डॉ. रामानंद शर्मा। इस मानसून सत्र की दहलीज पर ‘एक देश-एक चुनाव’ को लेकर देश में जैसी बहस छिड़ी है, वैसी किसी अन्य सुधार पर लंबे समय से नहीं देखी गई। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं कि एक देश-एक चुनाव को लेकर कोई विधेयक संसद के इस सत्र में आएगा या नहीं, लेकिन यदि आता है तो उसे लेकर विरोध देखने को मिल सकता है, क्योंकि कई राजनीतिक दल एक साथ चुनाव के विचार को खारिज करते चले आ रहे हैं। मूल प्रश्न यह नहीं है कि देश में चुनाव कितनी बार होते हैं, बल्कि यह है कि चुनी हुई सरकारें जनता को कैसा शासन दे पाती हैं। यही वह बुनियादी आधार है, जिसके केंद्र में यह पूरा प्रस्ताव खड़ा है। वर्तमान में संसद की संयुक्त समिति संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 को खंगाल रही है। पीपी चौधरी की अध्यक्षता में विभिन्न पक्षों से संवाद जारी है। इसे केवल चुनाव का कैलेंडर ठीक करने की यांत्रिक कसरत समझना भूल होगी। यह भारतीय शासन-व्यवस्था को बुनियादी तौर पर कसने और उसे नया स्वरूप देने का ऐतिहासिक अवसर है।

एक साथ चुनाव लोकतंत्र का विकल्प नहीं, बल्कि हमारी चुनावी प्रक्रिया का अनिवार्य शोधन है। बीते एक दशक में शासन की रफ्तार, डिजिटल गवर्नेंस और बुनियादी ढांचे के निर्माण को जिस तरह नीति की निरंतरता से गति मिली है, उसी सिलसिले में इस सुधार का दस्तक देना स्वाभाविक है। भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट यह है कि देश एक स्थायी चुनावी भंवर में फंस चुका है। पिछले पांच वर्षों का रिकार्ड गवाह है कि हर साल किसी न किसी बड़े राज्य में चुनावी मरोड़ उठती है और आचार संहिता का पहरा बैठ जाता है। नतीजा यह कि शासन का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा के काम के बजाय चुनावी बंदोबस्त में होम हो जाता है। इसका सीधा असर सार्वजनिक निवेश और नीतिगत फैसलों पर पड़ता है। कोविंद समिति की रिपोर्ट ने साफ रेखांकित किया है कि इन बिखरी हुई चुनावी तारीखों के कारण देश प्रशासनिक और आर्थिक अनिश्चितता की भारी कीमत चुका रहा है। जैसे ही आचार संहिता लागू होती है, नई विकास योजनाएं, टेंडर और बड़े फैसले फाइलों में सिमट कर रह जाते हैं। बुनियादी ढांचे के बड़े प्रोजेक्ट्स को रफ्तार चाहिए, लेकिन बार-बार लगने वाला यह राजनीतिक ब्रेक उनकी लागत बढ़ाता है और समय लील जाता है।

देश का करदाता अपनी गाढ़ी कमाई से जिस प्रशासनिक तंत्र को विकास के लिए टैक्स देता है, वह भी मशीनरी महीनों चुनावी फेर में उलझी रहती है। इसकी सबसे करारी चोट हमारी शिक्षा व्यवस्था पर पड़ती है। चुनावों की घोषणा होते ही लाखों शिक्षकों और सुरक्षा बलों को उनके मूल दायित्वों से हटाकर ड्यूटी पर तैनात कर दिया जाता है। सरकारी स्कूलों में पढ़ाई ठप हो जाती है। बच्चों के इस नुकसान की भरपाई कोई राजनीतिक दल नहीं कर सकता। लोकतंत्र का मतलब सिर्फ वोट डालना नहीं है। जनता को निर्बाध और सुचारु नागरिक जीवन मिलना ही इसकी असली कसौटी है। हम इसकी भी अनदेखी नहीं कर सकते कि किसी राज्य में चुनाव की घोषणा होते ही राजनीतिक दल अपनी प्राथमिकताएं बदलने को बाध्य हो जाते हैं।

