विचार: बारूदी लपटों में झुलसती प्रकृति, कार्बन फुटप्रिंट बढ़ाने वाला चौथा सबसे बड़ा कारक युद्ध
मनुष्य पृथ्वी पर एकमात्र ऐसा जीव है, जिसने अपने ही अस्तित्व को समाप्त करने के हर संभव जतन किए हैं। यह आत्मघाती प्रवृत्ति मानवीय लालच और अंतहीन संचय की अंधी दौड़ का परिणाम है।
HighLights
युद्ध मानवीय लालच और जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण।
संघर्षों से बढ़ता कार्बन फुटप्रिंट, पर्यावरण प्रदूषण का खतरा।
महासागरों का गर्म होना, विनाशकारी वर्षा का संकेत।
डॉ. अनिल प्रकाश जोशी। मनुष्य पृथ्वी पर एकमात्र ऐसा जीव है, जिसने अपने ही अस्तित्व को समाप्त करने के हर संभव जतन किए हैं। यह आत्मघाती प्रवृत्ति मानवीय लालच और अंतहीन संचय की अंधी दौड़ का परिणाम है। सब अपने नियंत्रण में लेने की चाहत ने न केवल पृथ्वी का तापमान बढ़ाया, बल्कि आपसी वैमनस्य और युद्धों ने इस विनाशकारी आग में घी डालने का काम किया है।
आज की झुलसाती गर्मी महज एक मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि हमारे विनाशकारी कृत्यों की प्रतिध्वनि है। पिछले एक दशक से प्रकृति का बदलता व्यवहार हमारे सामने है। एक ओर जहां बढ़ती गर्मी अपना विकराल रूप दिखा रही है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक युद्धों ने पर्यावरण प्रदूषण का एक नया और घातक द्वार खोल दिया है।
बढ़ता तापीय संकट
विडंबना यह है कि जब पूरी दुनिया को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एकजुट होना चाहिए, तब युद्धों का दौर प्रकृति के लिए सबसे बड़ा संकट बनकर उभरा है। युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते; इनका प्रभाव सीमाओं को लांघकर हवा, मिट्टी और पानी को जहर बना देता है। युद्ध की विभीषिका केवल जान-माल तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह समूचे पारिस्थितिकी तंत्र को भ्रमित और खंडित कर देती है। आज दुनिया का एक बड़ा हिस्सा रणक्षेत्र बना हुआ है।
इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव हो या इजरायल-गाजा और रूस-यूक्रेन के बीच लंबे समय से जारी संघर्ष- इन युद्धों ने मानवता के साथ-साथ प्रकृति को भी गहरे घाव दिए हैं। इतिहास गवाह है कि युद्ध कभी दो देशों के बीच सीमित नहीं रहता; इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव वैश्विक स्तर पर पड़ता है।
वर्तमान संघर्षों ने जहां ऊर्जा और तेल का संकट पैदा किया है, वहीं हथियारों से निकलने वाले जहरीले रसायनों ने जल और जमीन को मरणासन्न कर दिया है। टीएनटी और आरडीएक्स जैसे विस्फोटकों में मौजूद लेड और यूरेनियम जैसे तत्व आने वाली कई पीढ़ियों तक के लिए पारिस्थितिकी तंत्र को दूषित कर देते हैं।
कुपित होंगे जब सागर
हमें यह भी सोचना होगा कि बढ़ते तापमान के बीच समुद्रों की क्या भूमिका होगी। जैसे-जैसे महासागर गर्म होंगे, वातावरण में नमी बढ़ेगी। यह अतिरिक्त नमी भविष्य में कहां और किस रूप में आसमानी आफत या विनाशकारी वर्षा बनकर बरसेगी, इसकी कल्पना मात्र सिहरन पैदा करती है।
विकास की अंधी लालसा और अहंकार की तुष्टि के लिए लड़े जा रहे ये युद्ध अंततः मनुष्य को ही लील जाएंगे। जब मनुष्य केवल भोजन ही नहीं, बल्कि संसाधनों की छीना-झपटी के लिए एक-दूसरे के खून का प्यासा होगा, तब प्रकृति का कुछ नहीं बिगड़ेगा। वह तो बस अपने शांत स्वभाव को त्याग देगी और मनुष्य का अस्तित्व स्वतः समाप्त हो जाएगा!
विनाशकारी भविष्य की पदचाप
विशेषकर आधुनिक अग्निशस्त्रों और मिसाइलों से निकलने वाली अपार ऊष्मीय ऊर्जा वातावरण में अवशोषित होकर तापक्रम को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। पिछले तीन-चार वर्षों के युद्धों ने जलवायु संकट को उस मोड़ पर खड़ा कर दिया है जहां से वापसी कठिन है।
फरवरी 2024 का महीना पिछले 175 वर्षों का सबसे गर्म फरवरी दर्ज होना इस बात का प्रमाण है कि हम क्लाइमेट इमरजेंसी के दौर में जी रहे हैं। यह तपिश केवल प्राकृतिक चक्र का हिस्सा नहीं, बल्कि मानव-निर्मित बारूदी धुएं की देन है। बदलते मौसम की ये चेतावनियां अब स्पष्ट और डरावनी हो चुकी हैं।
(लेखक पद्मभूषण से अलंकृत प्रख्यात पर्यावरणविद् हैं)












