राहुल वर्मा। चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश के विधानसभा चुनाव परिणाम मिले-जुले रहे। असम, केरलम और पुडुचेरी के परिणाम अनुमानों के अनुरूप रहे तो पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के नतीजे अप्रत्याशित एवं नाटकीय राजनीतिक परिवर्तन को रेखांकित कर रहे हैं। असम के बारे में माना जा रहा था कि भाजपा सत्ता में वापसी करने में सफल रहेगी तो केरलम में कांग्रेस को कामयाबी मिलेगी। पुडुचेरी में भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की राह में कोई मुश्किल नहीं दिख रही थी। दो बड़े चुनावी राज्यों में से एक तमिलनाडु में नई-नवेली पार्टी टीवीके की भारी जीत ने राजनीतिक पंडितों को भी हैरान किया तो बंगाल में भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने लंबे समय से कायम ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया। इन दोनों बड़े राज्यों में भारी राजनीतिक उलटफेर हुआ है।

पिछले कुछ वर्षों में असम भाजपा के राजनीतिक वर्चस्व वाले राज्य के रूप में उभरा है। लगातार सत्ता में रहने के बावजूद उसकी सीटों में बढ़ोतरी दर्शाती है कि जनता सरकार के कामकाज से काफी संतुष्ट है। 2023 में विधानसभा क्षेत्रों के नए सिरे से परिसीमन ने भी भाजपा की राजनीतिक ताकत बढ़ाई है। बोडोलैंड में सहयोगी दलों और असम गण परिषद के साथ ने भी पार्टी को मजबूती दी। कल्याणकारी योजनाओं और मुख्यमंत्री हिमंत की लोकप्रियता भी उसके पक्ष में जाती है। दूसरी ओर कांग्रेस सांगठनिक स्तर पर एकदम लुंज-पुंज हो गई है। चुनावों के दौरान ही उसकी राज्य इकाई के पूर्व अध्यक्ष के अलावा प्रचार अभियान समिति के प्रमुख जैसे दो दिग्गज नेता भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। यह दर्शाता है कि राज्य की राजनीतिक हवा कांग्रेस के कितने विपरीत रही, जिसकी पुष्टि न केवल घटी हुई सीटों, बल्कि गौरव गोगोई जैसे नेता की हार में भी झलकती है, जिनके चेहरे पर पार्टी चुनाव लड़ रही थी।

केरलम में दस साल से वामपंथी सरकार सत्ता में थी, जिसने पिछले विधानसभा चुनाव में हर पांच साल में सरकार बदलने वाले राज्य के राजनीतिक रुझान को धता बताते हुए सत्ता में वापसी की थी। इसलिए यहां राजनीतिक परिवर्तन अवश्यंभावी माना जा रहा था। भाजपा यहां राजनीतिक पैठ बढ़ाने के प्रयास तो भरपूर कर रही है, पर वे फलीभूत नहीं हो पा रहे। वैसे भाजपा के इन प्रयासों की कीमत वाम दलों को चुकानी पड़ी, क्योंकि वह दक्षिण केरल और हिंदुओं विशेषकर एझावा जैसे उन समुदायों को साधने की जुगत में है, जो पारंपरिक रूप से वाम समर्थक माने जाते हैं। इसीलिए, केरलम की राजनीतिक लड़ाई में कांग्रेस के लिए कोई खास मुश्किल नहीं थी। केरलम से विदाई के बाद अब किसी भी राज्य में वामपंथी दलों की सरकार नहीं रह गई है।

