राजा मुनीब। पहलगाम के नृशंस आतंकी हमले को साल भर बीत गया है और इस हमले के जवाब में आपरेशन सिंदूर का भी एक वर्ष पूरा होने जा रहा है। एनआइए की जांच में यही सामने आया था कि पहलगाम हमले की जड़ें पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी गुटों से जुड़ी थीं और इस हमले में भी वैसे ही तौर-तरीके अपनाए गए, जैसे मुंबई आतंकी हमले और पुलवामा हमले के दौरान आजमाए गए थे। भारत ने पहलगाम आतंकी हमले का जवाब छह-सात मई की रात को आपरेशन सिंदूर से दिया था।

इसका लक्ष्य एकदम स्पष्ट था-भारत को निशाना बनाने वाले आतंकी संगठनों को उनकी करतूतों का सबक सिखाना और यह बताना था कि पाकिस्तान का हर एक आतंकी ढांचा भारत की मारक क्षमता के दायरे में है। आपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने पाकिस्तान का आतंकी चेहरा दुनिया के सामने उजागर करने के लिए कूटनीतिक अभियान के तहत प्रमुख देशों में अपने प्रतिनिधि भेजे थे। हालांकि इस एक वर्ष के बीच वैश्विक परिस्थितियां काफी बदल गई हैं। इसके बावजूद, यह स्पष्ट है कि आतंकवाद की निंदा के मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई खास मतभेद नहीं है।

पहलगाम हमले के बाद जारी बयानों में भी यही झलका था कि नागरिकों को निशाना बनाना पूरी तरह से अस्वीकार्य है, फिर भी यह वैचारिक स्पष्टता उन आतंकी ढांचों के खिलाफ निरंतर कार्रवाई में तब्दील नहीं हो पाई है, जो ऐसे हमलों को बढ़ावा देते हैं। खासतौर से तब यह और अखरता है, जब ऐसे ढांचों का पूरा तंत्र पाकिस्तान में स्पष्टता से दिखाई देता हो और वे कार्रवाई से बचे रह जाएं। पहलगाम आतंकी हमले के सिलसिले में जिन नेटवर्कों की पहचान की गई, वे उसी ढांचे का हिस्सा हैं, जो पाकिस्तानी इलाकों में एक सुसंगठित सहायता तंत्र के दायरे में संचालित होते हैं। इसमें प्रशिक्षण सुविधाएं, वित्तीय सहायता, भर्ती के रास्ते और वैचारिक समर्थन जैसे पहलू शामिल हैं। पिछले कई वर्षों में विभिन्न जांचों में इन तत्वों को बार-बार प्रमाणित किया गया है।

इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं में पाकिस्तान पर इस बात के लिए निरंतर दबाव बनाने को लेकर व्यापक रूप से परहेज ही किया गया है कि वह इन नेटवर्कों को चिह्नित कर उन्हें ध्वस्त करे। ऐसे ढांचों को चिह्नित कर उन पर कार्रवाई के मोर्चे पर अंतर की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है और उसमें एक चिरपरिचित रुझान भी नजर आता है। प्रत्येक बड़े आतंकी हमले के बाद कड़ी कूटनीतिक प्रतिक्रिया सामने आती है। उसके बाद साक्ष्य साझा करने के साथ एकजुटता प्रदर्शित की जाती है। हालांकि, ऐसी प्रतिक्रियाएं किसी स्थायी समाधान का निमित्त नहीं बन पातीं, जिनसे भावी आतंकी हमलों पर अंकुश लग सके। इसका यही परिणाम होता है कि किसी हमले को अंजाम देने के बाद वही आतंकी ढांचे नई पहचान के साथ नए सिरे से फिर सक्रिय हो जाते हैं।

