया था।
सीमित संवाद माध्यम संकट प्रबंधन के लिए आवश्यक।
आनंद कुमार। भारत और पाकिस्तान के संबंध एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। बीते दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे के अलावा दोनों देशों के 117 प्रतिष्ठित नागरिकों ने किसी न किसी रूप में द्विपक्षीय संवाद की महत्ता पर जोर दिया है।
इस बीच, ऐसी खबरें भी आईं कि कोलंबो में भारत और पाकिस्तान के रणनीतिक विशेषज्ञों और पूर्व अधिकारियों के बीच ट्रैक-2 वार्ता भी हुई। इस घटनाक्रम से वही सवाल सामने आया कि क्या भारत को पाकिस्तान के साथ औपचारिक वार्ता फिर से शुरू करनी चाहिए?
इसका उत्तर भावनाओं से नहीं, अपितु राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक यथार्थ के आधार पर दिया जाना चाहिए। बातचीत तभी सार्थक होती है जब दोनों पक्ष शांति और विश्वास का महौल बनाने के लिए तैयार हों। आज ऐसी स्थिति दिखाई नहीं देती।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान को जवाब देने के क्रम में भारत ने पहली बार सिंधु जल संधि को भी स्थगित कर दिया। भारत ने स्पष्ट संदेश दिया कि आतंकवाद और सामान्य संबंध साथ-साथ नहीं चल सकते। सिंधु जल संधि छह दशक तक भारत-पाकिस्तान संबंधों की सबसे मजबूत कड़ी मानी जाती थी। यह युद्धों के दौरान भी कायम रही, लेकिन भारत ने इसे स्थगित करके यह संकेत दिया कि यदि पाकिस्तान आतंकवाद को विदेश नीति का साधन बनाए रखेगा तो पुराने ढांचे भी सुरक्षित नहीं रहेंगे।
फिलहाल नदियों का पानी प्राकृतिक रूप से पाकिस्तान की ओर बह रहा है, लेकिन संधि के तहत होने वाला संस्थागत सहयोग, तकनीकी बैठकें और नियमित संपर्क बंद हैं। पाकिस्तान ने इस फैसले को केवल जल विवाद नहीं रहने दिया। वहां के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बता रहा है।
पाकिस्तान अभी गंभीर आंतरिक संकटों से गुजर रहा है। बलूचिस्तान में लगातार बढ़ते हमले इस बात का प्रमाण हैं कि वहां सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ रही है। पाकिस्तान की अनेक समस्याएं उसकी अपनी आंतरिक राजनीतिक और प्रशासनिक विफलताओं से जुड़ी हैं। गुलाम जम्मू एवं कश्मीर की स्थिति भी उसके लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
वहां कई सप्ताह से लोग महंगाई, बेरोजगारी, बिजली संकट और राजनीतिक भेदभाव के खिलाफ सड़कों पर हैं। आंदोलन केवल आर्थिक मांगों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब बेहतर शासन और राजनीतिक अधिकारों की मांग भी इसमें शामिल हो चुकी है। ऐसे समय में पाकिस्तान का पूरा ध्यान अपने घरेलू संकटों पर होना चाहिए। उधर भारत ने आतंकवाद के खिलाफ कूटनीतिक मोर्चे पर भी सक्रियता बढ़ा दी है।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने पहलगाम हमले के मामले में लश्कर-ए-तोइबा के सरगना हाफिज सईद के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया है। साथ ही भारत वित्तीय कार्रवाई कार्यबल यानी एफएटीएफ में पाकिस्तान को फिर से ग्रे सूची में शामिल कराने के लिए नए साक्ष्य प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहा है। यह दिखाता है कि भारत अब आतंकवाद के विरुद्ध केवल सैन्य कार्रवाई ही नहीं, बल्कि कूटनीतिक, कानूनी और आर्थिक दबाव की संयुक्त रणनीति अपना रहा है।
ऐसे माहौल में यदि कोई व्यापक राजनीतिक वार्ता शुरू होती है तो उससे ठोस परिणाम निकलने की संभावना कम है। जब तक पाकिस्तान आतंकवादी ढांचे पर निर्णायक कार्रवाई नहीं करता, तब तक किसी भी उच्चस्तरीय वार्ता से अधिक उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं होगा। विश्वास की बुनियाद के बिना संवाद केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा।
हालांकि इसका अर्थ यह भी नहीं कि दोनों देशों के बीच हर प्रकार का संपर्क समाप्त कर दिया जाए। व्यापक राजनीतिक वार्ता और संकट के समय आवश्यक संवाद में अंतर है। दोनों देशों के सैन्य संचालन महानिदेशकों के बीच हाटलाइन आज भी काम कर रही है। इसी तरह ट्रैक-2 वार्ताएं भी जारी हैं। इन मंचों पर आतंकवाद, जल विवाद, सीमा पर तनाव और संकट प्रबंधन जैसे विषयों पर चर्चा होती है।
इनसे कोई समझौता नहीं होता, लेकिन गलतफहमियां कम करने और एक-दूसरे का सोच समझने का अवसर अवश्य मिलता है। दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच यदि संवाद के सीमित माध्यम भी समाप्त हो जाएं तो किसी भी छोटे सैन्य या सीमा विवाद के बड़े संघर्ष में बदलने का खतरा बढ़ जाता है।
वर्तमान परिस्थितियों में भारत को दोहरी रणनीति अपनानी होगी। पहली, आतंकवाद के विरुद्ध शून्य सहिष्णुता की नीति पर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए।
पाकिस्तान को यह स्पष्ट संदेश मिलता रहना चाहिए कि सीमा पार आतंकवाद जारी रहने पर सामान्य संबंध संभव नहीं हैं। दूसरी, सैन्य हाटलाइन, सीमित राजनयिक संपर्क, मानवीय मामलों में सहयोग और ट्रैक-2 संवाद जैसे माध्यम जारी रहने चाहिए ताकि किसी भी संकट की स्थिति में तनाव को नियंत्रित किया जा सके। अच्छे संबंधों की पहली शर्त विश्वास होती है और विश्वास की पहली शर्त आतंकवाद का पूरी तरह परित्याग है। जब तक पाकिस्तान इस दिशा में ईमानदार कदम नहीं उठाता, तब तक औपचारिक वार्ता का माहौल नहीं बनेगा।
(लेखक मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान में फेलो हैं)












