विचार: परस्पर निर्भर भारत और खाड़ी देश
पाकिस्तान ईरान युद्ध को अपना कद बढ़ाने के मौके के रूप में देख रहा है, पर वह हमेशा की तरह एक मोहरे के रूप में ही इस्तेमाल होगा। शायद यही उसकी नियति भी है।
HighLights
भारत-खाड़ी संबंध 1981 से परस्पर निर्भरता पर आधारित।
भारतीय प्रवासी, रेमिटेंस, ऊर्जा सुरक्षा महत्वपूर्ण आर्थिक स्तंभ।
ईरान युद्ध से व्यापार, निवेश, क्षेत्रीय स्थिरता पर गंभीर प्रभाव।
विवेक काटजू। संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई के राष्ट्रपति रहे शेख जायद बिन मोहम्मद के निमंत्रण पर मई 1981 में भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस खाड़ी देश का दौरा किया था। करीब 45 वर्ष पहले हुई इस मुलाकात में दोनों नेताओं ने सहमति जताई थी कि खाड़ी क्षेत्र और भारत की सुरक्षा एवं कल्याण की कड़ियां आपस में जुड़ी हुई हैं। समय के साथ यह धारणा और मजबूत ही हुई कि दोनों क्षेत्रों की सुरक्षा और समग्र कल्याण परस्पर निर्भर हैं। एक ऐसे समय जब ईरान युद्ध के चलते समूचे क्षेत्र में अशांति बढ़ने से पूरे समीकरण बदल गए हैं तो यह विचार और प्रासंगिक हो गया है।
अरब प्रायद्वीप में सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर, यूएई और ओमान जैसे छह प्रमुख देश हैं। यहां दक्षिण एशियाई देशों की बड़ी प्रवासी जनसंख्या रहती है। इनमें से भी सबसे बड़ी संख्या भारतीयों की है, जिनकी तादाद नब्बे लाख से एक करोड़ के बीच है। पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों की संख्या भी पचास लाख से अधिक है। नेपाल और श्रीलंका के भी लाखों लोग यहां हैं। ये लोग इन देशों की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये लोग पेशेवर, कार्यकारी और प्रबंधकीय से लेकर अर्धकुशल और सामान्य श्रमिक जैसी भूमिकाओं में सक्रिय हैं। यह कहना एकदम सही होगा कि भले ही खाड़ी देशों में यूरोपीय प्रवासी भी रहते हों, लेकिन उनका काम दक्षिण एशियाई विशेष रूप से भारतीयों के बिना नहीं चल सकता।
काम से जुड़ा भारतीयों का कौशल और भरोसा उन्हें इन देशों में व्यापक रूप से स्वीकार्य बनाता है। जितना खाड़ी के देशों को प्रवासियों की आवश्यकता है, उतनी ही उन्हें भी है, क्योंकि वे अपने देश को भारी मात्रा में धनराशि भेजते हैं। रेमिटेंस कही जाने वाली यह धनराशि इन देशों के वृहद आर्थिक स्थायित्व में संतुलन की भूमिका और बाहरी झटकों से बचाने में उपयोगी होती है। भारत के चालू खाते के लिए यह राशि बड़ा योगदान देती है, लेकिन मौजूदा हालात में पाकिस्तान के लिए यह अस्तित्व का संकट पैदा कर सकती है, क्योंकि उसकी अर्थव्यवस्था पहले से ही नाजुक बनी हुई है। राजनीतिक उथल-पुथल से प्रभावित बांग्लादेश के लिए भी रेमिटेंस की अहमियत कहीं ज्यादा बढ़ गई है। वृहद आर्थिक स्थिरता के अलावा खाड़ी देशों में कार्यरत लोगों द्वारा भेजे जाने वाला रेमिटेंस उनके स्वजनों के लिए भी बहुत आवश्यक है, क्योंकि अधिकांश परिवारों की योजनाएं इसी भेजी गई राशि के आधार पर टिकी होती हैं। उसके अभाव में उनके परिवारों का भविष्य अधर में भी लटक सकता है।
