जागरण संपादकीय: राहत भरी खबर
विश्व अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी शांति की कितनी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा है, इसका पता इससे चलता है कि दोनों के बीच समझौते की दिशा में आगे बढ़ने की खबर आते ही तेल के दाम गिर गए और शेयर बाजारों में भी सकारात्मक असर दिखा।
HighLights
अमेरिका-ईरान समझौते से पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीद।
तेल कीमतों में गिरावट, शेयर बाजारों में सकारात्मक असर।
ईरान को परमाणु हठ और आतंकी समर्थन छोड़ना होगा।
यह केवल पश्चिम एशिया ही नहीं, पूरे विश्व के लिए राहत की बात है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के आसार बढ़ गए हैं। इसका संकेत इससे मिलता है कि जहां दोनों देश एक 14 सूत्रीय शांति प्रस्ताव पर विचार-विमर्श कर रहे हैं, वहीं अमेरिका ने ईरान के खिलाफ आपरेशन एपिक फ्यूरी नामक अपने सैन्य अभियान को समाप्त करने के साथ होर्मुज समुद्री मार्ग से जहाजों की आवाजाही के खिलाफ चलाए जा रहे आपरेशन फ्रीडम को भी रोकने की घोषणा की।
आपरेशन फ्रीडम के बाद भी जहाजों का आवागमन सुगम तो नहीं हो पाया था, लेकिन शायद ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी ने ईरान के नेतृत्व को अपना रवैया नरम करने को बाध्य किया। जो भी हो, जब तक दोनों पक्षों के बीच वास्तव में समझौता नहीं हो जाता, तब तक न तो पश्चिम एशिया में स्थायी शांति की आशा की जा सकती है और न ही पूरी दुनिया को बुरी तरह प्रभावित कर रहे ऊर्जा संकट से मुक्ति की। ध्यान रहे कि अमेरिका और ईरान के बीच पहले दौर की शांति वार्ता नाकाम हो गई थी और दूसरे दौर की वार्ता हो ही नहीं पाई थी। इसके बाद दोनों देश एक-दूसरे को धमकाने में जुट गए थे।
विश्व अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी शांति की कितनी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा है, इसका पता इससे चलता है कि दोनों के बीच समझौते की दिशा में आगे बढ़ने की खबर आते ही तेल के दाम गिर गए और शेयर बाजारों में भी सकारात्मक असर दिखा। यदि किसी कारण दोनों देशों के बीच होने वाली वार्ता में ठोस प्रगति नहीं होती तो टकराव की आशंकाएं उभरने में देर नहीं लगेगी।
ऐसा न हो, इसके लिए जहां अमेरिका को सब कुछ अपने मन मुताबिक होने की अपेक्षा का परित्याग करना होगा, वहीं ईरान को भी अपना यह हठ छोड़ना होगा कि परमाणु मसले पर कोई समझौता नहीं हो सकता और होर्मुज पर उसका अधिकार होना चाहिए। ईरान कुछ भी कहे, उसे न तो परमाणु हथियार बनाने की अनुमति दी जा सकती है और न ही इसकी कि वह होर्मुज को अपनी निजी जागीर माने। यदि ईरान चैन से रहने के साथ औरों को भी चैन से रहने देना चाहता है तो उसे इजरायल के लिए खतरा बने हमास, हिजबुल्ला जैसे आतंकी गुटों को सहयोग-समर्थन देने से पीछे हटना होगा।
उसे इस्लामी जगत का अगुआ बनने की मानसिकता भी छोड़नी होगी, क्योंकि खाड़ी देश पश्चिम एशिया में उसके दबदबे को कभी स्वीकार नहीं करने वाले। ईरान आज जिस स्थिति में है और विशेष रूप से जिस प्रकार यह जानना कठिन है कि वहां वास्तविक नेतृत्व किसके हाथ में है, तब तक न तो अमेरिका उससे समझौते के लिए बहुत आशान्वित हो सकता है और न ही विश्व। वैसे अंततः किसी बातचीत से ही रास्ता निकलेगा। अच्छा होता कि अमेरिका इसे समय रहते समझता और ईरान से वार्ता का क्रम तोड़कर उस पर हमला करने से बचता।












