गत दिवस केंद्रीय कैबिनेट ने जो अनेक फैसले लिए, उनमें अधिकांश के केंद्र में देश की आर्थिक स्थिति को बल प्रदान करना रहा। ये फैसले यही अधिक रेखांकित करते हैं कि सरकार यह चाहती है कि आयात घटे और मैन्यूफैक्चरिंग बढ़े ताकि निर्यात बढ़े। सरकार ऐसे प्रयत्न पहले भी करती रही है। इसका प्रमाण है उसकी ओर से मेक इन इंडिया के साथ देश को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान शुरू करना और साथ ही स्वदेशी के मंत्र को दोहराना। इन अभियानों को जोर-शोर से शुरू करने और कारोबारियों को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक उपाय करने के बाद भी बात पूरी तरह बन नहीं रही है।

देश को अनेक ऐसे उत्पादों का आयात करना पड़ रहा है, जिनका उत्पादन देश में आसानी से किया जा सकता है। तथ्य यह भी है कि भारतीय उत्पादों का निर्यात अपेक्षा के अनुरूप नहीं बढ़ पा रहा है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि देश के वे कारोबारी भी आयात पर निर्भरता कम करने वाले तौर-तरीके अपनाने और विश्वस्तरीय गुणवत्ता वाले उत्पादों का निर्माण करने के लिए आगे नहीं आ रहे हैं, जिनके पास पूंजी और संसाधनों की कमी नहीं।

समझना कठिन है कि हमारे बड़े कारोबारी भी शोध एवं नवाचार पर अपेक्षित निवेश करने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं? उचित यह होगा कि सरकार इसके कारणों की तह तक जाए, क्योंकि आयात कम करना और निर्यात बढ़ाना तब तक संभव नहीं, जब तक हमारे कारोबारी अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं करते।

भारतीय कारोबारी बहुत कम ऐसे उत्पाद बनाते हैं, जिनकी विश्व में मांग, पहचान और प्रतिष्ठा हो। यदि वे विश्वस्तरीय सेवाएं दे सकते हैं तो विश्व स्तर की गुणवत्ता वाले उत्पाद क्यों नहीं बना पा रहे हैं? यह ध्यान रखा जाए कि भारतीय उत्पाद विश्व में तभी अपना स्थान बना सकते हैं, जब उनकी गुणवत्ता बढ़ेगी।

आज यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि समृद्ध होता भारतीय मध्य वर्ग कम गुणवत्ता वाले उत्पाद इस कारण खरीदने के लिए तैयार हो जाएगा, क्योंकि वे स्वदेश में निर्मित हैं। जब उन्हें उसी मूल्य पर विदेशी उत्पाद आसानी से उपलब्ध हैं तो फिर वे गुणवत्ता से समझौता क्यों करें? निःसंदेह यह भी ठीक नहीं कि भारत जिस तैयार माल का निर्यात बढ़ा रहा है, उसे बनाने के लिए कई आवश्यक कल-पुर्जे बाहर और विशेष रूप से चीन से आयात किए जाते हैं।

इनमें इलेक्ट्रानिक्स वस्तुओं के साथ दवाएं और इंजीनियरिंग सामान भी शामिल है। यह चिंताजनक है कि तमाम जतन के बाद भी चीन से आयात पर निर्भरता खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। यदि भारत को निर्यात बढ़ाना है तो कपड़ा, रत्न-आभूषण और रसायनों जैसे परंपरागत उत्पादों के साथ-साथ इलेक्ट्रानिक्स सामग्री के निर्माण पर भी ध्यान देना होगा।