जागरण संपादकीय: चुनाव बाद हिंसा का दुष्चक्र
बंगाल में आतंक मचा रहे हिंसक तत्व कितने अधिक दुस्साहसी हैं, इसका खौफनाक प्रमाण है भाजपा के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री पद के दावेदार सुवेंदु अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की गोली मार कर हत्या।
HighLights
चुनाव बाद पश्चिम बंगाल में हिंसा का दुष्चक्र जारी।
ममता बनर्जी पर हिंसा भड़काने और अनदेखी के आरोप।
भाजपा के सामने कानून-व्यवस्था की गंभीर चुनौती।
पश्चिम बंगाल चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान तो हिंसा से बच गया, लेकिन चुनाव बाद हिंसा से नहीं बच पा रहा है। केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती के बाद भी जिस तरह हिंसा जारी है, उससे पिछले विधानसभा चुनावों के बाद की भयावह हिंसा का स्मरण हो आया। तब ममता की सत्ता में वापसी हुई थी और उनके नेता-कार्यकर्ता निरंकुश होकर विरोधी दलों के समर्थकों पर टूट पड़े थे।
उस समय ममता ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि अभी उन्होंने शपथ नहीं ली है। इस बार वे इस खोखले तर्क की आड़ में छिपती दिख रही हैं कि चूंकि जीत भाजपा को मिली है, इसलिए हिंसा रोकने की जिम्मेदारी उसी की है, लेकिन यह ध्यान रहे कि अभी नई सरकार का गठन नहीं हुआ है। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि बंगाल में हिंसा इसलिए हो रही है, क्योंकि तृणमूल कांग्रेस के नेता-कार्यकर्ता हार की खीझ भाजपा समर्थकों पर निकाल रहे हैं।
ममता ने यह कहकर एक तरह से अपने समर्थकों को उकसाया ही है कि वे हारी नहीं, बल्कि उन्हें हराया गया है और इसलिए वे त्यागपत्र नहीं देंगी। स्पष्ट है कि वे चुनाव बाद हिंसा भड़काने के आरोपों से बच नहीं सकतीं। स्पष्ट यह भी है कि तृणमूल समर्थक आतंकित करने वाली हिंसा का जो परिचय दे रहे हैं, वह उस हिंसक राजनीतिक संस्कृति की देन है, जिसे ममता ने पिछले 15 वर्षों में उसी तरह संरक्षित किया, जैसे एक समय वाम दलों ने किया था।
बंगाल में आतंक मचा रहे हिंसक तत्व कितने अधिक दुस्साहसी हैं, इसका खौफनाक प्रमाण है भाजपा के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री पद के दावेदार सुवेंदु अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की गोली मार कर हत्या। सुवेंदु का यह आरोप सच हो तो हैरानी नहीं कि रथ की टारगेट किलिंग इसलिए हुई कि उन्होंने ममता को चुनावी मात दी।
इस हत्या के साथ भाजपा समर्थकों को निशाना बनाने वाली अन्य हिंसक घटनाओं के पीछे तृणमूल समर्थकों का हाथ होने की भरी-पूरी आशंका इसलिए है, क्योंकि अतीत में भी उन्होंने ऐसी हिंसा की है और सब जानते हैं कि ममता ने कभी उसकी परवाह नहीं की। यह अच्छा हुआ कि इस्तीफा न देने की जिद पर अड़ीं ममता को बर्खास्त कर दिया गया, लेकिन जब तक भाजपा सत्ता नहीं संभालती, तब तक चुनाव आयोग और पुलिस प्रशासन को यह देखना होगा कि मौजूदा हिंसा पर कैसे लगाम लगे।
वैसे तो चुनाव बाद 60 दिनों तक केंद्रीय बलों को बनाए रखने का फैसला लिया गया था, पर शायद उनकी तैनाती और बढ़ानी पड़े। जो भी हो, भाजपा को यह समझ आ जाना चाहिए कि उसके सामने अन्य अनेक चुनौतियों के साथ कानून एवं व्यवस्था के मोर्चे को ठीक करने की गंभीर चुनौती है। उसे इस चुनौती का सामना करना ही होगा, क्योंकि इससे ही राज्य को पटरी पर लाया जा सकता है।












