विचार: बंगाल के खोए गौरव को बहाल करने की चुनौती
अब भाजपा को बंगाल के खोए उस गौरव को बहाल करना होगा, जिस पर कभी बंगाल और बंगाली दोनों गर्व करते थे।
HighLights
पश्चिम बंगाल में भाजपा की ऐतिहासिक जीत।
भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण के खिलाफ जनाक्रोश।
बंगाल के खोए गौरव को बहाल करना।
कंचन गुप्ता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा की विजय लंबे समय तक याद रखी जाएगी। इसे याद रखने के कई कारण हैं। जिस भाजपा को एक समय राज्य में सत्ता की होड़ से बिल्कुल बाहर समझा जाता था, उसने न केवल ऐतिहासिक जीत दर्ज की है, बल्कि उस तृणमूल कांग्रेस को ऐसी करारी हार का सामना भी करना पड़ा, जो स्वयं को अपराजेय समझने लगी थी। हार को गरिमा के साथ स्वीकार करने के बजाय ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर और केंद्रीय सुरक्षा बलों की व्यापक तैनाती जैसे निर्वाचन आयोग के असाधारण कदमों का हवाला देकर भाजपा की जीत को अवैध ठहराने पर तुले हैं, लेकिन उनके इस रुख-रवैये को जनता के किसी कोने से न तो कोई समर्थन मिलता दिख रहा है और न ही उनके प्रति कोई सहानुभूति दिखती है।
दूसरी ओर भाजपा की बात करें तो उसकी जीत के इस पैमाने की कल्पना भी कठिन है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने जनता के असंतोष को पहले ही भांप लिया था और वह इस आक्रोश को व्यवस्थित तरीके से अपने पक्ष में भुनाने के लिए जुट गया। ममता बनर्जी की नाक के नीचे ही वर्षों से इसकी तैयारी चल रही थी और वे उसे अनदेखा करती रहीं। उनका कोई सहयोगी भी उन्हें यह समझा नहीं पाया। इसका ही परिणाम रहा कि भाजपा के विजयी रथ ने तृणमूल कांग्रेस के किले को कुचल दिया। इसके पीछे भाजपा के पक्ष में हिंदुओं के ध्रुवीकरण को एक वजह बताया जा रहा है, जिसके समक्ष ममता बनर्जी की मुस्लिम गोलबंदी बौनी साबित हुई। यह व्याख्या सतही तौर पर ही सही है, क्योंकि इसमें वे महत्वपूर्ण पहलू अनदेखे ही रह जाएंगे, जो बंगाल के राजनीतिक पटल पर तूफान की थाह लेने के लिए आवश्यक है। भाजपा के इस तूफान ने उन घेराबंदियों को ध्वस्त करने का काम किया, जिनकी व्यूह रचना उस पर बाहरी पार्टी का ठप्पा लगाते हुए उसे सुनियोजित तरीके से हमेशा के लिए राज्य की सत्ता से दूर रखने के लिए ही रची गई थी।
कुछ लोग यह दलील भी दे सकते हैं कि देश में भ्रष्टाचार अब चुनावी मुद्दा नहीं रहा और आपराधिक तत्वों का विरोध भी केवल सड़कों पर भीड़ को लामबंद करने तक ही सीमित होकर रह गया है। हालांकि बंगाल के नतीजे ऐसी धारणाओं को धता बताते हैं। बंगाल की जनता ने भ्रष्टाचार के पर्याय बन चुके तृणमूल शासन के विरुद्ध अपने मतदान से आक्रोश प्रकट किया। लोगों के जेहन में ममता के बेहद करीबी मंत्री के यहां से जब्त हुई भारी नकदी की तस्वीरें ताजा रही हैं। उन हजारों शिक्षकों के साथ ही असंख्य बंगाली मध्यवर्ग की पीड़ा भी चुनाव परिणाम में अभिव्यक्त हुई, जो तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार से छले गए थे, क्योंकि सरकार के कर्ताधर्ताओं ने रिश्वत लेकर उनके अवसरों पर डाका डालने का काम किया।
