विचार: फिर खुली फर्जी सेक्युलरिज्म की पोल
राहुल गांधी ने असम और बंगाल चुनाव परिणामों पर सवाल उठाए, जबकि पहले उन्होंने ममता बनर्जी की आलोचना की थी। लेख 'फर्जी सेक्युलरिज्म' और मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति को भाजपा की जीत व हिंदू ध्रुवीकरण का कारण बताता है, जिससे ममता को नुकसान हुआ।
HighLights
राहुल गांधी ने असम-बंगाल चुनाव नतीजों पर उठाए सवाल।
'फर्जी सेक्युलरिज्म' ने हिंदू ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया।
ममता की हार में भ्रष्टाचार, तुष्टीकरण भी प्रमुख कारण।
राजीव सचान। पांच राज्यों के चुनावों में से राहुल गांधी को असम और बंगाल के चुनाव नतीजे स्वीकार नहीं हैं। उनके शब्दों में, 'असम और पश्चिम बंगाल ऐसे स्पष्ट उदाहरण हैं, जहां भाजपा ने चुनाव आयोग के समर्थन से चुनाव चुराया है। हम ममता बनर्जी से सहमत हैं कि बंगाल में सौ से ज्यादा सीटें चुराई गईं। हमने पहले भी मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और 2024 के लोकसभा चुनाव में यह तरीका देखा है। चुनाव चोरी, संस्था चोरी-अब और चारा ही क्या है।'
आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने केरलम, तमिलनाडु और पुडुचेरी के बारे में ऐसा कुछ नहीं कहा। केरलम के बारे में तो कह भी नहीं सकते थे, क्योंकि यहां कांग्रेस के नेतृत्व वाले मोर्चे ने जीत हासिल की है। चुनाव नतीजों के बाद उन्होंने तमिलनाडु में शानदार जीत हासिल करने वाले टीवीके प्रमुख जोसेफ विजय को बधाई दी तो पराजय का सामना करने वाले स्टालिन से भी बात की।
ज्ञात हो स्टालिन ने चुनाव नतीजों को सहजता से स्वीकार कर लिया है। राहुल गांधी ने ममता बनर्जी से भी बात की और अपनी एक्स पोस्ट में कांग्रेस के उन लोगों को संभलने की सलाह दी, जो टीएमसी की हार पर खुशी मना रहे। यह वही राहुल गांधी हैं, जिन्होंने बंगाल में दूसरे चरण के मतदान के ठीक पहले ममता को निशाने पर लेते हुए कहा था कि बंगाल में किसी को रोजगार चाहिए तो फिर टीएमसी में कोई न कोई रिश्तेदारी होनी चाहिए, नहीं तो फिर काम नहीं मिलने वाला। ममता पूरा का पूरा काम टीएमसी के गुंडों और अपनी पार्टी के लोगों के लिए करती हैं और जनता की कोई भी मदद नहीं करतीं। उन्होंने यह भी कहा था, बंगाल में आज लोकतंत्र नहीं, टीएमसी का गुंडाराज चल रहा है।
आखिर राहुल अपनी ही बातों को इतनी जल्दी कैसे भूल सकते हैं? माना कि नेताओं की याददाश्त कुछ कमजोर होती है, पर कोई 10-12 दिन पहले की अपनी बातों को कैसे भूल सकता है? राहुल ने बंगाल में प्रचार के दौरान ही ममता को लेकर यह भी कहा था कि बंगाल में बढ़ते ध्रुवीकरण की वजह से ही भाजपा को मौका मिला। इससे इन्कार नहीं कि बंगाल में भाजपा की जीत के कई कारणों में से एक मतदाताओं का ध्रुवीकरण भी रहा। