पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर के काम में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से तैनात न्यायिक अधिकारियों को जिस तरह घंटों बंधक बनाए रखा गया, वह इस राज्य में अराजकता हावी हो जाने का एक और प्रमाण ही है। इसी कारण इस घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि मालदा जिले में कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है।

इस घटना की गंभीरता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि जिन अधिकारियों को बंधक बनाया गया, उनमें महिलाएं भी थीं और उन्हें तब मुक्ति मिल सकी, जब खुद सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने सख्त आदेश दिए। चूंकि राज्य के शीर्ष अफसर बंधक बनाए गए न्यायिक अधिकारियों को छुड़ाने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे थे, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इस घटना की जांच सीबीआइ या एनआइए से कराने के निर्देश दिए। इसका अर्थ है कि उसे राज्य के शासन-प्रशासन पर तनिक भी भरोसा नहीं।

यह बंगाल सरकार के लिए शर्मिंदगी का विषय होना चाहिए, लेकिन यह तय है कि उसकी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। यदि ममता सत्ता में लौटीं तो बंगाल में कानून व्यवस्था को चुनौती देने वाली ऐसी अराजक घटनाएं फिर से आम हो सकती हैं। हिंसक घटनाओं के सामने पुलिस प्रशासन के मूकदर्शक बने रहने के मामलों में बंगाल सरकार को हाई कोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट से न जाने कितनी बार फटकार लग चुकी है, पर नतीजा ढाक के तीन पात वाला है।

मालदा की शर्मनाक घटना पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि उनकी सारी शक्तियां छीन ली गई हैं। यदि सच में ऐसा है तो फिर उनकी सरकार के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से यह आग्रह क्यों किया कि वह अपनी इस टिप्पणी को हटा ले कि कानून व्यवस्था ध्वस्त हो गई है? वास्तव में ऐसा कोई निष्कर्ष निकालना निरा झूठ है कि चुनाव वाले राज्य में सरकार शक्तिहीन हो जाती है। सच यह है कि ममता शासन में बंगाल प्रशासन का बुरी तरह राजनीतिकरण हो चुका है और कई पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी तृणमूल कांग्रेस के एजेंट के तौर पर काम करते हैं।

जिन अराजक तत्वों ने मालदा में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाया, उन्हें वोटर लिस्ट से नाम कट जाने वाले क्षुब्ध वोटरों की संज्ञा देना सुप्रीम कोर्ट को धोखा देना ही है। मालदा में मनमानी करने वाले अराजक तत्व ही थे, इसका पता इससे चलता है कि गत दिवस उन्होंने फिर से उत्पात मचाया और पुलिस पर हमला किया। अच्छा हो कि सुप्रीम कोर्ट इस पर ध्यान दे कि बंगाल प्रशासन अराजकता से दृढ़ता से निपटना सीखे-केवल चुनाव के वक्त ही नहीं, बल्कि सामान्य दिनों में भी। यदि इस पर ध्यान नही दिया गया तो बंगाल में अराजकता और बढ़ेगी ही।