विचार: अतिवाद की हदों को पार करता स्त्रीवाद
याद रखें कि कोई पुरुष या स्त्री अकेली नहीं होती, उसके परिवार में स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं। किसी हत्या को वैधता प्रदान करना और उसे सेलिब्रेट करना बताता है कि हम कितना अनैतिक हो गए हैं।
HighLights
कई महिलाएं अतिवादी स्त्रीवाद की धारणाओं से असहमत हैं।
पुरुषों को शिकारी दिखाना और पारंपरिक भूमिकाओं की निंदा गलत।
सिया-केतन मामले में हत्या को सही ठहराना अनैतिक और खतरनाक।
क्षमा शर्मा। हाल में अमेरिका में हुए कुछ सर्वे और रिपोर्ट पढ़ी। उनमें बताया गया है कि वहां अधिकांश स्त्रियां पुरुषों से बराबरी चाहती हैं। समान वेतन और समान सुविधाओं को पसंद करती हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश खुद को फेमिनिस्ट या स्त्रीवादी नहीं कहलाना चाहतीं। बहुत से पुरुष भी स्त्रियों के अधिकारों के प्रबल समर्थक हैं, पर वे इस शब्द से परहेज करते हैं। आखिर इसका कारण क्या है? स्त्रियों का कहना है कि स्त्रीवाद ने शुरुआत में जो अधिकार मांगे थे, जैसे शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य आदि वे कमोबेश पूरे हो चुके हैं। जहां नहीं हुए हैं, वहां इन पर सोचा जा रहा है। इसलिए अब पुराने रागों का अलाप बंद होना चाहिए। वे फेमिनिज्म के अतिवादी रूप (रेडिकल फेमिनिज्म) से परेशान हैं। उनका कहना है कि हमेशा पुरुषों को शिकारी और अपने को शिकार दिखाना गलत अवधारणा है। पुरुष अच्छे भी हो सकते हैं और स्त्रियां बुरी भी हो सकती हैं। वे यह भी कहती हैं कि किसी दफ्तर में अधिकारी बनकर घंटों काम करने और दफ्तर की परेशानियों को झेलने से उनका जीवन आसान नहीं, बहुत कठिन हुआ है।
यही नहीं, फेमिनिज्म द्वारा स्त्री की हर पुरानी भूमिका की आलोचना की जाती है, जैसे खाना बनाने, बच्चे पालने, घर की देखभाल करने आदि को पिछड़ापन और शोषण का कारक बताया जाता है। यह सोच उन स्त्रियों को छोटा करता है, उनका अपमान करता है, जो इन भूमिकाओं में रहना चाहती हैं। इन स्त्रियों का कहना है कि यदि वे अपनी मर्जी से ये सब करना चाहती हैं तो कोई और उनका मजाक कैसे उड़ा सकता है? उन्हें मुख्यधारा से कटा हुआ कैसे कह सकता है? यह भी सच है कि नौकरीपेशा स्त्रियां एक तरह से खुद को सैंडविच की तरह से महसूस करती हैं, क्योंकि उन्हें घर भी देखना होता है और दफ्तर में भी काम करना होता है। स्त्रियों का कहना यह भी है कि मेनस्ट्रीम फेमिनिस्ट स्त्रियों को हमेशा कमजोर साबित करती रहती हैं, जबकि उन्हें स्त्रियों की तरह-तरह की भूमिकाओं, उन्हें निभाने की उनकी ताकत और उनकी क्षमताओं पर बात करनी चाहिए। यही नहीं, पुरुषों को हमेशा नकारात्मक रूप में पेश करना भी समाज की कोई भलाई नहीं करता, क्योंकि अधिकांश पुरुष भी परिवार के लिए नौकरी या अच्छे काम करते हैं। उनकी इन भूमिकाओं की सराहना आखिर क्यों नहीं की जानी चाहिए?
