ऋतु सारस्वत। गर्मियां शुरू हो चुकी हैं और इसी के साथ जल संकट के दिन आने वाले है। ऐसे ही माहौल में बीते दिनों विश्व जल दिवस मनाया गया। 1993 से संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जा रहा यह दिवस जल को जीवन, विकास और मानव अधिकार के रूप में स्थापित करने के वैश्विक प्रयासों का प्रतीक है, किंतु इस औपचारिकता के पीछे एक कठोर सच्चाई आज भी यथावत है। यह सच्चाई केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देती है।

फिजी के एक तटीय गांव में रहने वाली छह वर्षीय लैसानी घर के पास पानी के टैंक से वर्षा जल एकत्र करती है। वह प्लास्टिक की बोतलों में पानी भरकर घर लाती है, जहां पीने से पहले उसे उबाला जाता है। उसके परिवार के लिए वर्षा जल ही सुरक्षित पानी का मुख्य स्रोत है। इसे उपयोग योग्य बनाए रखना उनके दैनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि तथ्य बताते हैं कि विश्व में लगभग 1.8 अरब लोगों के घरों में पेयजल उपलब्ध नहीं है।

हर तीन में से दो परिवारों में पानी लाने की जिम्मेदारी मुख्यतः महिलाओं और लड़कियों पर होती है। पानी लाने और उसके प्रबंधन में खपने वाला समय अक्सर लड़कियों की शिक्षा में बाधा, स्वास्थ्य जोखिमों में वृद्धि और सीमित अवसरों का कारण बनता है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार वैश्विक स्तर पर महिलाएं और लड़कियां प्रतिदिन लगभग 25 करोड़ घंटे पानी एकत्र करने में व्यतीत करती हैं। यह केवल समय का आंकड़ा नहीं, बल्कि वे असंख्य अवसर हैं, जो शिक्षा, कौशल विकास, मनोरंजन या आय अर्जित करने वाली गतिविधियों में परिवर्तित हो सकते थे। आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि 15 वर्ष से कम आयु की लड़कियों (7 प्रतिशत) के पानी लाने की संभावना समान आयु के लड़कों (4 प्रतिशत) की तुलना में अधिक है। यह लैंगिक असमानता को उजागर करता है।

यूएन वर्ल्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्ट 2026 यह रेखांकित करती है कि जल संकट केवल संसाधनों की उपलब्धता का प्रश्न नहीं, बल्कि समान अधिकारों और अवसरों से जुड़ा हुआ एक गहरा सामाजिक प्रश्न है। घरों में सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता के अभाव का सबसे अधिक भार महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है, जो अधिकांश परिवारों में पानी लाने की प्राथमिक जिम्मेदारी निभाती हैं। जब सुरक्षित जल घर के निकट उपलब्ध होता है, तो लड़कियों के स्कूल में बने रहने की संभावना बढ़ती है और महिलाओं को आर्थिक एवं सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए समय मिलता है।

शहरी झुग्गी बस्तियों और ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों तथा मासिक धर्म स्वच्छता के लिए पर्याप्त जल का अभाव न केवल शारीरिक असुविधा का कारण बनता है, बल्कि महिलाओं और किशोरियों के लिए शर्मिंदगी, असुरक्षा और सामाजिक बहिष्करण की स्थिति भी उत्पन्न करता है। विडंबना यह है कि 50 से कम ही देशों में ऐसी नीतियां हैं, जो ग्रामीण स्वच्छता और जल संसाधन प्रबंधन में महिलाओं की भागीदारी का स्पष्ट उल्लेख करती हैं।

जहां वैश्विक स्तर पर नीतिगत असंतुलन अब भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है, वहीं भारत ने इस चुनौती का समाधान खोजने की दिशा में उल्लेखनीय पहल की है। जल जीवन मिशन के माध्यम से भारत ने न केवल जल उपलब्धता के प्रश्न को संबोधित किया है, बल्कि जल प्रबंधन में व्याप्त लैंगिक असमानता को भी दूर करने का प्रयास किया है। 2019 में प्रारंभ जल जीवन मिशन, जिसे ‘हर घर जल’ के रूप में भी जाना जाता है, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक परिवार तक नल से स्वच्छ जल पहुंचाने का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है।

इसे दिसंबर 2028 तक बढ़ा दिया गया है। मार्च 2026 तक इस मिशन के अंतर्गत लगभग 15.82 करोड़ ग्रामीण परिवारों को उनके घरों में पाइप जल कनेक्शन उपलब्ध कराया जा चुका है, जो कुल ग्रामीण परिवारों का लगभग 81 प्रतिशत से अधिक है। इस तरह जल जीवन मिशन ने लैंगिक समानता की दिशा में एक अभूतपूर्व और अनुकरणीय कार्य किया है।

घर या घर के निकट जल उपलब्ध होने से महिलाओं का समय शिक्षा, आजीविका और अन्य उत्पादक गतिविधियों में लगता है। भारतीय स्टेट बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, ‘जल जीवन मिशन के परिणामस्वरूप लगभग नौ करोड़ महिलाओं को पानी लाने के दैनिक श्रम से मुक्ति मिली है। यह केवल श्रम में कमी नहीं, बल्कि उनके समय और ऊर्जा के पुनर्संयोजन का संकेत है। महिलाओं की कृषि एवं अन्य उत्पादक गतिविधियों में भागीदारी में वृद्धि दर्ज की गई है, जो यह स्पष्ट करती है कि जल तक आसान पहुंच सीधे तौर पर महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण से जुड़ती है।

इस मिशन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका लैंगिक दृष्टिकोण है। ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों में 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी को अनिवार्य कर सरकार ने महिलाओं को केवल जल उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि जल प्रबंधन की निर्णयकर्ता के रूप में स्थापित किया है।

जल समाधान में महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व को केंद्र में रखा जाना आवश्यक है, ताकि वे केवल उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि जल प्रबंधन और नीति निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भागीदार बन सकें। भारत ने जल जीवन मिशन के माध्यम से इस विचार को व्यवहार में रूपांतरित करते हुए एक उदाहरण प्रस्तुत किया है, परंतु यह केवल आरंभ है और इस क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है।

(लेखिका समाजशास्त्री हैं)