विचार: आत्ममंथन के बजाय आरोपों का सहारा
विपक्षी दलों के लिए जरूरी है कि वे जमीनी मुद्दों, संगठनात्मक मजबूती और वैकल्पिक नीति का एजेंडा बनाएं। ईवीएम में गड़बड़ी और निर्वाचन आयोग की मिलीभगत जैसे आरोप जनता के गले नहीं उतरते।
HighLights
विपक्ष चुनाव हारने पर ईवीएम और आयोग पर आरोप लगा रहा है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने हार को 'साजिश' बताया।
आत्ममंथन के बजाय आरोप लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करते हैं।
पीयूष पांडे। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों के बीच विपक्षी दलों के मोर्चे आइएनडीआइए का पूरा विमर्श पश्चिम बंगाल के इर्द-गिर्द सिमटता दिख रहा है। तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी और राहुल गांधी समेत कई विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि भाजपा ने चुनाव आयोग के साथ मिलकर नतीजों को प्रभावित किया। ममता ने यहां तक कहा कि वे हार को 'साजिश' का परिणाम मानती हैं। उल्लेखनीय है कि 2014 के बाद से हुए कई चुनावों में विपक्षी दलों ने अपनी हार के कारणों का ठोस आत्ममंथन करने के बजाय आरोपों की राह अधिक चुनी है।
2014 में भाजपा की बड़ी जीत के बाद ईवीएम में गड़बड़ी का मुद्दा जोर-शोर से उठा, जो हर चुनावी हार के बाद समय-समय पर सामने आता रहा है। हालांकि 2017 में चुनाव आयोग द्वारा आयोजित ‘ईवीएम चैलेंज’ में कोई भी दल मशीनों में छेड़छाड़ का दावा साबित नहीं कर पाया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर वीवीपैट प्रणाली को और व्यापक रूप से लागू किया गया, लेकिन ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगते ही रहते हैं।
बंगाल में बात ईवीएम में गड़बड़ी के आरोपों से भी आगे निकल गई है। अब विपक्षी दलों का आरोप है कि निर्वाचन आयोग ने पहले गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया यानी एसआइआर के तहत लाखों मतदाताओं के वोट काटे और फिर चुनाव आयोग और केंद्रीय बलों ने भाजपा के इशारे पर काम करते हुए चुनावी गड़बड़ी की। यदि चुनाव प्रक्रिया इतनी व्यापक रूप से प्रभावित की जा सकती थी, तो अन्य राज्यों तमिलनाडु या केरलम में अलग-अलग नतीजे कैसे आए? केरलम में तो कांग्रेस को प्रचंड जीत मिली है।
विपक्ष इस तथ्य को नकार देता है कि बंगाल में भाजपा की उपस्थिति कोई नई नहीं है। पहले जनसंघ और बाद में भाजपा वहां पैर जमाने की कोशिश सदैव करती रही। 2016 के विधानसभा चुनाव में उसे 10 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले थे, जो 2021 में बढ़कर 37.97 प्रतिशत हुए और अब 45.85 प्रतिशत। तृणमूल कांग्रेस के वोट 2021 के 48.02 प्रतिशत से घटकर 2024 में 40.80 प्रतिशत पर आ गए। 15 साल की एंटी इनकंबेंसी, भ्रष्टाचार के आरोप, मुस्लिम तुष्टीकरण के विरुद्ध हिंदू ध्रुवीकरण, महिलाओं की सुरक्षा और कांग्रेस, वाम दलों का तृणमूल के खिलाफ होना ममता की हार की वजहों में रहे।
चुनावी धांधली का आरोप नया नहीं है। तमाम प्रयासों के बावजूद चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह दोषमुक्त कभी नहीं रही। दिलचस्प है कि 1952 में जब पहला चुनाव हुआ था, तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन को 9 फरवरी 1952 को एक पत्र लिखा था, 'मुझे समय-समय पर चुनावों के संचालन के तरीके के बारे में विभिन्न शिकायतें प्राप्त होती रही हैं।...आज सुबह मुझे उत्तर प्रदेश के बारे में शिकायत मिली कि कई स्थानों पर मतदान पेटियों को बदल दिया गया या उनके साथ छेड़छाड़ की गई।' बाद के वर्षों में बिहार, तमिलनाडु, जैसे कई राज्यों में भी चुनावी गड़बड़ियां होती रहीं।
1995 में बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त बूथ लूट और हिंसा रोकने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त ने पहली बार कई चरणों में चुनाव कराए। राज्य में बड़े पैमाने पर अर्धसैनिक बलों की तैनाती भी की गई। उस वक्त लालू यादव खुलकर टीएन शेषन के खिलाफ बोलते थे। बंगाल में चुनावी हिंसा की अति हो गई थी। 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त बंगाल में चुनावी हिंसा में सात मौतें और करीब 2,652 लोग घायल हुए। 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान तो 300 से ज्यादा हिंसक घटनाओं में 58 मौतें हुईं।
इन हालात में केंद्रीय बलों की मौजूदगी ने अगर मतदाताओं को भयमुक्त होकर वोट डालने के लिए प्रेरित किया तो इसे गलत कैसे कहा जा सकता है? क्या ये भी एक वजह नहीं है कि बंगाल में मतदान के पहले चरण में 93.19 और दूसरे चरण में 91.66 प्रतिशत वोट पड़े? इसमें कोई शक नहीं कि एसआइआर का क्रियान्यवन और बेहतर होना चाहिए था, पर विपक्षी दलों की एसआइआर पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश सिर्फ एक नैरेटिव बनाने का ही दांव है, जिसका उन्हें लाभ कम और लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान अधिक है। बिहार में भी यही कोशिश हुई थी, जहां एसआइआर के बाद 65 लाख लोगों के नाम कटे थे, पर नाम जोड़ने के लिए औपचारिक आवेदन सैकड़ों में भी नहीं हुए।
संभव है कि बंगाल में एसआइआर के चलते कुछ लोग मतदान से वंचित हुए होंगे, पर विपक्ष वास्तव में एसआइआर के मुद्दे पर चिंतित था, तो उसे बयानबाजी से आगे बढ़ना चाहिए था। यदि वह पांच-सात हजार प्रभावित लोगों को ही आगे कर देता, तो मुद्दा राजनीति के केंद्र में आ जाता, पर केवल बयानबाजी होती रही। तथ्य यह भी है कि एसआइआर के तहत जहां अधिक नाम कटे, वहां भाजपा के साथ टीएमसी ने भी जीत हासिल की है।
लोकतंत्र में सवाल उठाना आवश्यक है, किंतु हर चुनावी हार को साजिश बताना खतरनाक प्रवृत्ति है। इससे न केवल संस्थाओं पर अविश्वास बढ़ता है, बल्कि वास्तविक मुद्दों से ध्यान भी भटकता है। विपक्षी दलों के लिए जरूरी है कि वे जमीनी मुद्दों, संगठनात्मक मजबूती और वैकल्पिक नीति का एजेंडा बनाएं। ईवीएम में गड़बड़ी और निर्वाचन आयोग की मिलीभगत जैसे आरोप जनता के गले नहीं उतरते।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)












