शंकर शरण। यह एक विडंबना ही है कि खालिस्तानी उग्रवाद के खत्म हो जाने के बाद उसकी कोई आधिकारिक समीक्षा नहीं की गई। भारतीय शासकों ने कभी परवाह नहीं की कि देश की नई पीढी को 1981-1992 के बीच के दौर के संपूर्ण घटनाक्रम के बारे में स्पष्ट बताया जाए। यह वैचारिक मैदान खुली छूट देता है कि खालिस्तानी पक्ष या उनके समर्थक अपने नजरिये से उस दौर का इतिहास प्रस्तुत करें। कुछ अर्थ में फिल्म 'सतलुज' ने यही किया है।

अब इसे अपनी बात कहने से रोकना दूसरा दोष है, जो शासकों के माथे जाता है। यह घटनाक्रम फिर दिखाता है कि स्वतंत्र भारत के शासक कई मामलों में अनाड़ी बने रहे हैं। चाहे कश्मीर हो या असम या पंजाब-जब भी राष्ट्रीय संप्रभुता को चुनौती मिलती है, तब वे इसे पहचानने से इन्कार करते हैं। अलगाव चाहने वाले तत्वों के बारे में झूठी-मीठी बातों से खुद को और लोगों को भ्रमित करते हैं। इस तरह वैसे तत्वों को जाने-अनजाने बढ़ने देते हैं।

जब हालत बहुत बिगड़ जाती है, तब सुरक्षा बलों को कार्रवाई करने को कहते हैं। उसमें स्वभावत: ऊंच-नीच होती ही है। जैसे युद्ध में होती है। दोनों पक्षों द्वारा होती है। अंततः भारी कीमत देकर मामला काबू में आने पर शासक आराम से बैठ जाते हैं। यही खालिस्तानी उग्रवाद पर भी हुआ।

पंजाब पुलिस के प्रमुख रहे केपीएस गिल के नेतृत्व में 1992 में खालिस्तानी उग्रवाद का खात्मा हुआ, फिर केंद्रीय शासकों ने क्या किया? कुछ नहीं, बल्कि इससे नजर बचाने जैसी मुद्रा रखी कि 1981 से 1992 तक क्या-क्या हुआ था? सरकार ने कोई श्वेत पत्र जारी नहीं किया। न ही खालिस्तानी उग्रवाद का खात्मा करने वाले अधिकारियों का कोई सम्मान किया।

जिन केपीएस गिल ने असाधारण साहस से पंजाब को भारत से अलग करने से रोका, उनके लिए उन्हें कभी कोई सम्मान नहीं दिया गया। यहां तक कि उनके देहांत पर हुई शोक सभा में एक भी केंद्रीय नेता नहीं आया। मानो सभी नेता इससे लज्जित थे कि गिल ने भारतीय संप्रभुता का युद्ध जीत लिया था। निश्चय ही वह एक युद्ध था। यदि आतंकवादी कारनामों, उनके घोषित उद्देश्यों आदि के बारे में देश के शासक स्पष्ट रुख लेकर जन-गण को नहीं बताएंगे, तो लोग भ्रमित होंगे ही। समय बीतने पर अलगाववादी, उग्रवादी पक्ष को अपने को पीड़ित रूप में रखने में कोई असुविधा नहीं होगी।

कुछ यही 'सतलुज' ने किया है। इसने एक विचार रखा है। इसका सही उत्तर दूसरा विचार रखना होता, न कि उसे रोकना। यह बचकानी बात हुई कि यदि भारतीय संप्रभुता के जिम्मेदार अपना और उग्रवाद से पीड़ित लोगों का पक्ष न रखें, तो पंजाब पुलिस के हाथों जाने-अनजाने पीड़ित लोग या खालिस्तानी भी अपना पक्ष न रखें।

आखिर 1992 से 2026 तक भारतीय शासकों, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, शिक्षा विभागों, डीएवीपी आदि अनेकानेक राजकीय वैचारिक संस्थाओं को किसने रोका था कि वे पंजाब पुलिस और खालिस्तानी उग्रवाद से लड़ने वालों के पक्ष में, उस उग्रवाद के हाथों पीड़ित होने वाले हजारों निरीह हिंदुओं-सिखों की दृष्टि से फिल्में बनाते? उन्हें चाहिए था कि उस दौर की पूरी तफसील रिकार्ड पर लाते, जिससे साफ-साफ दिखता कि खालिस्तानी उग्रवाद क्या था और कैसे उस पर काबू पाया गया।

