डॉ. अर्जुन सुब्रमण्यम। रूस-यूक्रेन युद्ध के खत्म होने के कोई संकेत नहीं दिखने और पश्चिम एशिया के 'न युद्ध-न शांति' के दलदल में फंसे होने के बावजूद हाल के समय के दूसरे संघर्षों के मुकाबले आपरेशन सिंदूर को एक मानक अभियान के तौर पर देखना महत्वपूर्ण है। इस आपरेशन की सबसे खास बात थी-सैन्य ताकत का तीव्र और नियंत्रित तरीके से निर्णायक इस्तेमाल, ताकि संघर्ष-विस्तार में रहते हुए ऐसे रणनीतिक नतीजे हासिल किए जा सकें, जो सरकार के राजनीतिक लक्ष्यों के अनुरूप हों। इसका उद्देश्य था, पाकिस्तान के भारत-विरोधी आतंकी नेटवर्क के गढ़ पर सीधा हमला करना और अगर पाकिस्तानी सेना जवाब देती है, तो उसे भारी नुकसान पहुंचाना। यह एक जिम्मेदार ताकत द्वारा राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के बार-बार दोहराए जाने वाले कृत्यों को सजा देने के लिए चलाया गया एक सटीक और संयमित प्रतिरोधी अभियान था।

हालांकि भारत ने 2019 में बालाकोट में आतंकरोधी अभियान में आक्रामक हवाई शक्ति के इस्तेमाल का प्रयोग किया था, पर इस बार जैश और लश्कर के मुख्यालयों पर हमले की तत्परता ने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए जोखिम उठाने की नई प्रवृत्ति और संघर्ष बढ़ाने की इच्छाशक्ति को उजागर किया। इसमें यह सोच स्पष्ट थी कि एक व्यापक संघर्ष भारत के हित में नहीं है, भले ही पाकिस्तान को और अधिक नुकसान पहुंचाने का सैन्य प्रलोभन मौजूद हो।

भारत ने आपरेशन सिंदूर के दौरान कोई अतिरिक्त नुकसान नहीं होने दिया और सैन्य श्रेष्ठता के बावजूद पाकिस्तान के युद्धविराम प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। चार दिनों के भीतर ही संघर्ष समाप्त करने से जो सैकड़ों करोड़ रुपये की बचत हुई, उसने पश्चिम एशिया में चल रहे मौजूदा संघर्ष के दौरान भारत की आर्थिक सहनीयता में योगदान दिया। पश्चिम एशिया संघर्ष में अमेरिका के 27 अरब डालर से भी ज्यादा खप चुके हैं और तनाव अभी भी कायम है।

आपरेशन सिंदूर की तैयारी के चरण में केंद्रीकृत नियंत्रण का एक स्पष्ट माडल देखने को मिला। इसके पहले स्तर पर प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और रक्षामंत्री थे, जबकि दूसरे पर सीडीएस और तीनों सैन्यप्रमुख। सेना प्रमुखों और खुफिया एजेंसियों को स्पष्ट और ठोस रणनीतिक परिणाम बताए गए थे। इससे उन्हें व्यावहारिक कार्ययोजना बनाने में मदद मिली।

भले ही हजारों सालों में युद्ध के स्वरूप में कई बदलाव आए हों, लेकिन कौटिल्य, सुन जू, क्लाजविट्ज, लिडेल हार्ट जैसे रणनीतिकारों द्वारा बताए गए युद्ध के अधिकांश मूल सिद्धांत समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं। आपरेशन सिंदूर की सफलता ने प्रतिरोध करने की सीमाओं का विस्तार किया। भारत ऐसा इसलिए कर पाया, क्योंकि इसने समय की कसौटी पर खरे उतरे युद्ध के कुछ सिद्धांतों और संकट के समय फैसले लेने के तरीकों का पालन किया। वायु सेना के इस्तेमाल का फैसला एक साहसी कदम था, जो आज के संघर्षों के बदलते स्वरूप को दिखाता है और जिस पर बारीकी से विश्लेषण करने की जरूरत है। चीन से मिली पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणालियों को चकमा देने और उन्हें जाम करने के बाद भारत ने पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में घुसकर हमला किया।

इस हमले में पाकिस्तान और गुलाम जम्मू-कश्मीर में मौजूद लश्कर, जैश और हिजबुल मुजाहिदीन के 9 आतंकी ठिकाने तबाह हो गए। कुछ ही घंटों के भीतर भारत ने अपने हमले का दायरा और बढ़ाया तथा नूर खान, सियालकोट, सरगोधा, स्कार्दू, भोलारी, जैकोबाबाद एयरबेस जैसे 11 प्रमुख सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। इस कार्रवाई से पाकिस्तान की सामरिक क्षमताओं को गंभीर नुकसान पहुंचा। हवाई हमलों की तीव्रता से यह साफ हुआ कि पाकिस्तान को पहुंची क्षति 1971 के युद्ध में पश्चिमी मोर्चे पर वायुसेना द्वारा पाकिस्तानी वायु सेना के हवाई अड्डों को पहुंचाए गए कुल नुकसान से कहीं ज्यादा था।

ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की एकीकृत हवाई रक्षा प्रणाली की परिपक्वता को भी साबित कर दिया, जो दुश्मन की मिसाइल और ड्रोन-केंद्रित रणनीति का मुकाबला करने में सक्षम है। हालांकि वायुसेना को भविष्य में अधिक शक्तिशाली दुश्मनों के खिलाफ किसी भी सीमित संघर्ष की स्थिति में अपने प्लेटफार्म, हथियारों और प्रणालियों का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने के लिए तेज गति से सीखने की आवश्यकता होगी। भविष्य के युद्ध-क्षेत्रों में लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों से मुकाबले के लिए एकीकरण और तालमेल की जरूरत होगी।

वर्तमान में चल रहे सुधारों और ढांचागत पहलों पर शायद फिर से विचार करना पड़े, ताकि एक ऐसा संगठनात्मक ढांचा तैयार किया जा सके, जो आपरेशन सिंदूर के दौरान सीखे गए अनुभवों पर आधारित हो। हालांकि दुनिया भर में चल रहे संघर्षों से कई रणनीतिक सबक मिलते हैं, लेकिन भारत को दूसरी जगहों से युद्ध-लड़ाई के माडल अपने रणनीतिक और परिचालन वातावरण पर लागू करने के प्रति सावधान रहना चाहिए। मिसाइल और ड्रोन पर ज्यादा जोर देने के समर्थकों को फिर से सोचना चाहिए। भारत के पश्चिमी और उत्तरी मोर्चों पर जैसा हवाई माहौल है, जहां दोनों पक्ष एक-दूसरे को कड़ी टक्कर देते हैं, वहां सिर्फ बहुक्षेत्रीय परिचालन ही सफल होंगे।

(लेखक सेवानिवृत्त एयर वाइस मार्शल हैं)