राजीव सचान। इस उक्ति से सभी परिचित हैं कि न्याय केवल होना ही नहीं, बल्कि दिखना भी चाहिए। दुर्भाग्य है कि अपने देश में न्याय न होते दिखने के उदाहरण बढ़ते चले जा रहे हैं। ताजा उदाहरण है रोंगटे खड़े कर देने वाले श्रद्धा वाकर हत्याकांड के अभियुक्त आफताब अमीन पूनावाला को राहत देने का। यह सनसनीखेज मामला सभी की स्मृति में होगा कि आफताब ने अपनी प्रेमिका और लिव इन पार्टनर श्रद्धा को मुंबई से दिल्ली लाकर मार डाला था। उसने श्रद्धा की हत्या करने के बाद उसके शव के 35 टुकड़े किए। फिर उन्हें काट-काट कर फ्रिज में रखा। इसके बाद एक-एक कर उन्हें जंगल में फेंक दिया।

कई महीनों बाद जब यह मामला उजागर हुआ तो देश सन्न रह गया। यह घटना मई 2022 की है। चूंकि घटना बहुत ही जघन्य थी, इसलिए यह मानकर चला जा रहा था कि इस मामले में न्याय का पहिया द्रुत गति से घूमेगा, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। पिछले दिनों दिल्ली की एक अदालत में आफताब के ट्रायल की सुनवाई इसलिए टाल दी, क्योंकि उसे एमए समाजशास्त्र की परीक्षा देनी है।

पहली नजर में यह लग सकता है कि एक दिन के लिए सुनवाई टलना कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन यह इसलिए बड़ी बात है कि जब पिछली तिथि में यह तय हो रहा था कि ट्रायल की शुरुआत 20 जुलाई से होगी, तब उस समय आफताब के वकील ने अदालत को यह नहीं बताया कि इस दिन तो उसे परीक्षा देनी है? यह बात बाद में बताई गई और न्यायाधीश ने उदारता दिखाते हुए सुनवाई टाल दी। यह पहली बार नहीं हुआ। इसके पहले एक बार आफताब के मामले की सुनवाई इसलिए टाली गई थी, क्योंकि उसे डेंटिस्ट को दिखाना था। इसी तरह एक बार सुनवाई इसलिए टली थी, क्योंकि उसे मनोचिकित्सक से मिलना था।

किसी मामले की सुनवाई टालने के लिए रसूखदार अभियुक्त या उसके परिवार वाले और वकील जैसे तौर-तरीके अपनाते हैं, उनसे हर कोई परिचित है। प्रश्न यहां किसी मामले की सुनवाई टल जाने का नहीं, बल्कि इसका है कि क्या किसी हत्याकांड के अभियुक्त को समय रहते दंड देना आवश्यक है अथवा उसकी परीक्षा की चिंता करना? यह सही है कि न्याय का तकाजा यह कहता है कि जब तक कोई दोषी न सिद्ध हो जाए, तब तक उसे निर्दोष माना जाए, लेकिन क्या आफताब जैसे हत्यारे के मामले में भी न्याय के इस सिद्धांत पर उदारता से अमल होगा? यह कोई पहला ऐसा प्रकरण नहीं, जो तारीख पर तारीख के सिलसिले को रेखांकित करता हो। इस तरह के असंख्य मामले हैं। आम तौर पर मामलों की सुनवाई में देरी इसीलिए होती है, क्योंकि अभियुक्त और उनके वकील ऐसे तौर-तरीके अपने में सफल रहते हैं, जिनसे उनके मामले की सुनवाई येन-केन-प्रकारेण टलती रहे।

यह उक्ति भी सभी ने सुनी होगी कि न्याय के समक्ष सभी एक समान हैं, लेकिन दुर्भाग्य से अपने देश में यह भी सच नहीं है और इसका उदाहरण है केरल की कैंसरग्रस्त उस महिला का मामला, जिसने कैंसर की महंगी दवाएं सस्ते में उपलब्ध कराने के लिए केरल हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस मामले की सुनवाई 57 बार स्थगित हुई। इसे आठ अलग-अलग न्यायाधीशों के समक्ष प्रस्तुत किया गया था। तारीख पर तारीख का सिलसिला कायम रहा और अंततः उक्त महिला की मौत हो गई। गनीमत रही तो यह कि केरल हाई कोर्ट महिला की मौत के बाद भी इस प्रकरण की सुनवाई जारी रखने के लिए तैयार है। बीते दिनों केरल का यह मामला तब चर्चा में आया, जब दवाओं और उपचार तक आसान पहुंच के लिए कार्यरत एक संगठन ने न्यायिक कार्यवाही में हो रही देरी को लेकर केरल हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश समेत सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश और राष्ट्रपति को एक पत्र लिखा।

यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि किस तरह सुप्रीम कोर्ट ने आतंकी याकूब मेमन के मामले को आधी रात में सुना था और तीस्ता सीतलवाड़ को रात नौ बजे जमानत दी थी। रसूखदार लोगों के ऐसे कुछ और भी उदाहरण रहे हैं, जब उनके मामले को आनन-फानन सुना गया। ऐसा इसलिए भी हुआ, क्योंकि इन मामलों की पैरवी भी प्रभावशाली वकील कर रहे थे।

यह बार-बार सुनने को मिलता है कि जमानत नियम है और जेल अपवाद, लेकिन इस सिद्धांत का भी मनचाहा उपयोग हो रहा है और कई बार संगीन अपराधों में लिप्त अभियुक्तों को भी जमानत दे दी जाती है। पिछले दिनों ही तेलंगाना के रंगारेड्डी जिले में एक नाबालिग से दुष्कर्म के आरोपित को जमानत दे दी गई। जेल से बाहर आते ही उसने पहले इस नाबालिग लड़की, उसकी मां और नानी को मारा, फिर अपनी पत्नी और दो बच्चों को। बाद में वह भी मरा हुआ पाया गया।

अभी गत दिनों दिल्ली के भीषण दंगों के दौरान आइबी कर्मी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में आम आदमी पार्टी के जिस पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को दोषी ठहराया गया, उसे सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा चुनाव लड़ने की ही नहीं, प्रचार के लिए भी जेल से बाहर आने की अनुमति दे दी थी। उसे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया था। वह छह दिन तक पुलिस की निगरानी में चुनाव प्रचार करता रहा। ऐसी न्यायिक उदारता न तो न्यायतंत्र का मान बढ़ाती है और न ही न्यायपालिका के प्रति आम आदमी के भरोसे को बल देती है। हर चीज की अति बुरी होती है-वह चाहे न्यायिक सक्रियता हो या फिर न्यायिक उदारता। इस सक्रियता और उदारता के साथ न्यायिक निष्क्रियता कोढ़ में खाज का ही काम कर रही है।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)