रेमिटेंस के अलावा खाड़ी देश भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। पाकिस्तान और अन्य दक्षिण एशियाई देशों के लिए तो खाड़ी देशों की महत्ता और भी अधिक है। ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत कच्चे तेल और गैस की आवश्यकताओं का आधे से अधिक हिस्सा इन देशों से आयात करता है, लेकिन उसने अमेरिका और यूरोपीय देशों जैसे अन्य स्रोतों से भी तेल आयात को विविधीकृत किया है। ये कुछ महंगे होंगे, लेकिन कम से कम उनकी उपलब्धता तो रहेगी। होर्मुज जलमार्ग के बाधित होने से बाकी दुनिया के साथ ही दक्षिण एशियाई देशों की समस्याएं भी बढ़ी हैं। पाकिस्तान के लिए समस्या यह है कि उसे सऊदी अरब और यूएई से क्रेडिट यानी बाद में भुगतान के साथ भी तेल मिलता है, जो वह अन्य देशों से प्राप्त नहीं कर सकता। इसके चलते भुगतान की स्थिति में पहले से ही आर्थिक मुश्किलों से जूझ रही पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था पर दबाव और बढ़ेगा। उर्वरकों की आपूर्ति में संभावित गतिरोध ने भी कृषि आधारित दक्षिण एशियाई देशों की चिंता बढ़ाई है।
खाड़ी देश भारत के साथ ही अन्य दक्षिण एशियाई देशों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। भारत का खाड़ी देशों के लिए निर्यात उसके कुल निर्यात का एक बड़ा हिस्सा है। ईरान युद्ध ने इसे प्रभावित किया है। दुबई बंदरगाह कई निर्यात गंतव्यों के लिए पड़ाव भी है। खाड़ी क्षेत्र भारत समेत कई दक्षिण एशियाई देशों के लिए निवेश के महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं। भारतीयों और अन्य दक्षिण एशियाई लोगों ने भी खाड़ी देशों में भारी निवेश किया है। इस युद्ध से उस पर आशंकाओं के बादल छाए हैं। इस तरह देखा जाए तो दशकों पहले इंदिरा गांधी और शेख जायद ने दोनों पक्षों के परस्पर हितों के जुड़ाव की जो बात कही थी, वह एकदम सही थी। उन्होंने जिन बिंदुओं पर सहमति बनाई थी, उन्हें आगे बढ़ाने का काम शेख जायद के पुत्र और यूएई के वर्तमान राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने बखूबी आगे बढ़ाया है। दोनों के बीच मजबूत एवं आत्मीय व्यक्तिगत संबंध भी है।
ईरान युद्ध ने यह भी दर्शाया है कि भारत और दक्षिण एशियाई देश एक ही नाव पर सवार हैं। यदि पाकिस्तान भारत के प्रति इतनी नफरत से भरा न होता और बांग्लादेश ने भी हालिया अस्थिरता का परिचय न दिया होता तो संभव है कि दक्षिण एशिया में भारत उनके साथ मिलकर अमेरिका, इजरायल और ईरान से अपील कर सकता था कि वे टकराव के बजाय कूटनीति का सहारा लें। अभी प्रत्येक पक्ष निजी हैसियत से ऐसा कह रहा है, लेकिन सामूहिक स्वर की बात ही कुछ और होती। दक्षिण एशिया की एकजुट आवाज में सबसे बड़ी बाधा पाकिस्तान है। वहां के शासक वर्ग की सत्ता भारत के प्रति नफरत पर टिकी रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कार्यकाल की शुरुआत में उसके साथ संबंध सामान्य बनाने की दिशा में पहल की, जिसे वहां की सेना ने सफल नहीं होने दिया। अब पाकिस्तान ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता के लिए प्रयासरत है, लेकिन ईरान ने उसके प्रयासों की हवा निकाल दी। पाकिस्तान अपनी इस्लामी पहचान को दक्षिण एशियाई पहचान से ऊपर रख रहा है। इस्लामिक देशों में पाकिस्तान के पास ही परमाणु हथियार हैं, पर उसके चरित्र को देखते हुए इस्लामिक देश ही उसे गंभीरता से नहीं लेते, क्योंकि उसकी राजनीति अस्थिर और अर्थव्यवस्था डांवाडोल है। पाकिस्तान ईरान युद्ध को अपना कद बढ़ाने के मौके के रूप में देख रहा है, पर वह हमेशा की तरह एक मोहरे के रूप में ही इस्तेमाल होगा। शायद यही उसकी नियति भी है।
(लेखक पूर्व राजनयिक हैं)