यदि हम भारतीय चुनावी इतिहास को देखें तो 1951 से 1967 तक देश में एक साथ ही चुनाव होते थे। यह समकालिक व्यवस्था इसलिए समाप्त नहीं हुई कि वह नाकाम थी, बल्कि राजनीतिक अस्थिरता और समयपूर्व विघटनों के कारण उसका क्रम टूटा। इसलिए यह विचार किसी एक सरकार की तात्कालिक उपज नहीं है। चुनाव आयोग, विधि आयोग और संविधान समीक्षा आयोग वर्षों से इसे एक जरूरी सुधार के रूप में रेखांकित करते रहे हैं। स्वयं चुनाव आयोग आवश्यक संवैधानिक और प्रशासनिक तैयारी के साथ इसे संभव मानता है। ऐसे में यह बहस केवल राजनीतिक नफा-नुकसान की नहीं, देश की संस्थागत तत्परता की है। यह कोई नया या अनजाना प्रयोग नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की मूल चुनावी व्यवस्था को आज की परिस्थितियों के अनुरूप पुनर्स्थापित करने का एक गंभीर प्रयास है।

हालांकि इस सुधार के लिए आवश्यक संवैधानिक संशोधनों को लेकर कई तरह की आशंकाएं भी उठाई जा रही हैं। मुख्य विपक्षी दलों और क्षेत्रीय ताकतों का तर्क है कि एक साथ चुनाव होने से राष्ट्रीय मुद्दे प्रांतीय चुनावों पर हावी हो जाएंगे। उनका मानना है कि इससे स्थानीय सरोकार हाशिए पर चले जाएंगे और बहुदलीय ढांचा कमजोर पड़ सकता है। हालांकि हमारा चुनावी इतिहास यह दिखाता है कि भारतीय मतदाता कहीं अधिक परिपक्व है। यदि राष्ट्रीय मुद्दे स्थानीय मुद्दों को दबा देते तो अनेक राज्यों में मतदाता एक ही दिन लोकसभा और विधानसभा में अलग-अलग दलों को जनादेश क्यों देते? आखिर अब भी कई राज्यों के विधानसभा चुनाव लोकसभा के साथ होते हैं। हमारी जनता राष्ट्रीय और स्थानीय प्राथमिकताओं के फर्क को बखूबी समझती है। इसका सबसे कठिन हिस्सा इसके कानूनी पहलुओं से जुड़ा है। यदि कोई राज्य सरकार दो साल में ही गिर जाए या केंद्र में त्रिशंकु सदन की स्थिति बन जाए तो उस स्थिति में इस समकालिक चक्र को कैसे बचाया जाएगा? विधि आयोग और उच्चस्तरीय समिति के अनुसार, ऐसी स्थिति में होने वाले मध्यावधि चुनाव केवल पिछले सदन के बचे हुए कार्यकाल के लिए ही होने चाहिए। यह व्यवस्था व्यावहारिक रूप से कई गंभीर सवाल खड़े करती है। क्या मतदाता केवल दो साल के कार्यकाल के लिए फिर से मतदान करने के लिए तत्पर होंगे?

असली चुनौती केवल एक बार साथ चुनाव कराने की नहीं है, बल्कि राजनीतिक अस्थिरता के बीच इस पूरी व्यवस्था को टिकाऊ बनाए रखने की है। वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के वृहद राष्ट्रीय लक्ष्य को पूरा करने के लिए नीतियों की निरंतरता और प्रशासनिक स्थिरता सबसे पहली शर्त है। जब देश निरंतर चुनावी चक्रों के भंवर से मुक्त रहेगा, तभी हम बुनियादी ढांचे के निर्माण और बड़े आर्थिक सुधारों को सफलता से जमीन पर उतार पाएंगे। इसीलिए 'एक देश-एक चुनाव' को भी किसी दलगत राजनीति के चश्मे से देखने के स्थान पर इसे राष्ट्र-निर्माण के नजरिए से देखा जाना चाहिए। इसमें ही सबका हित है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)