जागरण संपादकीय: अपेक्षित और अप्रत्याशित
पांच राज्यों के चुनाव नतीजे इसलिए भाजपा का अतिरिक्त उत्साहवर्धन करने वाले हैं, क्योंकि उसने असम में तीसरी बार कहीं बड़े अंतर से जीत हासिल की।
HighLights
बंगाल में भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को हराया।
तमिलनाडु में टीवीके ने द्रविड़ दलों को बेदखल किया।
भाजपा का पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में विस्तार।
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में से जहां असम, केरलम और केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी के परिणाम अपेक्षा के अनुरूप सिद्ध हुए, वहीं पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के नतीजे अप्रत्याशित रहे। बंगाल और तमिलनाडु के नतीजों ने इसलिए चौंकाया, क्योंकि जहां बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के सत्ता विरोधी माहौल का सामना करने के बाद भी इसकी आशा शायद ही किसी को रही हो कि उसके लिए सौ सीटों तक पहुंचना भी कठिन हो जाएगा और भाजपा दौ सौ सीटों के निकट पहुंच जाएगी, वहीं तमिलनाडु में नए बने दल टीवीके के बारे में कम ही लोगों ने कमजोर सा अनुमान लगाया था कि वह सत्ता के निकट पहुंच जाएगी।
बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन की पराजय यह बताती है कि जो क्षेत्रीय नेता अपनी सत्ता को खुद की निजी जागीर में बदल लेते हैं, उन्हें जनता अधिक समय तक सहन नहीं करती। तमिलनाडु में टीवीके के जोसेफ विजय ने वह कर दिखाया, जो एक समय आंध्र में एनटी रामाराव और दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने किया था-पहली बार में ही बंपर जीत।
विजय की जीत का महत्व इसलिए भी है कि उन्होंने छह दशक बाद द्रविड़ दलों को तमिलनाडु की सत्ता से बाहर कर दिया। बंगाल में भी भाजपा ने कांग्रेस, वाम दलों के लंबे शासन के बाद 15 वर्षों तक शासन करने वाली तृणमूल कांग्रेस को बाहर का दरवाजा दिखा दिया। बंगाल में प्रचंड जीत के साथ ही भाजपा ने पूर्वोत्तर के साथ पूर्वी भारत पर बढ़त हासिल कर ली।
बंगाल में जो राजनीतिक लड़ाई कांटे की मानी जा रही थी, उसमें भाजपा की इतनी बड़ी जीत यह बताती है कि ममता का शासन कुशासन का पर्याय बन गया था और मुस्लिम तुष्टीकरण की उनकी राजनीति एवं बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ की गंभीर समस्या की अनदेखी ने बहुसंख्यक समुदाय को भाजपा के पक्ष में एकजुट करने का काम किया। भाजपा के पूर्व संस्करण जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के गृह राज्य में भाजपा की जीत ने यह भी रेखांकित किया कि उसके विस्तार और बढ़ते प्रभाव का सिलसिला तेज होने वाला है। इस जीत ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ गृहमंत्री अमित शाह के कद को और अधिक बढ़ाने का काम किया है।
2026 की भाजपा वह नहीं, जो 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद निस्तेज दिखने लगी थी और कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल यह प्रतीति कराने लगे कि अब उनका नंबर आएगा। निःसंदेह अब बंगाल में भी डबल इंजन सरकार होगी, लेकिन इसके साथ ही भाजपा के सामने यह चुनौती भी आ खड़ी हुई है कि वह राज्य की जनता से किए गए अपने वादों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करे और इस राज्य को राजनीतिक हिंसा एवं घुसपैठियों से मुक्त करने के साथ फिर से पटरी पर लाए।
पांच राज्यों के चुनाव नतीजे इसलिए भाजपा का अतिरिक्त उत्साहवर्धन करने वाले हैं, क्योंकि उसने असम में तीसरी बार कहीं बड़े अंतर से जीत हासिल की। इसके साथ ही केरलम और तमिलनाडु में भी अपने लिए कुछ जगह बनाई। पुडुचेरी में उसके समर्थन वाली सरकार का फिर से बनना भी कम महत्वपूर्ण नहीं, क्योंकि वह असम के साथ यहां भी सत्ता विरोधी माहौल को दरकिनार करने में सफल रही।
ऐसा न तो बंगाल में ममता कर सकीं, न केरलम में विजयन और न ही तमिलनाडु में स्टालिन। कांग्रेस इससे प्रसन्न हो सकती है कि केरलम के रूप में एक और राज्य उसके हाथ आ गया, पर असम में वह जिस तरह पराजित हुई और यहां तक कि उसके सबसे प्रमुख नेता गौरव गोगोई भी हार गए, वह उसके लिए गहन आत्मचिंतन का विषय बनना चाहिए। वह भले ही केरलम में अपने सहयोगी दलों के साथ सरकार बनाने जा रही हो, लेकिन पांच राज्यों के नतीजे यही कह रहे हैं कि उसके नेतृत्व वाला गठबंधन आइएनडीआइए और कमजोर हो गया है।












