विचार: शोध पत्रिकाओं की गुणवत्ता का सवाल
इधर पिछले कुछ वर्षों के अंतराल के बाद ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का पुनर्नवांक आया है। 434 पृष्ठों में 20 गंभीर शोध आलेखों से सज्जित इस अंक से पत्रिका की पुरानी प्रतिष्ठा पुनः कायम हो गई है।
HighLights
UGC नियमों से बढ़ी निम्न गुणवत्ता वाली शोध पत्रिकाएँ।
ऐतिहासिक पत्रिकाएँ बिना दावे के भी गंभीर शोध छापती थीं।
'नागरी प्रचारिणी पत्रिका' ने अपनी पुरानी प्रतिष्ठा लौटाई।
कृपाशंकर चौबे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के नियमानुसार पीएचडी शोध प्रबंध जमा करने के पहले शोधार्थी के दो शोध आलेखों का छपा होना आवश्यक है। शिक्षकों की प्रोन्नति के लिए भी शोध आलेखों का प्रकाशन अनिवार्य है। पहले नियम था कि ये शोध आलेख यूजीसी केयर सूचीबद्ध पत्रिका में छपे होने चाहिए। अब उस नियम को शिथिल कर विशेषज्ञ समीक्षित शोध पत्रिका में छपना अनिवार्य कर दिया गया है। इस अनिवार्यता के बाद विभिन्न विषयों में विशेषज्ञ समीक्षित पत्रिकाओं की बाढ़ आ गई है। आइएसएसएन (इंटरनेशनल स्टैंडर्ड सीरियल नंबर) हासिल कर निजी उद्यम से छपने वाली इन पत्रिकाओं में अधिकांश अकादमिक दृष्टि से लचर हैं, किंतु पत्रिका के नाम के नीचे यह लिखने की ढिठाई करती हैं-विशेषज्ञ समीक्षित शोध पत्रिका।
ये पत्रिकाएं पैसे लेकर शोधार्थियों-शिक्षकों के शोध आलेख छापती हैं। इन पत्रिकाओं में छपकर शोधार्थी और शिक्षक उसका लाभ भी ले रहे हैं। इनमें कई पत्रिकाएं यूजीसी केयर में भी सूचीबद्ध हो गई थीं। अधिकांश पत्रिकाओं में शोध आलेखों का निम्न स्तर चिंताजनक है। अधिकतर शोध आलेखों में न विषय पर नया प्रकाश पड़ता दिखता है, न शोधार्थी के सम्यक विश्लेषण का पता चलता है। अधिकांश शोध पत्रिकाओं में भाषा का संस्कार अनुशासन गायब दिखता है। वर्तनी को लेकर अराजकता का आलम यह है कि एक ही पृष्ठ पर एक ही शब्द अलग-अलग ढंग से लिखा मिलता है। इन पत्रिकाओं में शब्दावली, वाक्य विन्यास और व्याकरण संबंधी न्यूनतम ज्ञान का सर्वथा अभाव दिखता है।
जहां वर्तमान में हिंदी में शोध पत्रिका होने का दावा करने वाली पत्रिकाओं की यह पीड़क स्थिति है, वहीं अतीत में निकलने वाली कई पत्रिकाएं यह दावा नहीं करती थीं कि वे शोध पत्रिका हैं, किंतु गंभीर शोध आलेख प्रकाशित करती थीं। 1903 से 1920 तक ‘सरस्वती’ का संपादन करने वाले महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कभी यह दावा नहीं किया कि ‘सरस्वती’ शोध पत्रिका है, किंतु उन्होंने कई गंभीर शोध आलेख उसमें प्रकाशित किए। जैसे ‘सांख्यशास्त्र और उसके तत्व’, ‘कौटिलीय अर्थशास्त्र का रचना काल’ और ‘आर्य लोग कहां से आए’ वस्तुतः शोध आलेख हैं। इसी तरह रामानंद चटर्जी द्वारा प्रकाशित और बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा संपादित ‘विशाल भारत’ के फरवरी, मार्च और अप्रैल 1931 के अंकों में ब्रजेंद्र नाथ बनर्जी ने ‘हिंदी का प्रथम समाचार पत्र’ शीर्षक लेख तीन किस्तों में लिखकर प्रमाण सहित यह प्रस्तुत किया कि 30 मई, 1826 को प्रकाशित ‘उदंत मार्तण्ड’ हिंदी का पहला समाचार पत्र है। उनके शोध आलेख छपने के पहले 1845 में निकले ‘बनारस अखबार’ को हिंदी का पहला समाचार पत्र माना जाता था।
