अश्विनी कुमार। ईरान युद्ध से दुनिया की परेशानी बढ़ गई है। इसे जल्द समाप्त करने के लिए पर्दे के पीछे भी तमाम प्रयास जारी हैं, पर उनसे किसी समाधान की उम्मीद कम ही है। संघर्ष का दायरा खाड़ी क्षेत्र तक फैल गया है। ईरान ने इस क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया है। ईरान ने होर्मुज जलमार्ग की जिस तरह नाकाबंदी की हुई है, उससे कई अन्य देश भी इस संघर्ष में कूद सकते हैं।

कोई भी युद्ध अपने साथ तबाही लेकर ही आता है तो यह लड़ाई भी कोई अपवाद नहीं। इसमें अब तक हजारों जिंदगियां भेंट चढ़ गई हैं। बड़ी-बड़ी मानव बस्तियां मलबे के ढेर में तब्दील हो गई हैं। अमेरिका और इजरायल ने ईरान की परमाणु आकाक्षांओं के दमन और अपनी आत्मरक्षा को आधार बनाकर यह हमला किया। उन्होंने ईरानी जनता के मानवाधिकारों और स्वतंत्रता के लिए सत्ता परिवर्तन की आवश्यकता भी जताई, पर उनकी छेड़ी इस जंग को न के बराबर नैतिक एवं कानूनी समर्थन मिल सका।

वास्तविक अर्थों में तो यह युद्ध ऊर्जा संसाधनों पर कब्जे और अपनी ताकत का वर्चस्व स्थापित करने की एक कवायद भर है। यह इस पहलू को भी पुष्ट करता है कि है 1945 के बाद की अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था वर्चस्ववादी प्रयोग के समक्ष युद्ध रोकने और शांति बनाए रखने में पूरी तरह असमर्थ है।

ट्रंप का वेनेजुएला अभियान और उनके द्वारा छेड़ा गया टैरिफ युद्ध उस वैश्विक कानूनी ढांचे के पतन का ही प्रमाण है, जिसका नेतृत्व संयुक्त राष्ट्र चार्टर और जिनेवा सम्मेलनों एवं अन्य संधियों में संहिताबद्ध कानून करते हैं। ईरान पर हमले की न तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से अनुमति ली गई और न ही अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस से अनुमोदन।

ईरानी नेताओं की हत्या और ईरान के भीतर नागरिक ठिकानों पर सैन्य हमलों का दायरा भी कई मौलिक सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है। ईरान पर हमले के लिए इजरायल और अमेरिका वहां सत्ता परिवर्तन की जो दलील देते आए हैं, वह भी अंतरराष्ट्रीय कानून के उन बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ हैं, जो राष्ट्रों की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की अक्षुण्णता पर आधारित हैं।

इस मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश हार्डी डिलार्ड ने 1975 में ‘पश्चिमी सहारा’ मामले में एक महत्वपूर्ण अवलोकन प्रस्तुत किया था, जिसका मर्म यह था कि “जनता ही क्षेत्र की नियति तय करती है, न कि क्षेत्र जनता की नियति।’ यह टिप्पणी ईरान के मामले में भी सटीक बैठती है। ईरान में सत्ताधीशों के अत्याचार की कतिपय पैमानों पर निंदा संभव है, पर इसके बावजूद किसी संप्रभु राष्ट्र के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए ‘सत्ता परिवर्तन’ के संदिग्ध तर्क की वैधता को स्वीकारने का यही अर्थ होगा कि हम संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पूरा खाका ही पलट दें।

