विचार: जरूरी था ट्रांसजेंडर कानून में बदलाव
ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक पारित कर भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि वह वास्तविक ट्रांसजेंडर समाज के हितों के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, पर इसकी आड़ में समाज विरोधी एजेंडा नहीं चलने देगी।
HighLights
ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली।
लिंग पहचान के मेडिकल सत्यापन पर विरोध जारी।
नव वाम एजेंडा, जेंडर फ्लुइडिटी पर गंभीर चर्चा।
विकास सारस्वत। गत दिनों ट्रांसजेंडर के अधिकारों से जुड़े संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई। 2019 के अधिनियम में सुधार की दृष्टि से लाए गए ट्रांसजेंडर (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक में किसी को जबरन ट्रांसजेंडर दर्शाने या उससे भीख मंगवाने पर 10 वर्ष की सजा का प्रविधान है। बच्चों की ऐसी प्रस्तुति-शोषण पर यह सजा आजीवन कारावास तक हो सकती है।
अगवा कर ट्रांसजेंडर बनाने के उद्देश्य से अंग-भंग पर भी कड़ी सजा का प्रविधान है। मौजूदा कानून में ट्रांसजेंडरों के प्रति भेदभाव-दुर्व्यवहार पर दो साल तक की सजा थी। पहले से व्यापक और कड़े प्रविधानों के बावजूद इस बिल का विरोध हो रहा है। विरोध का मूल कारण वह प्रस्ताव है, जो ट्रांसजेंडर पहचान को स्व-अनुभूत लिंग पहचान की अपेक्षा मेडिकल सत्यापन से तय करता है। नए विधेयक के बाद ट्रांसजेंडर को उचित अधिकारी से मेडिकल प्रमाणपत्र लेना होगा।
नेशनल लीगल सर्विसेज अथारिटी, नालसा और द कर्नाटक स्टेट जेंडर एंड सेक्सुअलिटी माइनारिटीज फार कन्वर्जेंस जैसी संस्थाएं यह कह कर विरोध कर रही हैं कि किसी भी व्यक्ति को उसकी आनुवांशिक संरचना से इतर इच्छानुसार अपना लिंग घोषित करने का अधिकार होना चाहिए। नालसा बनाम केंद्र सरकार वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने नालसा का यह तर्क माना था और 2019 का ट्रांसजेंडर अधिनियम उसी आधार पर बना था। अब संशोधन विधेयक ने पुनः ट्रांसजेंडर एक्टिविज्म और लिंग पहचान राजनीति को विमर्श का बिंदु बना दिया है। सामान्यजन को भले ही आश्चर्य हो कि किसी व्यक्ति का लिंग निर्धारण क्रोमोसोम जैविकी की अपेक्षा उसकी भावनाओं पर कैसे आधारित हो सकता है, परंतु ऐसा मत पश्चिम के अकादमिक जगत और राजनीति में प्रबल रूप ले चुका है।
लिंग पहचान की स्वघोषणा से ऐसी विचित्र स्थिति बन गई है कि पुरुष महिला प्रसाधन कक्ष और महिला जेलों में प्रवेश पा रहे हैं एवं महिला खेल एवं प्रतिस्पर्धाओं में भाग ले रहे हैं। इसी तरह पश्चिम में ‘शी’ या ‘ही’ की बजाय ‘जी’ और ‘हिम’ या ‘हर’ के स्थान पर ‘हिअर’ जैसे लिंग निरपेक्ष सर्वनामों के उपयोग की हठ है। यह दुष्चेष्टा माता-पिता की सहमति के बिना बच्चों को स्कूल में अपना नाम और सर्वनाम बदलने की अनुमति देती है और चिकित्सकों द्वारा अवयस्कों के लिंग परिवर्तन की पैरवी भी करती है। भारत में अभी तक अवयस्कों को ऐसे अधिकार नहीं हैं, परंतु यदि पश्चिम प्रेरित पैरवी रोकी नहीं गई तो इस सक्रियता की दिशा वही होगी। इस पूरे विमर्श में बड़ा प्रश्न यह है कि ऐसी विकृति को बढ़ावा देने का उद्देश्य आखिर क्या है?