किनकी क्या और कैसी भूमिका रही थी? रिकार्ड उलटा दिखाता है। जब खालिस्तानी उग्रवाद को खत्म करने वाले केपीएस गिल को गुमनाम सी विदाई मिली, तब खालिस्तान के पक्ष में खड़े लोगों को क्यों दोष दें? वे तो वही स्टैंड खुलकर ले रहे हैं, जो शासक अपनी लजीली मुद्रा से अनजाने दिखा रहे थे। भारतीय शासकों की भंगिमा ऐसी रही है मानो खालिस्तानी उग्रवाद के खात्मे के लिए बाकायदा एक आंतरिक युद्ध जैसा नहीं लड़ना पड़ा था, जबकि उसमें एक प्रधानमंत्री, एक मुख्यमंत्री समेत अनेक मंत्रियों, पूर्व मंत्रियों, सांसदों तथा हजारों सामान्य नागरिकों की हत्याएं हुई थीं।

यदि उन सबके बारे में शासकों ने कोई डाक्यूमेंट्री तक नहीं बनाई तो उनका ऐसा मानना मूर्खता है कि खालिस्तान की भावना रखने वाले भी अपना प्रचार न करें। 'सतलुज' के फिल्मकार ने वही बात रखी जो एक राजनीतिक, बौद्धिक वर्ग द्वारा सदैव कही जाती रही है कि खालिस्तानी आतंकवाद से लड़ने के दौरान 'मानवाधिकारों का उल्लंघन' हुआ। यह उन फिल्मकारों की जिम्मेदारी नहीं है कि वे दूसरा पक्ष भी रखें। यानी उन पुलिस वालों, आम जनों, नेताओं, मंत्रियों के जीवन का अधिकार, जो खालिस्तानी आतंकी छीनते रहे। यह काम भारतीय शासकों को करना चाहिए था, जिसकी उन्होंने पूरी अवहेलना की। उन्होंने खालिस्तानी पक्ष के नैरेटिव को बल पहुंचाया।

आखिर भारतीय शासकों की लापरवाही का लाभ वैसे तत्व क्यों नहीं उठाएंगे जो अपने लक्ष्य के प्रति कटिबद्ध हैं? पता नहीं कितने ऐसे महानुभावों को बड़े-बड़े राष्ट्रीय सम्मान मिले हैं, जिन्होंने खुल कर या परोक्ष रूप से अलगाववाद का किसी न किसी रूप का समर्थन किया था, किंतु खालिस्तानी उग्रवाद को खत्म करने वालों को कोई सम्मान नहीं मिला। केपीएस गिल केवल इसके उदाहरण भर हैं। गिल ने दिल्ली में 9 सितंबर, 2006 को एक पुस्तक विमोचन में कहा था, 'जिस पुलिस बल को आतंकवाद पर जीत के बाद प्रशंसा मिलनी चाहिए थी, उसे बुरी तरह बदनाम किया गया। उनकी जीत को झुठलाया गया।'

फिल्म 'सतलुज' जाने-अनजाने यही कर रही है, किंतु इसीलिए कर पा रही है, क्योंकि खालिस्तानी आतंक से लड़ने वाले पुलिस बल को खुद भारतीय शासकों ने कभी सम्मानित नहीं किया। यदि करते तो जैसे हनी त्रेहन ने जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर फिल्म बनाई, वैसे ही कोई अन्य केपीएस गिल के जीवन अथवा खालिस्तानी उग्रवाद से लड़ने वाले किसी अन्य नायक या घटनाओं पर भी फिल्म बना सकता था।

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी या मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के बलिदान तक पर कोई फिल्म नहीं बनाई गई, जो खालिस्तानी उग्रवाद के हाथों मारे गए। फिल्म 'सतलुज' को प्रतिबंधित करने के बजाय इस उग्रवाद से युद्ध का दूसरा पक्ष दिखाना अधिक अच्छा रहता, ताकि लोग यह समझ सकते कि आतंकवाद से युद्ध राष्ट्रीय संप्रभुता बचाने का युद्ध होता है।

(लेखक राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)