शक्तिशाली देशों के आचरण में आतंकवाद को लेकर विसंगति उनके व्यवहार में भी झलकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पहलगाम हमले की कड़े शब्दों में निंदा की थी, पर अब उनका नजरिया बदला हुआ एवं अस्थिर है। पाकिस्तानी फील्ड मार्शल आसिम मुनीर सहित वहां के नेतृत्व के साथ उनकी हालिया करीबी उसी वैचारिक बदलाव को दर्शाती है, जहां आतंक से निपटने की जवाबदेही तय करने के बजाय निजी हितों को प्राथमिकता दी जाती है। आतंकी नेटवर्कों के साथ पाकिस्तान के पुख्ता संबंधों के बावजूद उसे कूटनीतिक समर्थन देकर अमेरिका अब उन्हीं प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने में लगा है, जिसकी वह खुद निंदा करता आया है। यह रवैया भी किसी एक देश तक ही सीमित नहीं है। तमाम अंतरराष्ट्रीय किरदार ऐसा ही दोहरा रवैया दिखाते हैं। एक ओर तो वे आतंक को वैश्विक खतरे के रूप में मान्यता देते हुए पीड़ितों का समर्थन करते हैं तो दूसरी ओर भू-राजनीतिक पहलुओं को देखते हुए पाकिस्तान पर किसी भी सीधी कार्रवाई से न केवल संकोच करते हैं, बल्कि उस पर दबाव बनाना भी उचित नहीं समझते। इससे आतंक के विरुद्ध वैश्विक मुहिम को झटका लगता है।

आधिकारिक रुख के साथ-साथ मानवाधिकार संगठनों और नीतिगत विश्लेषकों के बीच भी एक समानांतर विमर्श जारी है। हालांकि यह मुख्यत: शासन और दीर्घकालिक स्थिरता जैसे विषयों पर केंद्रित होता है, लेकिन यह अक्सर राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के मुख्य मुद्दे से ध्यान भटका देता है। यह स्थिति विमर्श को न केवल जटिल बनाती है, बल्कि जवाबदेही की मूल समस्या के समाधान में कोई योगदान भी नहीं देती। इस तरह देखा जाए तो पहलगाम हमला आतंकवाद के प्रति वैश्विक प्रतिक्रिया में व्याप्त एक ढांचागत समस्या को दर्शाता है।

हिंसक आतंकी घटनाओं को चिह्नित करने और उनके प्रति एकजुटता प्रदर्शित करने के स्तर पर तो स्पष्टता दिखाई देती है, लेकिन जब उस हिंसा के स्रोत के रूप में पाकिस्तान जैसे देश सामने आते हैं, तब अंतरराष्ट्रीय समुदाय में एक हिचकिचाहट पैदा हो जाती है। यह हिचकिचाहट पाकिस्तान में मौजूद नेटवर्कों को नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने और अपना संचालन जारी रखने का अवसर एवं गुंजाइश प्रदान करती है।

भारत का लंबे अर्से से यही रुख रहा है कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई केवल तात्कालिक प्रतिक्रियाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इसके लिए वित्तीय स्रोतों पर अंकुश, परिचालन संबंधी बुनियादी ढांचे को ध्वस्त करने और वैचारिक समर्थन तंत्र को चुनौती देने वाले समग्र एवं निरंतर प्रयास आवश्यक हैं। आपरेशन सिंदूर की संकल्पना यही थी कि इसमें केवल हमलावरों को उनकी करनी का सबक ही नहीं सिखाना, बल्कि उनकी जड़ों पर प्रहार करना था। अब जब पहलगाम हमले को साल भर बीत गया है, तब आतंक के विरुद्ध वैश्विक सैद्धांतिक रुख भले ही यथावत कायम हो, लेकिन व्यावहारिकता की कसौटी पर वह खरा नहीं उतर पाता, क्योंकि तमाम साक्ष्यों के बावजूद पाकिस्तानी आतंकी ढांचा जस का तस कायम है। जब तक ऐसे ढांचों को जड़ से खत्म नहीं किया जाता, तब तक पहलगाम जैसे आतंकी हमलों का खतरा बना रहेगा। समाधान केवल समस्या को पहचानने में नहीं, बल्कि उसका निदान करने से ही संभव है।

(लेखक सामरिक विश्लेषक हैं)