पश्चिम बंगाल में खुद अपना भी चुनाव हारने के साथ ही बुरी पराजय का सामना करने के बाद ममता बनर्जी का यह कहना राजनीतिक हठधर्मी ही है कि वे मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र नहीं देंगी। ऐसा कहकर वे अपनी अलोकतांत्रिक मानसिकता का परिचय देने के साथ ही अपने उस अराजक राजनीतिक व्यवहार को भी रेखांकित कर रही हैं, जिसके चलते उनकी पार्टी को सत्ता से बाहर होना पड़ा।

वे इसकी जानबूझकर अनदेखी कर रही हैं कि उनके साथ-साथ पराजय का सामना करने वाले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अपनी हार सहजता से स्वीकार कर ली और केरलम के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने तो ऐसा करने के साथ ही अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया। लोकतंत्र में ऐसा ही होना चाहिए, लेकिन ममता बनर्जी एक तरह से बालहठ ही नहीं दिखा रही हैं, बल्कि राजनीतिक अपरिपक्वता का भी परिचय दे रही हैं।

राजनीति का लंबा अनुभव रखने वाली ममता बनर्जी इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकतीं कि यदि वे इस्तीफा नहीं देतीं तो राज्यपाल उन्हें बर्खास्त कर सकते हैं या फिर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश कर सकते हैं। यदि उनके हठ के कारण इसकी नौबत आई तो इससे उनकी फजीहत ही होगी। रह-रहकर संविधान की दुहाई देने वाली ममता बनर्जी जिस तरह इस्तीफा देने से मना कर रही हैं, उसकी मिसाल मिलना कठिन है।

इस्तीफा न देने की जिद करके ममता बनर्जी अपने समर्थकों को यह संदेश देने की नाकाम कोशिश कर रही हैं कि उनके साथ अन्याय हुआ है, लेकिन इस तरह से वे न तो लोगों की सहानुभूति अर्जित कर सकती हैं और न ही अपने खोए हुए जनाधार को वापस पा सकती हैं। उन्हें यह पता होना चाहिए कि लोग सब कुछ तो भूल जाते हैं, लेकिन किसी का अहंकार आसानी से नहीं भूलते।

यदि ममता बनर्जी अपनी खोए हुए जनाधार को फिर से पाना चाहती हैं तो उन्हें जनादेश को विनम्रता से स्वीकार करना चाहिए। उनका तर्क है कि वे हारी नहीं, बल्कि उन्हें हराया गया है। साफ है कि वे यह समझने-मानने को तैयार नहीं कि उनकी पराजय का कारण उनका कुशासन और उसके चलते जनता की उनसे गहरी नाराजगी रही। यह बताने की जरूरत नहीं कि तृणमूल कांग्रेस कोई 10-15 सीटों के अंतर से बहुमत से दूर नहीं रही। वह 294 सीटों वाली विधानसभा में सौ सीटों तक भी नहीं पहुंच सकी।

ममता बनर्जी खुद को हराए जाने का आरोप उछाल कर वही लाइन ले रही हैं, जो राहुल गांधी ने एक लंबे समय से पकड़ रखी है और जिसके तहत चुनाव की चोरी का राग अलापते रहते हैं। गत दिवस उन्होंने यही राग अलापते हुए कहा कि असम और बंगाल में भाजपा ने चुनाव आयोग के समर्थन से चुनाव की चोरी की। प्रश्न यह है कि आखिर केरलम के बारे में उनकी क्या राय है, जहां कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन ने जीत हासिल की है?