ट्रांसजेंडर सक्रियता, यौन स्वच्छंदता को बढ़ावा नए वाम की उस रणनीति का हिस्सा है, जो श्रमिक केंद्रित पुराने मार्क्सवाद से आगे बढ़ कर ऐसे राजनीतिक गठबंधन का निर्माण करना चाहती है, जिसमें श्रमिकों के साथ-साथ मजहबी, भाषाई, नस्लीय एवं लैंगिक अल्पसंख्यकों का समूह बने। नव वाम का मक्का माने जाने वाले फ्रैंकफर्ट स्कूल के विचारकों का मानना है कि सत्ता केवल पूंजीपति और राज्यों के पास नहीं बल्कि पंथ, राष्ट्र, परिवार जैसे सामाजिक संस्थान, भाषाई एवं सांस्कृतिक प्रभुत्व, सामाजिक और नैतिक मान्यताओं में निहित है।
इसी विचार से संबद्ध जूडिथ बटलर की नजर में जैविक लिंग को महिला या पुरुष जैसी पहचान में बांधना उसी वर्चस्व का प्रतीक है। यौन क्रांति के जनक विल्हेम राईख के अनुसार पितृसत्तात्मक परिवार विनम्र, फासीवादी बनाने का कारखाना है। राईख के अनुसार बचपन से यौन मुक्ति को प्रोत्साहित कर व्यक्ति का चारित्रिक कवच तोड़ा जा सकता है और फिर वह सभी प्राधिकारों के खिलाफ विद्रोही बन जाएगा। ‘नव वामपंथ के पिता’ हर्बर्ट मार्क्यूस ने परिवार व्यवस्था को तोड़ने और पूंजीवादी पश्चिमी समाज की उत्पादकता को पंगु बनाने के लिए यौन स्वच्छंदता और बहुगामी व्यभिचार को बढ़ावा देने की बात कही। कट्टरपंथी नारीवादी शुलामिथ फायरस्टोन ने कहा कि लिंगों के बीच जैविक अंतर सभी उत्पीड़न की जड़ है और द्विआधारी लिंग वर्ग का उन्मूलन होना चाहिए। उनके अनुसार जब तक महिलाएं ‘प्रजनन के अत्याचार’ और बच्चे अपने माता-पिता से ‘मुक्त’ नहीं हो जाते, तब तक सच्ची क्रांति असंभव है।
नव वामपंथ जेंडर फ्लुइडिटि यानी लिंग ‘तरलता’ की बात करता है। महिला और पुरुष रूपी पारंपरिक लिंग द्वैत को चुनौती देने और ट्रांसजेंडर अस्पष्टता को बढ़ावा देने में सबसे बड़ा योगदान जान मनी और अल्फ्रेड किंसे का है। मनोविज्ञानी जान मनी के मुताबिक लिंग पहचान जैविक संरचना की अपेक्षा काफी हद तक पालन-पोषण का परिणाम है। मनी ने शिशुओं की लिंग परिवर्तन सर्जरी एवं हार्मोनल थेरेपी की वकालत की और बच्चों को उनके विपरीत लिंग वाले परिवेश में पालने पर जोर दिया। तमाम सर्वेक्षण इसकी पुष्टि करते हैं कि बालपन में ऐसे विचित्र प्रयोग भोगने वालों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।
ऐसे प्रकरण पश्चिम ही नहीं, बल्कि भारत में भी होते रहे हैं। 2021 में प्रमुख ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट और केरल की पहली ट्रांसजेंडर रेडियो जाकी अनन्या कुमारी ऐलेक्स ने गलत सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी को अपनी आत्महत्या का कारण बताया था। यह दुखद है कि सामाजिक व्यवस्था को गहरी क्षति पहुंचाने के बावजूद ऐसे मनोविज्ञानी, समाजशास्त्री और अकादमिकों की विश्व पटल पर तूती बोल रही है। पश्चिम में भावनाओं को तथ्यों के ऊपर रखने वाली पोस्ट स्ट्रक्चलरिज्म, क्रिटिकल थ्योरी और क्वीयर थ्योरी लिबरल आर्ट्स के तहत पढ़ाई जा रही है। वहां सरकारें इन सिद्धांतों पर नीतियां बना रही हैं।
हमें समझना होगा कि क्वीयर एक्टिविज्म और जेंडर फ्लुइडिटी की आड़ में नव वामपंथ मानवाधिकारों के लिए संघर्ष नहीं, बल्कि भाषा से लेकर सामाजिक मान्यताओं पर नियंत्रण हासिल करने का प्रयास कर रहा है। ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक पारित कर भारत सरकार ने स्पष्ट किया कि वह वास्तविक ट्रांसजेंडर समाज के हितों के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है, पर इसकी आड़ में समाज विरोधी एजेंडा नहीं चलने देगी।
(लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)