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के पर्याप्त कारण हैं कि भाजपा के पक्ष में बड़ी संख्या में हिंदू मतदाता गोलबंद हुए और इसलिए भी उसे बंपर जीत मिली, पर ऐसा केवल इसलिए नहीं हुआ कि भाजपा हिंदुत्व की राजनीति करती है। ऐसा इसलिए भी हुआ, क्योंकि कांग्रेस और तृणमूल सरीखे दल कथित सेक्युलरिज्म के नाम पर मुस्लिम वोटों को गोलबंद करने का काम करते हैं। वास्तव में यह काम खुद को सेक्युलर बताने वाले अधिकतर दल करते हैं। कांग्रेस देश भर में यही करती है और बंगाल में ममता भी यही कर रही थीं और इतना खुलकर कर रही थीं कि वह मुस्लिम तुष्टीकरण में बदल गया।
आम तौर पर मुस्लिम किसी दल के पक्ष में थोक वोट करते हैं और जबसे भाजपा का उभार हुआ है, तबसे वे खास तौर पर उस दल के पक्ष में वोट करते हैं, जो उसे हरा सकने में सक्षम दिखता है। इसके चलते कथित सेक्युलर दल उनकी गोलबंदी में अतिरिक्त परिश्रम करने लगे। वे उनके सामने भाजपा का हौवा खड़ा करते और उनका काम आसान हो जाता। मुस्लिम वोटों की इस गोलबंदी को ध्रुवीकरण के बजाय सेक्युलर राजनीति की संज्ञा दी जाने लगी।
इस फर्जी सेक्युलर राजनीति के चलते एक समय ऐसा आया कि भाजपा विरोधी दलों के लिए मुस्लिम वोट एक तरह के वीटो पावर बन गए। जब भाजपा ने मुस्लिम वोटों को एकजुट करने के जवाब में हिंदू वोटों को गोलबंदी करनी शुरू की तो उसके विरोधियों ने उस पर ध्रुवीकरण की सांप्रदायिक राजनीति करने ठप्पा लगाना शुरू किया। भाजपा ने इस ठप्पे की परवाह न करते हुए सेक्युलरिज्म को छद्म सेक्युलरिज्म की संज्ञा दी और वह उस पर इसलिए बुरी तरह चिपक गया, क्योंकि यही सच था।
निःसंदेह बंगाल में मुस्लिम वोटों के बंटवारे के कारण भी टीएमसी को नुकसान हुआ, लेकिन यदि ममता मुस्लिम समुदाय का इतना खुला तुष्टीकरण नहीं करतीं तो हिंदू भाजपा के पक्ष में खुलकर गोलबंद नहीं होते। ममता केवल इसलिए नहीं हारीं, क्योंकि मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो गया और अधिसंख्य हिंदू वोट भाजपा के खाते में चले गए। वे इसलिए भी हारीं, क्योंकि उनका शासन पक्षपात और उनके नेताओं के भ्रष्टाचार संग उनकी गुंडागर्दी का पर्याय बन गया था। महिला मुख्यमंत्री होने के बाद भी राज्य में महिला असुरक्षा एक प्रमुख मुद्दा बना।
ममता को घुसपैठियों की अनदेखी और मुस्लिमपरस्ती की भी कीमत चुकानी पड़ी। यही कीमत असम में कांग्रेस ने चुकाई। इस पर गौर करें कि असम में एक समय कांग्रेस से मिलकर चुनाव लड़ने वाले बदरुद्दीन अजमल ने कांग्रेस को आज की मुस्लिम लीग बता दिया। पता नहीं उन्होंने ऐसा क्यों कहा, लेकिन अब यह फ्राड बंद होना चाहिए कि मुसलमानों की गोलबंदी तो सेक्युलर राजनीति है और उसके जवाब में हिंदुओं को एकजुट करना सांप्रदायिक राजनीति। मुस्लिम वोटों ने असम और बंगाल में भी अपना वीटो पवार खो दिया और यह मिथ्या धारणा ध्वस्त हो गई कि उनके वोट किसी दल की चुनावी नैया पार लगा सकते हैं, क्योंकि उनका ध्रुवीकरण रिवर्स ध्रुवीकरण करता है।
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)












