अवधेश कुमार। यदि पांच राज्यों-पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरलम, असम और पुडुचेरी के चुनाव परिणामों को समग्र रूप में देखा जाए, तो एक व्यापक तस्वीर उभरती है। इस तस्वीर में दो घटनाएं विशेष रूप से ऐतिहासिक प्रतीत होती हैं-बंगाल में भाजपा की उल्लेखनीय बढ़त और तमिलनाडु में थलापति विजय की पार्टी टीवीके का प्रभावशाली प्रदर्शन। हालांकि असम में भाजपा की लगातार तीसरी जीत भी महत्वपूर्ण है, लेकिन बंगाल और तमिलनाडु की घटनाएं राजनीतिक दृष्टि से अधिक दूरगामी प्रभाव वाली हैं। बंगाल में एक बड़े मुस्लिम मतदाता वर्ग के तृणमूल कांग्रेस के संगठित समर्थन के बावजूद भाजपा की बढ़त सामान्य घटना नहीं।

वैसे तो असम में भी उल्लेखनीय मुस्लिम आबादी के बावजूद भाजपा की जीत ने कई स्थापित राजनीतिक मिथकों को तोड़ा है, पर असम और बंगाल की राजनीति के स्वरूप और सत्ता संरचना में मौलिक अंतर है। बंगाल में ममता बनर्जी ने जिस प्रकार का राजनीतिक माहौल और सत्ता संरचना विकसित की थी, उसमें किसी अन्य दल के लिए प्रभावी चुनौती पेश करना कठिन था। ऐसे में भाजपा की यह सफलता केवल चुनावी उपलब्धि नहीं, बल्कि एक बड़े परिवर्तन का संकेत है कि बंगाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।

पिछले एक दशक से चुनावी रुझानों का यह एक प्रमुख पहलू लगभग हर राज्य में दिखाई देता है कि हिंदुत्व, संस्कृति और धार्मिक पहचान के प्रति हिंदुओं के एक व्यापक पुनर्जागरण ने एक स्थायी मतदाता आधार का निर्माण किया है। यह आधार ऐसा है, जो संतुष्टि, असंतोष या आंशिक नाराजगी के बावजूद किसी न किसी रूप में भाजपा या उसके सहयोगी दलों के पक्ष में झुकाव बनाए रखता है और कई बार उसकी अनुपस्थिति में वैचारिक रूप से निकट दलों की ओर भी स्थानांतरित हो जाता है।

यह प्रवृत्ति पांचों राज्यों के चुनावों में भी देखने को मिली। भाजपा स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों को उठाने के साथ-साथ चुनावी विमर्श को राष्ट्रीय विषयों से जोड़ने की रणनीति अपनाती रही है। इससे मतदाताओं के साथ उसका सीधा भावनात्मक और वैचारिक संवाद स्थापित होता है। भाजपा ने बंगाल और असम में राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसांख्यिकीय संतुलन जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उभारा, जो चुनावी एजेंडे के केंद्र में रहे। मोदी सरकार द्वारा महिलाओं के सशक्तीकरण से जुड़े कार्यक्रमों ने भी चुनावी माहौल को प्रभावित किया। इन्होंने महिला मतदाताओं के बीच एक सकारात्मक संदेश देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वास्तव में बंगाल के परिणाम ने केवल उन्हें ही चौंकाया है, जो जमीनी सच्चाई के साथ मतदाताओं और विशेष रूप से हिंदुओं के बड़े वर्ग के अंदर बदलाव की छटपटाहट को महसूस नहीं कर रहे थे। तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल की सत्ता और पूरी राजनीति को निहित स्वार्थी तत्वों के हाथों में सौंप दिया था। इससे कट्टरपंथी तत्वों को मिले प्रत्यक्ष-परोक्ष संरक्षण और प्रोत्साहन के कारण पूरे प्रदेश में सांप्रदायिक भय और तनाव की स्थिति में कायम हो गई थी। वे कहने लगे थे कि मतदाता अपनी इच्छा से नहीं, तृणमूल कांग्रेस के नेताओं की चाहत से मतदान करें या घर बैठें, अन्यथा हिंसा, दमन, उत्पीड़न और पलायन का दंश झेलें।

'साइलेंट रिगिंग' बंगाल की मुख्य चुनावी प्रवृत्ति रही है। पहले इसी रास्ते वाम मोर्चा ने लगातार जीत सुनिश्चित की और फिर ममता ने भी अपनी पूरी पार्टी को उससे ज्यादा हिंसक और दमनकारी तत्वों में परिणत कर दिया। पलायन या हिंसा की सर्वाधिक शिकार महिलाएं होती हैं। इसी कारण इनका बहुत बड़ा मत तृणमूल के बजाय भाजपा को गया। जो लोग भाजपा पर हिंदुओं के ध्रुवीकरण का आरोप लगा रहे हैं, वे सतही विश्लेषण कर रहे हैं। वास्तव में बंगाल में राजनीतिक संघर्ष वास्तविक लोकतंत्र की पुनर्स्थापना तथा सत्ता संस्कृति को सर्वसमावेशी बनाने का था। यह जिम्मेदारी मुख्यत: प्रदेश के हिंदुओं को ही लेनी थी। हिंदुओं के अंदर अगर यह भाव पैदा हुआ कि इस सरकार के रहते हमारा अस्तित्व संकट में है, तो इसके कारण अत्यंत गहरे हैं।

बांग्लादेश की हिंसक घटनाओं ने हिंदुओं के इस मनोविज्ञान को सशक्त किया कि हमें कुछ हद तक जान की बाजी लगानी होगी। इसके अलावा एसआइआर में मृत, संदिग्ध और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने के कारण फर्जी मतदाताओं का खेल खत्म हो गया। सवा दो लाख केंद्रीय बलों की उपस्थिति, चुनाव के बाद भी सुरक्षा बलों के बने रहने की घोषणा, दूसरे राज्यों के अधिकारियों की चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में नियुक्ति, प्रदेश के अधिकारियों का व्यापक पैमाने पर स्थानांतरण या चुनाव प्रक्रिया तक कार्य मुक्ति तथा चुनावी हिंसा वाले चिह्नित व्यक्तित्वों के विरुद्ध कार्रवाई एवं सतर्क दृष्टि आदि ने भय और संशयग्रस्त मतदाताओं के अंदर सुरक्षा को लेकर आश्वस्त किया, जिससे चुनावी माहौल में बड़ा परिवर्तन आया। भाजपा ने प्रधानमंत्री मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में मतदाताओं को पहले दिन से यह विश्वास दिलाने की रणनीति अपनाई कि हम सत्ता में आ रहे हैं तथा किसी के साथ अन्याय हुआ तो पूरी पार्टी खड़ी रहेगी। इन सबके कारण ही बंगाल में यह असंभव-सा लगने वाला सत्ता परिवर्तन हुआ है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)