विचार: बंगाल में पंथनिरपेक्षता की वापसी
तसलीमा की कोलकाता यात्रा को सुगम बनाकर शुभेंदु अधिकारी सरकार ने पूर्ववर्ती सरकारों की खोखली पंथनिरपेक्षता की पोल खोल दी।
HighLights
तसलीमा नसरीन दो दशक बाद कोलकाता लौटीं।
शुभेंदु अधिकारी सरकार ने वापसी को संभव बनाया।
यह वापसी सच्ची पंथनिरपेक्षता का प्रतीक है।
कृपाशंकर चौबे। बांग्लादेश की बहुचर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन का एक साहित्य समारोह में शामिल होने के लिए अगस्त की शुरुआत में कोलकाता जाना एक शुभ संकेत है। बंगाल की पूर्ववर्ती सरकारों ने कट्टरपंथियों के दबाव में दो दशकों तक तसलीमा को कोलकाता आने की अनुमति नहीं दी। तसलीमा की कोलकाता यात्रा को सुगम बनाकर शुभेंदु अधिकारी सरकार ने पूर्ववर्ती सरकारों की खोखली पंथनिरपेक्षता की पोल खोल दी।
तसलीमा को कोलकाता आने की अनुमति दिया जाना कट्टरपंथियों के लिए कड़ा संदेश है। तसलीमा को मजहबी कट्टरपंथ और पुरुष प्रभुत्व का विरोध करने की कीमत दो दशकों से बंगाल के बाहर रहने के रूप में चुकानी पड़ रही थी। अपने देश से तो वे 32 वर्षों से निर्वासित हैं। निर्वासित जीवन के दौरान उन्हें कई बार अपनी पुस्तकों पर प्रतिबंध और मौत के फतवों का सामना करना पड़ा।
बांग्लादेश से निर्वासित होने के पहले तसलीमा वहां अधिकारों से वंचित महिलाओं के पक्ष में लगातार कलम चलाती रहीं। इस पर कट्टरपंथियों ने कहा कि तसलीमा बांग्लादेश की महिलाओं को पथभ्रष्ट कर रही हैं। 1992 में ढाका पुस्तक मेले में उनकी पुस्तकें जलाई गईं। उन पर पथराव हुआ। पुस्तक मेले की आयोजक बांग्ला अकादमी ने उन्हें चेताया कि वे ढाका मेडिकल कालेज में चिकित्सक की सेवा या लेखन में किसी एक का चयन कर लें। तसलीमा ने लेखन का चुनाव किया।
तसलीमा की विख्यात पुस्तक 'लज्जा' ने उनके विरोध में बांग्लादेश के कट्टरपंथियों के अभियान को और तेज कर दिया। इस पुस्तक में उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं पर होने वाले नृशंस अत्याचार का वर्णन किया है। उनके सिर पर पहले 50 हजार और फिर एक लाख टका का इनाम घोषित किया गया। कट्टरपंथियों के दबाव में आकर बांग्लादेश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी के लिए गैर-जमानती वारंट जारी किया।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने बांग्लादेश पर दबाव बनाया, तब जाकर वहां की सरकार ने 1994 में तसलीमा को सुरक्षित स्वीडन जाने दिया। तभी से तसलीमा अपने देश से निर्वासित हैं। निर्वासित जीवन के आरंभिक वर्षों में तसलीमा का अधिकतर समय स्वीडन और फ्रांस में बीता। देश से निर्वासित होने के बाद उनके कोलकाता आने का सुयोग बीच-बीच में बनता रहा। 2004 से तो वे प्रायः भारत में ही रह रही हैं। कोलकाता में उन्होंने एक फ्लैट ले लिया था, जहां 2004 से 21 नवंबर 2007 तक वे रहीं। कोलकाता में रहते हुए वे अपनी जड़ों से जुड़े रहने का बोध करती थीं।
तसलीमा के अनुसार पश्चिम बंगाल एक अर्थ में बांग्लादेश का मौसेरा भाई है। अपने भाषाभाषी समाज में आकर उन्हें एक तरह से घर में रहने जैसा लगता है। कोलकाता से वे 9 अगस्त, 2007 को हैदराबाद प्रेस क्लब में आयोजित अपने उपन्यास 'शोध' के तेलुगू अनुवाद के लोकार्पण समारोह में गईं तो कट्टरपंथियों ने वहां उन पर जानलेवा हमला किया।
उसके कुछ माह बाद कोलकाता में कट्टरपंथियों ने 21 नवंबर, 2007 को तसलीमा को भारत से निकालने की मांग करते हुए हिंसक प्रदर्शन किया तो खुद के पंथनिरपेक्षता का रक्षक होने का दावा करने वाली बंगाल की तत्कालीन वामपंथी सरकार ने कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेकते हुए तसलीमा को राज्य से बाहर कर दिया।
इसके पहले इसी सरकार ने तसलीमा की आत्मकथा के तीसरे खंड 'द्विखंडित' पर रोक लगाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात किया था। 22 नवंबर, 2007 को तसलीमा कोलकाता से जबरन जयपुर ले जाई गईं और वहां से दिल्ली। वाम मोर्चा के बाद सत्ता में आई और खुद को पंथनिरपेक्षता का चैंपियन कहने का दंभ भरने वाली ममता सरकार ने भी तसलीमा को कोलकाता आने नहीं दिया।
यह तब हुआ, जब बंगाल की विभिन्न संस्थाओं ने तसलीमा को कोलकाता आने के लिए आमंत्रित किया, किंतु वाम मोर्चा और तृणमूल सरकार ने उन्हें कोलकाता आने की अनुमति दी। इसका कारण कट्टरपंथियों के वोटों की चिंता करना था। इस चिंता के चलते ही वाम दलों और तृणमूल नेताओं ने उनके समक्ष झुकना पसंद किया।
करीब दो दशक बाद तसलीमा की कोलकाता वापसी उनका न्यूनतम प्राप्य है। एक तरह से बंगाल में उनके संग सच्ची पंथनिरपेक्षता की वापसी हो रही है और साथ ही फर्जी सेक्युलरिज्म की पोल खुल रही है। तसलीमा की रचनाओं में सर्वत्र मजहबी कट्टरता और स्त्री-पुरुष विषमता के प्रति प्रतिरोध है। वे प्रतिरोध की नायिका हैं। नास्तिक और बेबाक तसलीमा ने दृढ़तापूर्वक जताया है कि वे मौत के फतवों, अपनी किताबों पर प्रतिबंध और निर्वासन का दंड सह सकती हैं, किंतु कट्टरपंथ के समझ नहीं झुक सकतीं।
तसलीमा की एक पुस्तक का शीर्षक है-नारी का कोई देश नहीं। यहां देश का आशय जगह है। यह शीर्षक स्वयं में एक चीख है। निर्वासित जीवन में निःसंगता उनके लिए एक कठोर, भयावह और भोगा हुआ यथार्थ है। उनकी एक अन्य पुस्तक का शीर्षक है-दुखियारी लड़की। यह शीर्षक उनके स्वयं के लिए है। उनकी एक अन्य पुस्तक का शीर्षक है-निर्वासन। यह एक स्त्री की दिल दहला देने वाली कहानी है, जो बांग्लादेश से निर्वासित होने के अलावा उस कोलकाता से भी बाहर की जाती है, जहां रहने के लिए वह व्याकुल है। आशा है कि अब उनकी व्याकुलता खत्म होगी।
(लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में प्रोफेसर हैं)