इसी तरह असंवेदनशील या कहें उदासीन प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व की मिलीभगत वाले आपराधिक रवैये को भी मतदाताओं ने सबक सिखाकर दंडित किया है। 'बंगाल में महिलाएं सबसे सुरक्षित हैं' जैसे दावों का तब कोई मूल्य-महत्व नहीं रह जाता, जब वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत दिखती हो। बंगाल इस मामले में कुख्यात होता गया कि अव्वल तो यहां पुलिस पीड़ित की शिकायत ही दर्ज नहीं करती और यदि किसी तरह वह दर्ज भी हो जाए तो यहां दोष सिद्धि एवं अपराध के लिए दंडित करने की दर सबसे कम है। जहां दूसरे राज्यों में बाल विवाह का चलन घटा है, वहीं बंगाल में यह बढ़ने पर है। इसी राज्य में महिलाओं को सरेआम कोड़े मारे जाते रहे और राजनीतिक नेतृत्व उस पर मौन साधे रहा और यह चुप्पी सीधे तौर पर वोटों के गणित से जुड़ी रही।
यदि ममता को लगता था कि उनकी अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की चरम सांप्रदायिक राजनीति की कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं होगी तो शायद वे उतनी चतुर नेता नहीं हैं, जितना उन्हें माना जाता है। उनके शासन में ही बंगाल में उर्दू को आधिकारिक भाषा घोषित किया गया। राज्य में हिंदुओं को दरकिनार करते हुए उनके राज में कट्टर इस्लामिक तत्वों और जिहादियों को मिलते संरक्षण से उपजी पीड़ा ने एक आक्रोश का जन्म दिया। बांग्लादेश के राजनीतिक घटनाक्रम से इस आक्रोश की आग में और घी पड़ा, जहां हिंदुओं को चिह्नित कर प्रताड़ित किया गया। बांग्लादेश की भारत के साथ सटी सीमा के सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जमात-ए-इस्लामी की जीत के साथ बंगाली हिंदू घर की देहरी पर दस्तक दे रहे खतरे को लेकर जागृत हो गए। यह एक तरह से ममता बनर्जी और उनके सांप्रदायिक शासन के विरुद्ध हिंदुओं को लामबंद करने वाला निर्णायक पड़ाव बना।
बंगाल के नतीजों ने यह भी दर्शाया कि मुफ्तखोरी वाली योजनाएं भी एक सीमा तक ही उपयोगी होती हैं। आज बंगाल में युवाओं के पास रोजगार नहीं है। आजीविका के लिए पलायन ही विकल्प रह गया और घर में रह गए केवल उनके आश्रित। एक समय वह भी था जब बंगाल से विज्ञानी, तकनीशियन, कलाकार, अभिनेता, संगीतकार, शिक्षक, डाक्टर और वकील जैसे प्रतिष्ठित बंगाली राज्य से बाहर जाते थे और जहां जाते, वहां के सम्मानित प्रबुद्ध वर्ग का हिस्सा बन जाते। अब बंगाल के पास ऐसी प्रतिभाओं का अकाल है। इसके बजाय वह घरेलू सहायिकाओं के लिए जाना जाने लगा है, जिन्हें लेकर चुनावों के दौरान तमाम मीम भी छाए रहे, क्योंकि मतदान के लिए उनमें से अधिकांश अपने राज्य गई थीं। यह मेरे जैसे तमाम बंगालियों के लिए बहुत अपमानजक और पीड़ादायक होने के साथ ही निराश करने वाला अनुभव भी रहा।
बंगाल में बहुत कुछ गलत हुआ है और उसे सही करने के लिए भाजपा को द्रुत गति के साथ अविलंब प्रयास करने होंगे। एक 'नए बंगाल' का निर्माण और 'दूसरे पुनर्जागरण' का आविर्भाव संभव है। बंगाल के पास इन दोनों ही लक्ष्यों को प्राप्त करने के पर्याप्त साधन और सामर्थ्य मौजूद हैं। कमी रही तो केवल नेतृत्व की। अब भाजपा को बंगाल के खोए उस गौरव को बहाल करना होगा, जिस पर कभी बंगाल और बंगाली दोनों गर्व करते थे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में वरिष्ठ सलाहकार हैं)