अमेरिका में चलने वाले ट्रेडिशनल वाइफ मूवमेंट में शामिल स्त्रियां यह तक कहती हैं कि यदि वे अपने पति के लिए खाना बनाती हैं, बच्चों की देखभाल करती हैं तो यह उनका चुनाव है, पसंद है। दूसरी महिला इस पर सवाल उठाने वाली कौन होती है। इन बातों को पढ़ते हुए यही लगा कि कोई भी विमर्श शुरुआत में सहानुभूति से शुरू होता है। फिर धीरे-धीरे उसे ताकत प्राप्त होती है। मीडिया, जनता और सरकारों का समर्थन मिलता है तो फिर वह गुर्राने लगता है। सबसे सवाल पूछने और असहमत होने का अधिकार तो मांगता है, मगर यह नहीं देखना चाहता कि कोई उससे असहमत हो। इन दिनों अपने देश में चल रहे कई विमर्शों की यही सच्चाई है। आप जैसे ही उनसे असहमत होते हैं, सवाल पूछते हैं तो फौरन तरह-तरह के अपशब्दों के साथ आप पर हमला बोल देते हैं।
यह एक तानाशाहीपूर्ण रवैया है, क्योंकि तानाशाहियों में ही सवाल पूछना मना होता है। यदि कोई विमर्श सवालों से बचने लगे, सवाल पूछने वालों पर ही आक्रमण करने लगे, गाली-गलौज की भाषा का इस्तेमाल करने लगे तो माना जाना चाहिए कि उसका अंत करीब है। यों भी इतिहास से अब तक देखें तो किसी भी विचार-विमर्श की उम्र 70-100 साल से अधिक नहीं होती, क्योंकि कोई भी विचार और विमर्श अपना प्रतिपक्ष साथ लेकर आता है। जिस अमेरिका और यूरोप से स्त्रीवादी विचार चला था, वहां ही अब इस पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ट्रंप प्रशासन भी अतिवादी स्त्रीवाद का बड़ा आलोचक है। ट्रंप का कहना है कि रेडिकल फेमिनिज्म और एलजीबीटीक्यू की अमेरिका में कोई जगह नहीं है। सभी को एक साथ लेकर चलने की जरूरत है और थर्ड जेंडर जैसी चीज कोई नहीं होती। अमेरिका को बचाना है तो परिवार चाहिए। हालांकि वहां की स्त्रीवादी ट्रंप के विचार से सहमत नहीं हैं और उन्हें मिसोजोनिस्ट कहती हैं।
अपने देश में भी स्त्रीवादी विचार की अति अगर देखनी हो तो हाल में हुए सिया-केतन मामले में देखी जानी चाहिए। महिलाओं के एक वर्ग ने इंटरनेट मीडिया में जोर-शोर से कहा कि ऐसे पुरुषों को यही सजा मिलनी चाहिए। एनसीआरबी के आंकड़े दिखा कहने लगीं कि बड़ी संख्या में पुरुष स्त्रियों को मारते रहे हैं। ऐसे में यदि किसी स्त्री ने पुरुष को मार दिया तो क्या गलत किया। वे अपने साथ हुए अपराधों का बदला ले रही हैं। ऐसी स्त्रीवादियों से कहना चाहूंगी कि चाहे कोई स्त्री मरे या पुरुष, किसी की भी हत्या हो, वह दुखद है। यदि आप जीवन दे नहीं सकतीं तो लेने का क्या अधिकार। किसी को भी किसी की हत्या का अधिकार नहीं है। किसी भी तरह उसे वैध नहीं ठहराया जा सकता है। आखिर केतन की हत्या से पुरुष और स्त्रियां सभी परेशान हुए। याद रखें कि कोई पुरुष या स्त्री अकेली नहीं होती, उसके परिवार में स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं। किसी हत्या को वैधता प्रदान करना और उसे सेलिब्रेट करना बताता है कि हम कितना अनैतिक हो गए हैं।
(लेखिका साहित्यकार हैं)












