जागरण संपादकीय: नागरिकता का प्रश्न
यह किसी से छिपा नहीं कि तमाम बांग्लादेशी घुसपैठियों ने ऐसा कर रखा है। यदि यह समझा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के यह कहने से समस्या का समाधान हो जाएगा कि चुनाव आयोग किसी की नागरिकता तय नहीं कर सकता तो यह सही नहीं।
HighLights
सुप्रीम कोर्ट: मतदाता सूची से नाम कटना नागरिकता खत्म होना नहीं।
चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं है।
नागरिकता सिद्ध करने वाले सुनिश्चित प्रमाण पत्र का अभाव समस्या।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर के समय वोटर लिस्ट से बड़ी संख्या में लोगों के नाम काटे जाने और उन्हें कथित तौर पर सरकारी योजनाओं से वंचित करने के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जो कुछ कहा, उससे भ्रम पूरी तौर पर दूर होना कठिन ही है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से नाम कटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं है, क्योंकि चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी ऐसा ही कहा था, लेकिन तब उसने यह भी जोड़ा था कि आयोग मतदाता सूची बनाते या उसे संशोधित करते समय नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है।
उसने ऐसी टिप्पणी इसलिए की थी, क्योंकि चुनाव आयोग को यह देखना होता है कि मतदाता भारतीय नागरिक है या नहीं? उसे यह देखने का अधिकार इसीलिए दिया गया, क्योंकि चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का हक भारतीय नागरिकों को ही मिल सकता है। निःसंदेह चुनाव आयोग के पास यह अधिकार नहीं कि वह किसी की नागरिकता का निर्धारण करे, क्योंकि नागरिकता का निर्धारण तो भारतीय नागरिकता अधिनियम के तहत होता है और इसके अनुसार जन्म, वंश, भारत में लंबे समय से रहने आदि के आधार पर नागरिकता तय होती है।
समस्या यह है कि अपने देश में नागरिकता सिद्ध करने वाला कोई सुनिश्चित प्रमाण पत्र नहीं है। इसीलिए पिछले दिनों जब यह बात सामने आई कि पासपोर्ट यात्रा का दस्तावेज मात्र है, नागरिकता का प्रमाण नहीं, तब भी यह बहस उठी थी कि आखिर किसी की नागरिकता का निर्धारण किस प्रमाण पत्र से होगा? इस प्रश्न का कोई सीधा-सरल उत्तर तब तक नहीं मिल सकता, जब तक लोगों को नागरिकता सिद्ध करने वाला कोई प्रमाण पत्र नहीं दिया जाता।
ध्यान रहे कि आधार, ड्राइविंग लाइसेंस के साथ पैन, राशन कार्ड आदि भी नागरिकता के दस्तावेज नहीं हैं। मतदाता पहचान पत्र भी नागरिकता का प्रमाणन नहीं करता। चुनाव आयोग की एसआइआर प्रक्रिया इसीलिए जटिल है, क्योंकि लोगों के पास ऐसे दस्तावेज बहुत कम हैं, जिनसे उनकी नागरिकता का आसानी से प्रमाणन हो जाए। अपने देश की एक अन्य समस्या यह है कि यदि कोई राशन कार्ड, आधार आदि बनवा ले तो फिर वह हर तरह के दस्तावेज हासिल कर सकता है- मतदाता पहचान पत्र से लेकर पासपोर्ट तक।
यह किसी से छिपा नहीं कि तमाम बांग्लादेशी घुसपैठियों ने ऐसा कर रखा है। यदि यह समझा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के यह कहने से समस्या का समाधान हो जाएगा कि चुनाव आयोग किसी की नागरिकता तय नहीं कर सकता तो यह सही नहीं। ऐसी किसी टिप्पणी से एसआइआर की प्रक्रिया भी आसान नहीं होने वाली, क्योंकि चुनाव आयोग को तो यह सुनिश्चित करना ही होगा कि मतदाता भारतीय नागरिक हो।