बंगाल में भाजपा की ऐतिहासिक जीत पर भले ही कुछ राजनीतिक प्रेक्षक हैरानी जताएं, लेकिन राज्य की सत्ता तक उसकी पहुंच बस समय की ही बात थी। वर्ष 2019 से हो रहे चुनावों के समय से ही भाजपा करीब 40 प्रतिशत मतों के स्तर पर अटकी थी और इसमें पांच प्रतिशत तक की बढ़ोतरी उसे राज्य की कमान दिलाने को पर्याप्त थी। यह चुनाव उसके सत्तारोहण का पड़ाव बनकर उभरा। मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर की भूमिका को भी भाजपा की चुनावी जीत में एक कारक माना जा सकता है, लेकिन यही इकलौता कारण नहीं रहा। राज्य की ममता बनर्जी सरकार लंबे समय से कायम सत्ता से उपजे असंतोष से भी जूझ रही थी।

विभिन्न योजनाओं को लेकर केंद्र के साथ उनका टकराव भी एक वर्ग को अखर रहा था कि राज्य को इसके चलते अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहे हैं। ममता बनर्जी की निजी लोकप्रियता के बावजूद उन्हें सबसे अधिक दुष्परिणाम अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं के मनमानेपन और बड़बोलेपन का ही भुगतना पड़ा, जो लोगों को आतंकित करने के साथ ही उनके दैनंदिन जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप भी करते थे। इस बार चुनाव आयोग द्वारा मुहैया व्यापक सुरक्षा छत्र राज्य सरकार से कुपित मतदाताओं को आश्वस्त करने वाला साबित हुआ और मतदान के रुझान से लेकर परिणाम भी इस पहलू को पुष्ट करते हुए प्रतीत होते हैं। भाजपा ने भी पिछले विधानसभा चुनाव में की गई गलतियों से सबक लेते हुए सकारात्मक अभियान पर ध्यान केंद्रित किया, जिसका भी उसे लाभ मिला।

चुनाव परिणामों को लेकर सबसे हैरान करने का काम तमिलनाडु ने किया है, जहां 1967 के बाद पहली बार द्रविड़ केंद्रित राजनीति से इतर कोई दल सत्ता के शिखर पर उभरा है। तमिलनाडु की राजनीति पर फिल्म जगत का प्रभाव हमेशा से रहा है और देश में पहले भी बड़े राजनीतिक उलटफेर हुए हैं, लेकिन अभिनेता से नेता बने विजय की जीत कई मायनों में अप्रत्याशित रही है। एक समय एनटीआर ने समूचे आंध्र प्रदेश का दौरा कर अपनी सिनेमाई छवि को राजनीतिक स्वरूप दिया था, लेकिन उसकी तुलना में विजय ने ऐसा कुछ नहीं किया। आम आदमी पार्टी और असम गण परिषद जैसे एकाएक सफल हुए राजनीतिक प्रयोगों की पृष्ठभूमि भी कहीं न कहीं किसी सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ी रही, लेकिन विजय की टीवीके के साथ ऐसा भी कुछ नहीं रहा। इसलिए उनकी जीत वाकई चौंकाने वाली है।

इन चुनावों से भाजपा को बड़ा राजनीतिक संबल मिलेगा। केरलम और तमिलनाडु में असफलता के बावजूद असम में पहले से अधिक मजबूती और बंगाल के प्रचंड जनादेश से उसका 'मिशन ईस्ट' लगभग पूरा हो गया है। इससे उत्साहित पार्टी दक्षिण में और मजबूती के साथ अपनी ताकत लगाएगी। तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक की ऐसी जबरदस्त हार विपक्षी दलों के मोर्चे आइएनडीआइए के लिए तगड़ा झटका है, क्योंकि ये इस गठबंधन के प्रमुख स्तंभ रहे हैं। उनकी हार से इस गठबंधन का संतुलन भी बदलेगा। कांग्रेस का दो राज्यों में दांव लगा था, जिसमें केरलम की जीत से उसे दम तो मिलेगा, लेकिन असम उसके लिए जिस तरह विषम होता जा रहा है, उसकी टीस उसे सालती रहेगी। लोकसभा सीटों के लिहाज से बड़े राज्यों में निरंतर हाशिए पर पहुंचना भी उसके लिए चिंतित करने वाला पहलू बनता जा रहा है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं सेंटर फार पालिसी रिसर्च में फेलो हैं)