दिल्ली से 1951 में शुरू हुई ‘आलोचना’ त्रैमासिक ने भी शोध पत्रिका होने का कभी दावा नहीं किया, किंतु प्रवेशांक में ही उसने ‘भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण’, ‘शूद्रों की खोज’, ‘प्राचीन भारतीय वेशभूषा’, ‘संस्कृत के महाकाव्यों की परंपरा’ और ‘भारतीय आलोचना-पद्धति’ शीर्षक से गंभीर शोध आलेख प्रकाशित किए। डा. कामिल बुल्के का प्रसिद्ध शोध आलेख ‘रामचरितमानस का रचनाक्रम’ ‘आलोचना’ के जुलाई 1953 के अंक में छपा था। इसी अंक में परशुराम चतुर्वेदी ने ‘आलोचना और अनुसंधान’ शीर्षक से शोध आलेख लिखकर बताया था कि भारतीय अनुसंधान पद्धति क्या रही है और पश्चिम से यह कितनी अलग और आगे रही है।
परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार अनुसंधान का काम किसी बात के उत्स तक जाने का प्रयास करना मात्र ही नहीं है, उसके बीज रूप से लेकर उसके विकास तक का परिचय प्राप्त करना, सजातीय वस्तुओं के साथ उसका तुलनात्मक अध्ययन करना तथा विभिन्न दृष्टिकोणों के अनुसार उसका उचित और वास्तविक स्थान निर्धारित करना भी उक्त प्रक्रिया के प्रमुख अंग हैं। इसी तरह ‘नया प्रतीक’ ने भी कभी शोध पत्रिका होने का दावा नहीं किया, किंतु अज्ञेय ने उसमें ‘नृत्य का उद्गम’, ‘यूनानी लोक नृत्य की परंपरा’, ‘भारतीय ज्ञान प्रवाह का सनातन मूल्य’ शीर्षक से गंभीर शोध आलेख प्रकाशित किए।
हिंदी में उन्नीसवीं शताब्दी में एक ऐसी त्रैमासिक पत्रिका जरूर निकली, जिसके संपादक मंडल ने बाकायदा घोषणा की कि वह शोध पत्रिका है। उसका नाम ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ है। उसका प्रवेशांक जून 1896 में निकला। लेख पहले नागरी प्रचारिणी सभा में पढ़े जाते थे। उसके बाद परीक्षक समिति उन पर विचार करती थी। परीक्षक समिति के विचारोपरांत संपादक लेखों का परीक्षण करता था। तब उसे छपने को भेजा जाता था। परीक्षक समिति की अनुमति के बिना कोई भी लेख पत्रिका में प्रकाशित नहीं हो सकता था।
इस पत्रिका ने नागरी लिपि और हिंदी भाषा के संरक्षण तथा प्रसार, हिंदी साहित्य के विविध अंगों के विवेचन, भारतीय इतिहास और संस्कृति के अनुसंधान, प्राचीन तथा अर्वाचीन शास्त्र, विज्ञान और कला के पर्यालोचन में बड़ी भूमिका अदा की। 1968 तक इस पत्रिका की गुणवत्ता कायम रही, किंतु उसके बाद यह पत्रिका अव्यवस्थित और स्तरहीन हो गई। इधर पिछले कुछ वर्षों के अंतराल के बाद ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ का पुनर्नवांक आया है। 434 पृष्ठों में 20 गंभीर शोध आलेखों से सज्जित इस अंक से पत्रिका की पुरानी प्रतिष्ठा पुनः कायम हो गई है।
(लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में प्रोफेसर हैं)












