युवराज मलिक। आज से ठीक सौ वर्ष पूर्व, 17 जुलाई 1926 को समाज सुधारक, नेता और दूरदर्शी व्यक्तित्व सरदार तेजा सिंह समुंदरी ने केवल 44 वर्ष की आयु में लाहौर सेंट्रल जेल में अंतिम सांस ली।

वस्तुत: ब्रिटिश शासन के दमनकारी अत्याचारों के कारण उनका असामयिक निधन हुआ। यद्यपि उनकी मृत्यु ने देश को एक असाधारण नेता से वंचित कर दिया, किंतु उनके जीवन का कार्य ऐसी विरासत छोड़ गया जिसने भारत के इतिहास को गहराई से प्रभावित किया और जो आज भी पीढ़ियों को प्रेरित कर रही है।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गुरुद्वारा सुधार आंदोलन का नेतृत्व प्रमुख था। इस आंदोलन के माध्यम से उन्होंने सिख धार्मिक संस्थानों को पुनः समुदाय के नियंत्रण में लाने और उन्हें सिख गुरुओं द्वारा प्रतिपादित समानता, लोकतंत्र तथा जनभागीदारी के आदर्शों के अनुरूप स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अपने सार्वजनिक जीवन के दौरान सरदार तेजा सिंह समुंदरी ने सदैव अपने धर्म और राष्ट्र के हितों को व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखा। उन्होंने अपनी आजीविका का त्याग किया, अपनी संपत्ति को आंदोलन के लिए समर्पित किया और अंततः उन सिद्धांतों के प्रति अटूट निष्ठा रखते हुए अपना जीवन भी बलिदान कर दिया, जिन पर उनका अटूट विश्वास था।

गुरुद्वारा सुधार आंदोलन : बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक अधिकांश सिख गुरुद्वारों का प्रबंधन औपनिवेशिक शासन द्वारा नियुक्त व्यक्तियों के हाथों में था। समय के साथ इनमें से कई लोगों ने गुरुद्वारों तथा उनकी समृद्ध संपत्तियों पर वंशानुगत अधिकार का दावा करना शुरू कर दिया। ब्रिटिश प्रशासन के संरक्षण में उन्होंने सिख परंपरा के विनम्रता, सेवा और समानता के आदर्शों से दूरी बना ली तथा गुरुद्वारों को जनसेवा के केंद्रों के बजाय व्यक्तिगत विशेषाधिकार और भौतिक लाभ के साधन के रूप में उपयोग करना प्रारंभ कर दिया।

इन्हीं परिस्थितियों के बीच सिख समुदाय ने गुरुद्वारा सुधार आंदोलन शुरू किया। इसके विरोध में ब्रिटिश समर्थित प्रबंधक तथा सिख अभिजात वर्ग का एक वर्ग खड़ा था, जिसने औपनिवेशिक शासन के साथ स्वयं को जोड़ लिया था। इस ऐतिहासिक संघर्ष के दौरान तेजा सिंह समुंदरी आंदोलन के सबसे दृढ़, समर्पित और प्रभावशाली नेताओं में से एक के रूप में उभरे।

व्यक्तिगत संपत्ति का त्याग : तेजा सिंह के परिवार के पास अविभाजित पंजाब के लायलपुर जिले की समुंदरी तहसील में कृषि भूमि थी, जिसके आधार पर परिवार ने 'समुंदरी' उपनाम अपनाया। वर्ष 1921 के ननकाना साहिब आंदोलन के दौरान, जब स्थानीय महंत के आदेश पर निहत्थे प्रदर्शनकारियों का निर्मम नरसंहार किया गया, तब एक अकाली समाचार पत्र ने इस घटना पर ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित की जिसने औपनिवेशिक प्रशासन को झकझोर दिया।

इसके प्रतिशोधस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने उस समाचार पत्र पर 40 हजार रुपये का भारी आर्थिक दंड लगाया। इस संकट की घड़ी में समुंदरी ने बिना किसी हिचकिचाहट के प्रकाशकों को आश्वस्त किया कि यदि आवश्यकता पड़ी तो वे अपनी कृषि भूमि की नीलामी करवाकर भी इस राशि की व्यक्तिगत गारंटी देंगे। उनकी व्यक्तिगत संपत्ति का त्याग करने की तत्परता अन्य अवसरों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

सिख गुरुद्वारा अधिनियम : गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की बढ़ती शक्ति और जनसमर्थन से चिंतित ब्रिटिश सरकार ने समुंदरी सहित आंदोलन के अनेक प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। किंतु कारावास भी इस आंदोलन की गति को रोक नहीं सका। अंततः औपनिवेशिक प्रशासन को 1925 का 'सिख गुरुद्वारा अधिनियम' पारित करने के लिए विवश कर दिया, जिसके अंतर्गत सिख गुरुद्वारों का प्रबंधन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) को सौंप दिया गया।

हालांकि, सरकार ने इस रियायत के साथ एक शर्त भी जोड़ दी। जेल में बंद नेताओं को रिहा किए जाने से पहले उनसे लिखित आश्वासन देने को कहा गया कि वे भविष्य में न तो किसी प्रकार का आंदोलन प्रारंभ करेंगे और न ही नए अधिनियम के किसी प्रविधान को चुनौती देंगे।

सरकार की इस शर्त ने उस समय कारावास में बंद 31 वरिष्ठ अकाली नेताओं के बीच मतभेद उत्पन्न कर दिया। अधिकांश नेताओं ने रिहाई के बदले सरकार की शर्तें स्वीकार करने का निर्णय लिया। किंतु 11 नेताओं ने, जिनमें सरदार तेजा सिंह समुंदरी और मास्टर तारा सिंह प्रमुख थे, किसी भी प्रकार का समझौता करने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। परिणामस्वरूप, उनके अनेक सहयोगियों को रिहा कर दिया गया, परंतु समुंदरी जेल में ही रहे।

इसी कारावास के दौरान लाहौर जेल में एक दुखद घटना घटी। 17 जुलाई, 1926 को तेजा सिंह समुंदरी का जेल के भीतर निधन हो गया। उनकी मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई, इसका कभी भी संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को यह स्मरण कराती है कि आधुनिक पंजाब और भारत का निर्माण उन व्यक्तित्वों के त्याग, समर्पण और दूरदृष्टि से हुआ है, जिन्होंने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर राष्ट्र और समाज के हितों को रखा।

(लेखक राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के निदेशक हैं)