हाल में यूक्रेन, गाजा, वेनेजुएला और ईरान में चल रहे टकराव के अलावा अमेरिका द्वारा टैरिफ युद्ध छेड़ने जैसी पहल ने हमें शक्ति की वास्तविकता एवं उसके स्वरूप संबंधी दर्शन पर मंथन की दिशा में उन्मुख किया है। इस क्रम में वैश्विक मंच पर विराजमान राजनीतिक नेतृत्व का मानवीय मुश्किलों के प्रति उदासीन रवैया यही संकेत करता है कि सभ्यतागत मोर्चे पर हुई प्रगति की दिशा प्रतिगामी हो चली है। एक ऐसे विश्व को जिसे शक्ति के उपयोग को लेकर स्वयं को और अधिक सभ्य बनाने की आकांक्षा रखनी चाहिए, वहां यह उलट दिशा में जाता दिख रहा है।

याद रहे बमबारी से कभी शांति संभव नहीं। इतिहास भी हमें यही सिखाता है कि युद्ध स्वयं समस्या है, समाधान नहीं और किसी भी प्रकार का अन्याय या दमन अपने भीतर ही क्रांति के सूत्र समाहित किए होता है। जब तक दुनिया युद्ध की अमानवीय प्रकृति और विनाशलीला से मुक्त नहीं हो जाती, तब तक मानवीय विश्व व्यवस्था की स्थापना कपोल कल्पना ही रहेगी।

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शांति की दिशा में आगे बढ़ने और तनाव घटाने के लिए बार-बार किया गया आह्वान वस्तुत: सशस्त्र संघर्षों के प्रति स्पष्ट अस्वीकृति और विवादों के मध्यस्थतापूर्ण समाधान की तात्कालिकता का ही संकेत देता है। यह राष्ट्रों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने और संघर्ष समाधान के माध्यम के रूप में युद्ध से परहेज करने की भारत की नीति के अनुरूप है। इस बारीक दृष्टिकोण का एक आवश्यक पहलू यह होगा कि सत्ता के साम्राज्यवादी प्रयोग के विरुद्ध प्रभावी सुरक्षा कवच के रूप में अपेक्षाकृत कड़ी अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था का पालन सुनिश्चित किया जाए।

यह उन लोगों की ओर से अंतरराष्ट्रीय कानूनों के निहितार्थों एवं प्रक्रियाओं के प्रति एक बाध्यकारी प्रतिबद्धता पर आधारित हो, जिनके पास वैश्विक न्याय को बनाए रखने की शक्ति है। यह भी सुनिश्चित किया जाए कि यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय कानून की कसौटी एवं नैतिकता के मानदंडों पर पूरी तरह खरी उतरे। इस महत्वपूर्ण मोड़ पर भारत की भूमिका अपनी प्राचीन दार्शनिक विचारधारा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और नेहरूवादी अंतरराष्ट्रीयवाद में निहित अपनी विदेश नीति की सर्वोत्तम परंपराओं के अनुरूप एक शांतिदूत की होनी चाहिए।

युद्ध की परिस्थितियां निरंतर नए मोड़ ले रही हैं। ऐसे में राष्ट्रीय हितों की रक्षा का प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है। चूंकि वर्तमान सरकार का यह नैतिक दायित्व है कि इन हितों को सर्वोत्तम रूप से कैसे सुरक्षित किया जाए, इसलिए उसके निर्णय और विवेक का सम्मान किया जाना चाहिए।

नि:संदेह लोकतांत्रिक व्यवस्था में विदेश और रक्षा नीतियां भी बहस के दायरे से परे नहीं हैं, लेकिन सार्वजनिक विमर्श में यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि वर्तमान सरकार ही घरेलू लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु राष्ट्रीय शक्ति के कारकों का प्रभावी उपयोग करने में सर्वाधिक सक्षम है। ऐसी स्थिति में नेतृत्व और विदेश नीति प्रतिष्ठान पर दुर्भावना का आरोप लगाना न तो नीति-संगत है और न ही विवेकपूर्ण। स्मरण रहे कि कटुतापूर्ण आरोपों की तुलना में संयमित शैली में व्यक्त की गई असहमति कहीं अधिक प्रभावशाली होती है।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)